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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: सोमवार, 26 दिसंबर 2011

आप क्यों नहीं?

(Original Post : Why Not You? December 8th, 2005 by Steve Pavlina)
  
क्या आप उन लोगों में से एक हैं जो कि दुनिया की समस्याओं को देखते हैं और निम्नलिखित बातों में से कोई एक बात कहते हैं :  
  • इस बारे में किसी को तो कुछ न कुछ करना ही पडेगा|
  • जिन लोगों पर इसे संभालने की जिम्मेदारी है वे आखिर हैं कहाँ?
  • आखिर हम लोग टैक्स किस लिए भरते हैं? आखिर किसी को तो इसे ठीक करने की जिम्मेदारी मिली ही होगी?   
  • आखिर इस बारे में कोई कुछ करता क्यों नहीं?   
कोई और क्यों? आप क्यों नहीं?
अगर आप वाकई में किसी समस्या का, समाधान निकलते हुए देखना चाहते है, तो आप ही क्यों नहीं इस पर काम शुरू कर देते? अब यह तो तय है कि आपके कुढने और शिकायत करने से कुछ नहीं होने वाला

Last Modified: शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

प्रतिभा की कहानी

(Original Post : The Parable of Talents May1st, 2006 by Steve Pavlina)    

विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में, व्यक्तित्व विकास के बारे में कई अनमोल, रोचक किस्से मिलते हैं| इनमें से एक किस्सा बाईबल में से है “प्रतिभा की कहानी”

प्रतिभा की कहानी – उन किस्सों में से एक है जिन्हें यीशु (ईसा मसीह, jesus) नें एक नैतिक शिक्षा देने के लिए सुनाया था| हालाँकि कहानी में ‘प्रतिभा(गुणों)’ का शाब्दिक रूप से प्रयोग धन-दौलत के लिए किया गया है, लेकिन आप जाहिर रूप से इसका विस्तार दूसरे क्षेत्रों में भी कर सकते हैं| इसकी रोचकता बढ़ जाऐगी अगर आप इसे गुणों की आम परिभाषा को ध्यान में रख कर पढ़ें|

तो लीजिए कहानी हाजिर है :
“प्रतिभा की कहानी

एक बार की बात है कि एक व्यक्ति को दूर विदेश यात्रा पर जाना था, तो उसने अपने नौकरों को बुलाया और अपनी जायदात उनके हवाले कर दी| एक नौकर को उसने धन-दौलत कमाने के पांच गुण दिए, दूसरे को उसने दो गुण दिए, और एक अन्य नौकर को उसने एक गुण दिया, गुणों का यह  बंटवारा हर नौकर की काबलियत के मुताबिक था| और फिर वह अपनी यात्रा पर चला गया| वह आदमी जिसे पांच गुण मिले थे उसने अपने धन को व्यवसाय में लगा दिया और पांच गुण और कमा लिए| जिस व्यक्ति को दो गुण मिले थे उसने भी ठीक ऐसा ही किया और दो गुण और कमा लिए| लेकिन जिस आदमी को एक गुण मिला था, वह बाहर गया, जमीन में एक गढ्डा खोदा और अपने मालिक के धन को उसमें छुपा दिया|

Last Modified: गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

सुबह जल्दी कैसे उठें – भाग २

(Original Post : How to Become an Early Riser – Part II May 31st, 2005 by Steve Pavlina)    
सुबह जल्दी उठना, चूँकि काफी लोगों की दिलचस्पी का विषय है इसलिए मुझे (स्टीव पव्लिना को) लगता है कि इस विषय को और अधिक विस्तार देते हुए मुझे एक अतिरिक्त लेख लिखना चाहिए| (आप इसे लेख के पहले भाग को आप यहाँ पढ़ सकते हैं – “सुबह जल्दी कैसे उठें?”)

