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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: शनिवार, 6 अगस्त 2011

खुद को साधिए !

(Original Post : Self-Discipline June 5th, 2005 by Steve Pavlina)
    
इस हफ्ते मैं (स्टीव पव्लिना) "खुद को साधिए” (आत्म-अनुशासन) विषय पर एक श्रंखला (सीरीज) लिख रहा हूँ| इस श्रंखला में, केन्द्र-बिंदु (फोकस), जिन्हें मैं - “आत्म-अनुशासन” के पांच स्तंभ कहता हूँ, पर रहेगा |

आत्म-अनुशासन के पांच स्तंभ

आत्म-अनुशासन के पांच स्तंभ हैं : स्वीकार करना, इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत, कर्मशीलता और धुन (द्रढता) |

इस सीरीज के हर भाग में, मैं इन स्तंभों में से किसी एक बारे में विस्तार से जिक्र करूँगा, यह आखिर क्यों  जरूरी है और कैसे इसका विकास किया जाए ? पर सबसे पहले क्यों न आत्म-अनुशासन पर एक सरसरी नजर डाल ली जाये ?

आत्म-अनुशासन क्या है ?

आत्म-अनुशासन एक योग्यता है अपनी भावनाओं से प्रभावित हुये बिना खुद से काम कराने की |
अब जरा अनुमान लगाइए कि आप क्या हासिल कर सकते हैं अगर आप अपने लक्ष्य से न भटकें, चाहे जो हो ? जरा इस बात की कल्पना कीजिये कि आप अपने शरीर से कह रहें हैं “तुम बहुत मोटे हो, चलो अपना वजन १० किलो कम करो |“ अब बिना आत्म-अनुशासन के यह तो होने से रहा | मगर आपके पास अगर प्रयाप्त आत्म-अनुशासन है तो यह एक तय लक्ष्य है | आत्म-अनुशासन की पराकाष्ठा (pinnacle) तो तब होगी जब आप उस स्तर पर पहुँच जायें कि आप कोई लक्ष्य निर्धारित करें तो यह लगभग तय हो कि आप उसे अंजाम तक ले जायेंगे ?

खुद के विकास के लिए आप के पास जो साधन उपलब्ध हैं, आत्म-अनुशासन उनमें से एक है | हाँ यह सही है कि यह कोई चमत्कारी जड़ी-बूटी नहीं है | फिर भी, आत्म-अनुशासन आपकी बहुत सी समस्याओं का समाधान कर सकता है| हालाँकि, उन समस्याओं को हल करने के कई दूसरे तरीके भी हैं लकिन आत्म-अनुशासन उन सब पर भारी पड़ता है | आत्म-अनुशासन आपको इतना समर्थ बना सकता है कि आप किसी भी लत से छुटकारा पा सकें या अपना वजन, जितना चाहें उतना कम कर सकें | काम को टालते रहना, अवव्यस्था और लापरवाही जैसी समस्याओं का तो यह जड से सफाया कर कर सकता है | जिन समस्याओं को यह हल कर सकता हैं उन में तो आत्म-अनुशासन का कोई मुकाबला ही नहीं | इसके साथ-साथ लगन, लक्ष्य-निर्धारण(goal-setting) और ‘योजना-बनाना’ जैसे दूसरे साधनों के साथ इसकी जोड़ी खूब जमती है |

आत्म-अनुशासन का विकास कैसे करें ?

मेरे विचार से “आत्म-अनुशासन का विकास कैसे करें” इसे समझाने का एक बहुत अच्छा तरीका है | आत्म-अनुशासन एक मांसपेशी (muscle) की तरह है | जितना ज्यादा आप इसे प्रशिक्षित(train) करेंगे, आप उतने ही ताकतवर बन जाएंगे | वहीँ दूसरी तरफ, अगर आप इसे प्रशिक्षित नहीं करेंगे तो आप निर्बल होते चलें जाएंगे |  

जिस तरह से हर मनुष्य की शारीरिक ताकत अलग होती है, ठीक उसी तरह से हम सभी में आत्म-अनुशासन के अलग स्तर होते हैं | थोडा तो हरेक के पास होता है - अगर आप अपनी साँस कुछ पलों तक रोक सकते हैं तो आपके पास कुछ मात्रा में आत्म-अनुशासन तो है ही | लेकिन हर व्यक्ति के आत्म-अनुशासन का स्तर एक-सा नहीं होता |

