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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: मंगलवार, 22 नवंबर 2011

आत्म-अनुशासन : द्रढता


(Original Post : Self-Discipline : Persistence June 10th, 2005 by Steve Pavlina)  

दुनिया में कोई भी चीज द्रढता की जगह नहीं ली सकती| प्रतिभा(talent)-जी नहीं, प्रीतिभा होते हुए भी असफल होना, एक आम सी बात है| तेज दिमाग - जी नहीं, 'दिमाग तेज होने पर भी बेरोजगार होना' एक मुहावरा ही बन चुका है| शिक्षा - जी नहीं, पढ़े-लिखे निराश व्यक्तियों की दुनिया में कोई कमी नहीं| केवल दृढता और संकल्प ही सर्वशक्तिमान हैं| 'लगे रहो' के मुहावरे ने, मानव-सभ्यता की समस्याओं को पहले भी हल किया है और आगे भी करता रहेगा - केल्विन कूलिज

दृढता, आत्म-अनुशासन का पांचवां और आखिरी स्तंभ है|

दृढता क्या है?
दृढता, काम को करते रहने की क्षमता है, चाहे आपकी मनस्थिति जैसी भी हो| आप तब भी कोशिश करते रहते हैं जब आपको हार मान लेने की इच्छा होती है|

जब आप किसी बड़े लक्ष्य पर काम करते हैं तो आपके उत्साह में ऐसे ही उतार-चढ़ाव होते है जैसेकि किनारे से लहरें टकराती हैं| कई बार आप उत्साहित होते हैं कई बार नहीं भी होते| परन्तु यह आपका उत्साह नहीं जिससे आपको अच्छे नतीजे मिलेंगे बल्कि वह तो आपका काम है| दृढता आपको, उत्साह कम होने पर भी, काम करते रहने की क्षमता प्रदान करती है और इसलिए आपको नतीजे मिलते रहते है|
दृढता, अंततः अपना खुद का ही उत्साह निर्माण करती है| अगर आप सहज रूप से काम करते रहें तो आखिरकार आपको परिणाम मिलने लगेंगे, जोकि बहुत उत्साह बढाने वाले होंगें| मिसाल के तौर पर, शुरुआती पांच किलो वजन घटाने के बाद, जब आपके कपडे आपको ठीक से फिट होने लगेंगे तो, वजन कम करने और व्यायाम को लेकर आपका उत्साह अपने-आप ही बढ़ जाएगा|          

कब हार को स्वीकार कर लेना चाहिए?
क्या आपको हमेशा दृढ़ बने रहना चाहिए और कभी भी हार नहीं माननी चाहिए? बिलकुल नहीं| कई बार हार स्वीकार लेना ही साफ़ तौर पर सबसे अच्छा विकल्प होता है|

क्या आपने कभी 'ट्रैफ-ओ-डाटा'(Traf-O-Data) नाम की कम्पनी का नाम सुना है? और माइक्रोसोफ्ट के बारे में क्या ख्याल है? दोनों ही कम्पनियां, बिल गेट्स और पौल एल्लेन नें शुरू की थीं| ट्रैफ-ओ-डाटा वह पहली कम्पनी है जिसकी शुरुआत इन्होनें १९७२ में की थी| आप ट्रैफ-ओ-डाटा की कहानी यहाँ (http://en.wikipedia.org/wiki/Traf-O-Data) पढ़ सकते हैं| गेट्स और एल्लेन नें इसे कुछ साल तक चलाया और फिर अपने हाथ खड़े कर दिए| उन्होंने हार मान ली| बेशक, उनकी कंपनी, माइक्रोसोफ्ट अब अच्छी चल रही है|  

अगर उन्होंने 'ट्रैफ-ओ-डाटा' को नहीं छोड़ा होता तो क्या आज वे इतने सफल हुए होते| अब सवाल यह है कि आपको यह कैसे पता लगे कि कब आपको दृढ बने रहना है और कब कोशिश छोड देनी चाहिए? क्या आपकी योजना अभी भी सही है? अगर नहीं तो उसमें सुधार कीजिए| क्या आपका लक्ष्य अभी भी सार्थक है? अगर नहीं तो उसमें बदलाव कीजिए या फिर उसे छोड दीजिए| जो लक्ष्य अब आपको प्रेरित नहीं करता उससे चिपके रहने में कोई शान नहीं है| दृढता का अर्थ अडियल होना नहीं होता|

मेरे लिए, यह सबक सीखना, खास तौर पर कठिन रहा| मैं हमेशा से इस बात पर यकीन करता था कि आपको कभी भी हार नहीं माननी चाहिए, और एक बार आपने एक लक्ष्य निर्धारित कर लिया तो फिर आपको उस पर डटे रहना है चाहे अंजाम जो भी हो| आखिर रिवाज है कि जहाज का कप्तान उसके साथ ही डूबता है| अगर कभी मैं, अपनी शुरू की हुई किसी परियोजना (project), को पूरा नहीं कर पाता तो मुझे बड़ी ग्लानी होती|

लेकिन, आखिरकार मैंने समझ लिया कि यह व्यर्थ की बात है|

अगर आप मनुष्य के तौर पर ज़रा भी विकास कर रहे हैं तो हर नए साल में (पिछले साल की तुलना में) आपके व्यक्तित्व में बदलाव होता तय है| और अगर आप सजग रहकर व्यक्तित्व विकास कर रहें हैं तो उस स्थिति में तो बदलाव और भी नाटकीय व तेज होंगे| और आप इस बात कि कोई गारंटी भी नहीं दे सकते कि जो लक्ष्य आप आज निर्धारित करेंगे वे एक साल बाद भी आपको उतना ही प्रेरित करें|