सबसे पहले तो ‘उनींदे होने पर ही बिस्तर पर जाने’, के विषय पर कुछ विचार, इसे सही तरीके से करने के लिए आपको जागरूकता और सामान्य ज्ञान के सही मिश्रण की जरूरत पड़ेगी|

अगर आप बिस्तर पर जाने से पहले कोई रोमांचक(stimulating) कार्य कर रहे हैं तो आप रात को देर तक जगे रहेंगे और नींद आपसे कोसों दूर रहेगी| कॉलेज के दौरान मैं ‘पोकर’ (ताश के पत्तों का खेल) का बड़ा शौकीन था जिसके लंबे दौर सुबह भोर तक चलते रहते थे, और फिर उसके बाद हम नाश्ता करने के लिए घर से बाहर निकल जाते थे| मैं आसानी से अपने सामान्य ‘सोने के वक्त’ को पीछे ढकेल सकता हूँ अगर मैं काम में व्यस्त हूँ, अपने दोस्तों के साथ बाहर हूँ या फिर कोई रोमांचक कार्य कर रहा हूँ

Last Modified: गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

सुबह जल्दी कैसे उठें ?

(Original Post : How to Become an Early Riser May 23rd, 2005 by Steve Pavlina)    

“सवेरे सूरज निकलने से पहले उठना अच्छा होता है, ऐसी आदतें आपके स्वास्थ्य, धन और बुद्धी के विकास में सहायक होती हैं|”-अरस्तू

क्या सुबह जल्दी उठने वाले लोग पैदायशी ऐसे होते हैं या फिर बनाए जाते हैं? मेरे मामले में तो वे पैदायशी ही ऐसे होते थे| जब मैं २० वर्ष का था, तो मैं शायद ही कभी आधी रात से पहले सोने जाता था, और लगभग हमेशा ही देर तक सोता रहता था| और आम तौर पर मेरी दिनचर्या दोपहर बाद से ही शुरू होती थी|

परन्तु कुछ समय के बाद मेरे लिए, अपने खुद के जीवन में, सफलता और सुबह जल्दी उठने के बीच के उच्च सम्बंध को नकारना मुश्किल हो गया| कभी-कभार, उन दुर्लभ मौकों पर जब मैं सुबह जल्दी उठ सका मैनें पाया कि मेरी उत्पादकता लगभग हमेशा ही उच्च-स्तर पर बनी रहती थी, वह भी न केवल सुबह के वक्त बल्कि पूरे दिन| और मुझे अपनी सेहत भी कहीं बेहतर महसूस होती थी| मैं जुझारू तो हमेशा से था ही, इसलिए मैंने सुबह जल्दी उठने की आदत डालने का पक्का इरादा कर लिया| मैंने तुरंत सुबह ५ बजे का अपना अलार्म लगाया और सो गया...

...और अगली सुबह, मैं दोपहर से कुछ वक्त पहले ही उठा|

हम्म...

Last Modified: शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

कैसे आप अलार्म के बजते ही फ़ौरन उठ सकते हैं?

(Original Post : How to Get Up Right Away When Your Alarm Goes Off April 25th, 2006 by Steve Pavlina)    

जब सुबह आपका अलार्म बजता है तो क्या आपको तुरंत उठना मुश्किल लगता है? क्या आप अलार्म को स्नूज़ मोड (snooze-वह बटन जो अलार्म को कुछ मिनट के लिए बंद कर देता है) पर रखकर फिर सोने चले जाते है?

मेरा सुबह उठने का कार्यक्रम भी कुछ ऐसा ही हुआ करता था| जब मेरा अलार्म अपनी कर्कश आवाज से शोर मचाता था तो मैं उस नालायक को तुरंत बंद कर दिया करता था| और तब मैं, नींद की खुमारी से अलसाए अपने मन-मस्तिष्क, से आहिस्ता-अहिस्ता यह सोचा करता कि मुझे वाकई में अभी उठना चाहिए या नहीं|

......बिस्तर कितना गर्म और आरामदेह है| बाहर कितनी ठण्ड है, मैं अभी उठा तो बड़ी ठण्ड लगेगी|

......अरे नहीं, अब मुझे उठ ही जाना चाहिए| चलो पैर उठो| शाबाश उठो-उठो| हम्म... शायद, इस तरह तो मैं पैरों को नहीं उठाता हूँ? मेरे पैर मेरी बात ही नहीं सुन रहे|
        