जिस तरह से मांसपेशी बनाने के लिए, मांसपेशी की जरूरत होती है, उसी तरह से आत्म-अनुशासन के निर्माण के लिए आत्म-अनुशासन की जरूरत होती है |

आत्म-अनुशासन के निर्माण का तरीका, वजन उठाने के शारीरिक प्रशिक्षण से बहुत मिलता-जुलता है | कहने का मतलब यह है कि आप उन वजनों को उठायें जो कि आपकी क्षमता के करीब हों | इस बात पर ध्यान दें कि जब आप वजन उठाने का अभ्यास करें तो उन वजनों को उठाएं जो आपकी क्षमता के अंदर हों | आप अपनी मांसपेशियों को तब तक आगे ढकेलते हैं जब तक की वे थक नहीं जातीं, और फिर आप उन्हें आराम देते हैं ?

ठीक इसी तरह से, आत्म-अनुशासन के निर्माण का बुनियादी सिद्धांत यह है कि आप उन चुनौतियों (Challenges) को हाथ में लें जिन्हें आप हल कर सकें पर जो आपकी क्षमता के करीब हों इसका यह कतई मतलब नहीं है कि आप ऐसी वजन चुनें जिसे आप रोज कोशिश करने पर भी न उठा पाएं, और न ही इसका यह मतलब है कि आप उन वजनों को चुनें जिन्हें उठाना आपके बायें हाथ का खेल है | आपको उन्हीं वजनों/चुनौतियों से शुरुआत करनी होगी जिन्हें उठाना आपके बस में है लेकिन जो आपकी क्षमता के करीब हैं |

क्रमिक प्रशिक्षण का नियम यह है कि एक बार आप सफल हों जाने पर, आप चुनौती को बढ़ा देते हैं | उन्हीं  वजनों को बार-बार उठाते रहने से आप और ताकतवर नहीं बन सकते | ठीक इसी तरह, अगर आप खुद को जीवन में चुनौती ही न दें, तो आप आत्म-अनुशासन को और नहीं बढ़ा सकते |

जिस तरह से ज्यादातर लोगों की मांसपेशियां उनकी क्षमता (प्रशिक्षण के बाद) की तुलना में बहुत कमजोर होतीं हैं | ठीक उसी तरह से, ज्यादातर लोगों के आत्म-अनुशासन का स्तर बहुत ही कम होता है |

आत्म-अनुशासन के निर्माण के लिए अगर आप खुद पर बहुत ज्यादा दबाव डालते हैं तो यह एक भूल ही होगी | अगर आप अपनी पूरी जिंदगी का रातों-रात कायाकल्प करने के मकसद से, अपने लिए दर्जन-भर लक्ष्य निर्धारित कर लें, और खुद से यह उम्मीद रखें कि आप अगले ही दिन से उन सभी लक्ष्यों पर कड़ाई से काम करेंगे, तो आपका असफल होना तो लगभग तय है | यह तो कुछ यों हुआ कि कोई आदमी पहली बार जिम (gym) जाये और सीधे १३५ किलो का वजन उठाने की कोशिश करने लगे | आप ऐसा करने पर केवल अनाड़ी ही नज़र आएँगे |

अगर आप केवल ४.५ किलो का वजन ही उठा सकते हैं, तो आपकी क्षमता ४.५ किलो वजन उठाने की ही है | इसमें कोई शर्मिंदा होने की बात ही नहीं है | मुझे (स्टीव पव्लिना को) याद है कि कुछ साल पहले मैंने जब अपने शारीरिक प्रशिक्षक के साथ, प्रशिक्षण लेना शुरू किया तो पहली बार मैं केवल छड (जिसका वजन ३.१५ किलो था) को बिना किसी अतिरिक्त वजन के ही उठा पाया था | मेरे कंधे बहुत कमजोर थे क्योंकि मैंने कभी वर्जिश ही नहीं की | लेकिन कुछ ही महीनों में मैं २७ किलो वजन तक उठाने लगा |   

इसी तरह से, अगर आप अभी बहुत अनुशासित नहीं हैं, तो भी आपके पास जितना भी आत्म-अनुशासन है आप उसी का प्रयोग करके और ज्यादा आत्म-अनुशासित हो सकते हैं | आप जितने ज्यादा अनुशासित होते जाएंगे, जिंदगी उतनी ही सरल होती चली जायेगी | वे चुनौतियाँ जो आपके लिए कभी असंभव हुआ करती  थीं, अब बच्चों के खेल के जैसी लगने लगेंगी | जैसे-जैसे आप ताकतवर आप बनते जाएंगे, वही वजन आपके लिए हलके और हलके लगने लगेंगे |    