......मुझे व्यायाम करने भी जाना चाहिए| हाँ जाना तो चाहिए... लेकिन अभी वर्जिश करने का बिलकुल भी मन नहीं कर रहा| अभी तो नाश्ता भी नहीं किया है| शायद मुझे पहले एक ब्रैड खा लेनी चाहिए, थोड़ा सा मक्खन लगा कर| आनंद ही आ जाएगा|

Last Modified: मंगलवार, 22 नवंबर 2011

आत्म-अनुशासन : द्रढता


(Original Post : Self-Discipline : Persistence June 10th, 2005 by Steve Pavlina)  

दुनिया में कोई भी चीज द्रढता की जगह नहीं ली सकती| प्रतिभा(talent)-जी नहीं, प्रीतिभा होते हुए भी असफल होना, एक आम सी बात है| तेज दिमाग - जी नहीं, 'दिमाग तेज होने पर भी बेरोजगार होना' एक मुहावरा ही बन चुका है| शिक्षा - जी नहीं, पढ़े-लिखे निराश व्यक्तियों की दुनिया में कोई कमी नहीं| केवल दृढता और संकल्प ही सर्वशक्तिमान हैं| 'लगे रहो' के मुहावरे ने, मानव-सभ्यता की समस्याओं को पहले भी हल किया है और आगे भी करता रहेगा - केल्विन कूलिज

दृढता, आत्म-अनुशासन का पांचवां और आखिरी स्तंभ है|

दृढता क्या है?
दृढता, काम को करते रहने की क्षमता है, चाहे आपकी मनस्थिति जैसी भी हो| आप तब भी कोशिश करते रहते हैं जब आपको हार मान लेने की इच्छा होती है|

जब आप किसी बड़े लक्ष्य पर काम करते हैं तो आपके उत्साह में ऐसे ही उतार-चढ़ाव होते है जैसेकि किनारे से लहरें टकराती हैं| कई बार आप उत्साहित होते हैं कई बार नहीं भी होते| परन्तु यह आपका उत्साह नहीं जिससे आपको अच्छे नतीजे मिलेंगे बल्कि वह तो आपका काम है| दृढता आपको, उत्साह कम होने पर भी, काम करते रहने की क्षमता प्रदान करती है और इसलिए आपको नतीजे मिलते रहते है|

Last Modified: मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

आत्म-अनुशासन : कर्मशीलता

(Original Post : Self-Discipline : Industry June 9th, 2005 by Steve Pavlina)    

कर्मशीलता का अर्थ है कड़ी-मेहनत| कठिन-परिश्रम की तुलना में, कर्मशील होने के लिए आपको जरूरी नहीं कि वही काम करना होगा जोकि चुनौतीपूर्ण है या फिर कठिन है| इसका सीधा सा अर्थ है कि आपको काम में अपना समय देना होगा| आप कर्मशील, आसान काम करके भी बन सकते हैं और कठिन काम करके भी|

मान लीजिए आपका घर में एक छोटा शिशु (baby) है| और आपका काफी वक्त डाईपर(बच्चों का लंगोट) बदलने में खर्च हो जाता है| अब यह असल में कोई कठिन काम तो नहीं - बात सिर्फ इस काम को बार-बार, दिन में कई बार करने की है|

आपको जिंदगी में ऐसे कई काम मिलेंगे जो जरूरी नहीं कि बहुत कठिन ही हों, लेकिन सामूहिक रूप से उन्हें काफी वक्त देने की जरुरत पडती है| अगर आप उनसे पार पाने के लिए खुद को अनुशासित नहीं रखते हैं तो वे आपके जीवन में काफी उथल-पुथल पैदा कर सकते हैं| एक पल के लिए उन सभी छोटी-छोटी चीजों के बारे में सोचिए, जिन्हें करना आपके लिए जरूरी है : खरीददारी, खाना-बनाना, सफाई करना, कपडे धोना, टैक्स, बिल चुकाना, घर संभालना, बच्चों की देखभाल, आदि-आदि| और यह तो केवल घर के लिए है - यदि इसमें आप ऑफिस, के काम भी जोड़ लें तो सूची और भी लंबी हो जाती है| ये सभी चीजें शायद कभी भी आपकी महत्वपुर्ण कार्यों की सूची में न आ पाएं लेकिन फिर भी इन्हें करना जरूरी तो है ही|

Last Modified: गुरुवार, 22 सितंबर 2011

आत्म-अनुशासन : कठिन-परिश्रम

(Original Post : Self-Discipline : Hard Work June 7th, 2005 by Steve Pavlina)
   
जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि कोई बड़ा रहस्य नहीं है| आपका कोई भी लक्ष्य हो, आप उसे हासिल कर सकते हैं अगर आप काम करने के लिए तैयार हैं - ओपरा विनफ्रे

कठिन-परिश्रम - एक और मैला-कुचैला शब्द|

कठिन-परिश्रम की परिभाषा 
मेरे लिए कठिन-परिश्रम वह है जोकि आपको चुनौती देता है|

लेकिन आखिर चुनौती जरूरी क्यों है? क्यों न उसे ही किया जाए जोकि आसान है?

ज्यादातर लोग वही करते हैं जोकि आसान है और कठिन-परिश्रम से दूर रहते हैं - और यही वजह है कि आपको ठीक इसका उलटा करना चाहिए| जिंदगी के सतही अवसरों पर लोगों के झुंड-के झुंड टूट पड़ते हैं क्योंकि वे आसान होते हैं| अपेक्षाकृत ज्यादा कठिन चुनौतियों पर मुकाबला (competition) काफी कम होता है और अवसर कहीं ज्यादा|

Last Modified: सोमवार, 12 सितंबर 2011

आत्म-अनुशासन : इच्छा-शक्ति

(Original Post : Self-Discipline : Will Power June 7, 2005 by Steve Pavlina)  
एक सफल व्यक्ति और दूसरे लोगों के बीच फर्क, शक्ति की कमी या अज्ञानता का नहीं है बल्कि इरादे का है 
– विंस लोम्बार्डी  
इच्छा-शक्ति - इन दिनों कितना मैला-कुचैला सा शब्द है| आप कितने ही ऐसे विज्ञापन देख चुकें हैं जोकि अपने उत्पाद(Product) को इच्छा-शक्ति के विकल्प के तौर पर स्थापित करने कर प्रयास करते हैं| उनकी शुरुआत ही आपको यह बताने से होती है कि इच्छा-शक्ति बेकार की चीज है और फिर वे आपको कोई उत्पाद बेचने का पर्यास करते हैं जो कि ‘फ़ौरन और आसानी से’ (fast and easy) काम करता है| जैसे कि वजन घटाने की दवाएं या कुछ अजीब से दिखने वाले व्यायाम उपकरण (exercise equipment)| अक्सर वे, थोड़े ही समय में नामुमकिन से परिणामों की गारंटी भी दे डालते हैं-और यह उनके लिए तो एक जीती हुई बाजी ही है क्योंकि जिन लोगों में इच्छा-शक्ति की कमी है वे इन बेकार के उत्पादों को वापिस करने के लिए समय ही नहीं निकाल पाएंगे|

लेकिन जानते हैं, मजे की बात क्या है?..........इच्छा-शक्ति वाकई में काम करती है| लेकिन इसका पूरा लाभ उठाने के लिए आपको यह सीखना होगा कि यह क्या कर सकती है और क्या नहीं? जो लोग यह कहते हैं कि इच्छा-शक्ति काम नहीं करती, वे इसे, ऐसे तरीके से इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं जोकि इसकी क्षमता से बाहर है|   

Last Modified: बुधवार, 17 अगस्त 2011

आत्म-अनुशासन : स्वीकृति

(Original Post : Self-Discipline: Acceptance June 6th, 2005 by Steve Pavlina)    

स्वीकृति - आत्म-अनुशासन के पांच स्तंभों में से सबसे पहला स्तंभ है| स्वीकृति का मतलब है कि आप यथार्थ (reality) के वास्तविक रूप को समझें और जो आपने समझा है उसे जागृत अवस्था में स्वीकार करें|     