खुद की तुलना कभी भी दूसरे लोगों से मत कीजिये | इससे कोई फायदा नहीं होगा | आप वही पाएंगे, जिसकी उम्मीद आप करेंगे | अगर आप सोचते हैं कि आप कमजोर हैं तो दूसरे ताकतवर लगने लगेंगे | अगर आप खुद को ताकतवर मानते हैं तो दूसरे कमजोर नज़र आएंगे | ऐसे करने का कोई मतलब नहीं | आप केवल यह देखिये कि आप इस वक्त कहाँ हैं और फिर खुद को बेहतर बनाने कि लिए लक्ष्य निर्धारित कीजिये |

आइये एक उदाहरण लेते हैं |
मान लीजिए कि आप रोजाना ८ घंटे काम करने की आदत डालना चाहते हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि इससे आपके कैरियर में खासा फर्क पड़ेगा | मैं (स्टीव पव्लीना) इस सुबह एक ऑडियो प्रोग्राम को सुन रहा था जिसमें एक अध्ययन(study) के विषय में बताया जा रहा था कि दफ्तर(office) के कर्मचारी औसतन ३७% समय तो खाली लोगों से मिलने-जुलने में ही बिता देते हैं, दूसरी आदतों की तो बात ही छोड दीजिए जिन से लगभग ५०% (काम करने का) समय व्यर्थ के कामों में बर्बाद हो जाता है | लिहाजा उन्नति की काफी गुंजाईश है |  

शायद आप पूरे ८ घंटे, बिना विचलित हुए, एकाग्र होकर काम करने की कोशिश करें, और ऐसा आप केवल एक ही बार कर पायें | दूसरे दिन आप पूरी तरह से असफल रहें | तो भी यह ठीक है | आपने ८ घंटे का एक दौर पूरा कर लिया है | दो दौर आपकी लिए बहुत ज्यादा होते | इसलिए थोड़ी-सी कटौती कीजिये | ५ सफल  दौर (दूसरे शब्दों में एक हफ्ता) पूरे करने के लिए कितना समय आपके लिए काफी होगा ? क्या आप दिन में एक घंटा एकाग्र होकर, लगातार पांच दिनों तक, काम करते रह सकते हैं ? अगर आप यह ना कर पायें तो समय को ३० मिनट या जितने भी समय आप कर सकें, उतना कम कर दें | अगर आप सफल रहें (या आप को लगता है कि यह तो बहुत आसान था), तो चुनौती को बढ़ा दें (यानी कि बाधा को).   

एक बार आपने एक हफ्ते के लिए, एक स्तर पर महारत हासिल कर ली तो अगले हफ्ते स्तर को थोडा सा और बढ़ा दें | और इस क्रमिक प्रशिक्षण(progressive training) को तब तक जारी रखें जब तक कि आप अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर लेते |

हालाँकि इस तरह की कार्यनीतियां कभी भी अचूक नहीं होती हैं | फिर भी इस नीति से मुझे काफी फ़ायदा हुआ है | स्तर को हर हफ्ते थोडा-थोडा बढ़ाते रहने से, आप अपनी क्षमताओं के भीतर ही रहते हैं और समय के साथ मजबूत होते चले जाते हैं | वहीं दूसरी तरफ वजन उठाने में, जो काम आप असल में करते हैं उसका कोई अर्थ नहीं निकलता | वजनों को ऊपर-नीचे करते रहने में आखिर फायदा ही क्या है ? असली मकसद तो मांसपेशियों के विकास करना है | लेकिन वहीं दूसरी तरफ, आत्म-अनुशासन के विकास के दौरान, आप जो कार्य करते हैं उसका भी आपको फायदा होता है, यह तो और भी अच्छा है | जब प्रशिक्षण से आप मजबूत तो हों ही बल्कि इससे आपको तुरंत फायदा भी मिले तो सोने पर सुहागा वाली बात हुई न !  

इस हफ्ते हम आत्म-अनुशासन के पांच स्तंभों के विषय में और गहराई में जाएंगे |

यह लेख, आत्म-अनुशासन की श्रंखला का पहला भाग है | पहला भाग | दूसरा भाग | तीसरा भाग | चौथा भाग | पांचवां भाग | छठा भाग 

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