यह बहुत साधारण और जाहिर सी बात लगती हैं, लेकिन इसे अमल में लाना बहुत ही मुश्किल हैं| अगर आपको अपने जीवन के किसी क्षेत्र में बहुत दिक्कतें आ रहीं हैं तो इस बात की पूरी संभावना हैं कि समस्या की जड़ में सच्चाई को (उसके सही रूप में) स्वीकार न करना ही हो| 

स्वीकृति, आत्म-अनुशासन का एक स्तंभ हैं पर आखिर क्यों? आत्म-अनुशासन के संदर्भ (बारे) में लोग अगर कोई सबसे बुनियादी गलती करते हैं तो वह है वर्तमान परिस्थिति को उसके सही रूप में समझने और उसे स्वीकार करने में असफल रहना| क्या आपको, पिछले लेख (खुद को साधिए!) से, याद है कि आत्म-अनुशासन और वजन उठाने का तरीका(भार-प्रशिक्षण) कितना मिलता-जुलता है? अगर आपको भार-प्रशिक्षण (weight training) में सफल होना हैं तो सबसे पहला कदम यह पता लगाना होगा कि आप कितना वजन आप पहले ही उठा चुके हैं| अभी वर्तमान में आप कितने मजबूत हैं? जब तक आप यह पता नहीं लगा लेते कि आप अभी कहाँ पर खड़े हैं, तब तक आप एक सही(sensible) प्रशिक्षण योजना को नहीं अपना सकते|

Last Modified: शनिवार, 6 अगस्त 2011

खुद को साधिए !

(Original Post : Self-Discipline June 5th, 2005 by Steve Pavlina)
    
इस हफ्ते मैं (स्टीव पव्लिना) "खुद को साधिए” (आत्म-अनुशासन) विषय पर एक श्रंखला (सीरीज) लिख रहा हूँ| इस श्रंखला में, केन्द्र-बिंदु (फोकस), जिन्हें मैं - “आत्म-अनुशासन” के पांच स्तंभ कहता हूँ, पर रहेगा |

आत्म-अनुशासन के पांच स्तंभ

आत्म-अनुशासन के पांच स्तंभ हैं : स्वीकार करना, इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत, कर्मशीलता और धुन (द्रढता) |

इस सीरीज के हर भाग में, मैं इन स्तंभों में से किसी एक बारे में विस्तार से जिक्र करूँगा, यह आखिर क्यों  जरूरी है और कैसे इसका विकास किया जाए ? पर सबसे पहले क्यों न आत्म-अनुशासन पर एक सरसरी नजर डाल ली जाये ?

आत्म-अनुशासन क्या है ?

आत्म-अनुशासन एक योग्यता है अपनी भावनाओं से प्रभावित हुये बिना खुद से काम कराने की |

Last Modified: बुधवार, 20 जुलाई 2011

दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचेंगे ?

(Original Post : 'What Will Other People Think of You' November 14th, 2005 by Steve Pavlina)

दुनिया आपके बारे में क्या सोचती है इसकी चिंता करने में अपनी जिंदगी का एक भी पल बरबाद न करें | इससे किसी का भला नहीं होने वाला |

सच्चाई तो यह है कि यह सोचने में कि, दूसरे आपके बारे में क्या सोचेंगे आप कहीं ज्यादा ऊर्जा बर्बाद करेंगे, जितनी ऊर्जा वे स्वयं खर्च करेंगे | ज्यादातर लोग अपनी जिंदगी में ही इतने व्यस्त रहतें हैं कि उन्हें इतनी फुरसत ही नहीं कि वे यह ध्यान रखें कि आप क्या कर रहे हैं | वहीं दूसरी तरफ जब आप यह चिंता में घुल रहे हैं कि वे आपके बारे में क्या सोच रहें हैं, तो वे इस बात की चिंता कर रहे होंगे कि आप उनके बारे में क्या सोचते हैं |  चिंता में जिंदगी की बर्बादी....

बजाय इस बात की परवाह करने के कि दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं, इस बात कि परवाह कीजीए कि आप अपने बारे में क्या सोचते हैं | आपकी अपने बारे में राय कहीं ज्यादा मायने रखती है बजाय दूसरों की राय (आपके बारे में) के, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी नजर में दूसरे कितने समझदार, ज्ञानी या नेकनीयत हैं |