मेरा पहला बिजनेस ‘डेक्सट्रीटी’ सोफ्टवेयर था| इसे मैंने सन १९९४ में शुरू किया था तब मैं कॉलेज से बाहर निकला ही था| लेकिन इसे एक दशक तक चलाने के बाद मैंने पाया कि मेरे लक्ष्य अब  बदल गए हैं| मैं अभी भी ‘डेक्सट्रीटी’ से जुडा हुआ हूँ लेकिन अब मैं अपना पूरा वक्त इसमें नहीं देता| मुझे इसे संभालने के लिए हफ्ते में केवल एक या दो घंटे का समय देने की जरूरत होती है, इसका कारण यह है कि मैंने इसे इस तरह से डिजाईन किया है जिससे कि यह जितना हो सके उतना स्वचालित(automated) रहे और मुझे एक निष्क्रिय आय का जरिया मिल सके| यह उतना सफल रहा जितना सफल मैं इसे बनाना चाहता था| मैं इसे विकसित करना जारी रख सकता था, लेकिन मैं जानता था कि मैं बाकी की जिंदगी कंप्यूटर गेम्स बनाते हुए नहीं बताना चाहता था| अपनी खुद की गेम्स कंपनी शुरू करना, २२ वर्ष की उम्र से ही मेरा सपना था, और कुछ दर्जन भर गेम्स बाजार में उतारने के बाद, मुझे महसूस होता है कि मैं अपना वह लक्ष्य पा चुका हूँ, २२ वर्ष का स्टीव अब  बहुत संतुष्ट है| परन्तु, आज मेरे सपने कुछ अलग हैं|

तो क्या मैंने ‘डेक्सट्रीटी’ को छोड दिया? आप ऐसा कह सकते हैं|, पर यह कहना ज्यादा सही होगा कि मैं किसी वस्तु के एक नए दृष्टिकोण से संक्रमित हो गया जोकि मेरे लिए कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था| अगर मैं ‘डेक्सट्रीटी’ पर ही अड़ा रहता तो, यह ब्लॉग अस्तित्व में ही नहीं आया होता| मैं (स्टीव पव्लिना), अपनी पहली किताब पर काम करने की बजाय, शायद एक नए गेम पर काम कर रहा होता|

नए लक्ष्यों के लिए जगह बनाने के लिए, हमें पुराने लक्ष्यों को या तो पूरा करने होता है या फिर मिटा देना पड़ता है| और कई बार तो नए लक्ष्य, इतने सम्मोहक और प्रेरणादायक होते है कि पुराने लक्ष्यों को पूरा करने कई लिए समय ही नहीं बचता – और उन्हें बीच में ही आधा-अधूरा छोड देना पड़ता है| मुझे ऐसा करना बड़ा असुविधाजनक लगता है, लेकिन मैं जानता हूँ कि ऐसा करना जरूरी है| सबसे मुश्किल काम तो सचेत रहकर पुरानी योजनाओं को तिलांजलि देना है, यह जानते हुए कि वे कभी भी पूरी नहीं हो पाएंगी| मेरे पास, उन नए गेम्स के सुझावों और कुछ प्रारूपों से, पूरी एक फाईल भरी हुई है जो कि कभी भी दिन की रोशनी नहीं देख पाएंगे| सचेत रहकर उन योजनाओं को छोड देने का निर्णय लेना मेरे लिए वाकई काफी मुश्किल रहा| मुझे इससे तालमेल बिठाने में काफी लंबा वक्त लगा| लेकिन मेरे खुद के विकास के लिए ऐसा करने में सक्षम होना जरूरी था|

मुझे अभी भी अपने उन लक्ष्यों को निर्धारित करने की समस्या को सुलझाना है जोकि मेरे खुद के व्यक्तित्व विकास के कारण एक साल बाद बेमतलब हो जाएंगे| मैंने इस समस्या को कैसे हल किया? थोड़ी से बेईमानी से| मैंने यह पता लगा लिया कि दीर्घकालिक(Long-term) लक्ष्य, जो कि वक्त के साथ सार्थक बनें रहें, निर्धारित करने का सिर्फ यही तरीका है कि उन्हें खुद की विकास प्रक्रिया के साथ पंक्तिबद्ध (aligned) कर लिया किया जाए| व्यक्तित्व विकास की तलाश मेरे लिए काफी लंबे समय एक स्थायी लक्ष्य रहा है, हालाँकि कभी-कभी यह विरोधाभासी रूप से परिवर्तनशील भी महसूस होता है| इसलिए बजाय तय लक्ष्य निर्धारित करने के, जैसा कि मैंने अपने गेम्स के बिजनेस में किया था, मैंने शुरुआत विस्तृत और ज्यादा गतिशील लक्ष्यों से की जो कि मेरे अपने विकास के साथ मेल खाते थे| इस नए बिजनेस ने मुझे अपने व्यक्तित्व विकास पर काम करने और जो मैंने सीखा उसे औरों के साथ बांटने की खुली छूट दी| वास्तव में, विकास खुद में ही एक लक्ष्य है, मेरे लिए भी और दूसरों के लिए भी| यह एक सह्जीवता के रिश्ते की शुरुआत करता है, जहां पर दूसरों की मदद करना वापस मेरे खुद के विकास में सहायक साबित होता है, जिसके परिणामस्वरूप, दूसरों की मदद करने के और भी नए विचार जन्म लेते हैं| कोई भी व्यक्ति, जोकि इस ब्लॉग को पिछले साल से पढ़ रहा हो, उस प्रभाव को काम करते हुए भी शायद देख चुका होगा|    

व्यक्तित्व विकास की सीधा और सचेत तलाश ही केवल ऐसा मिशन है जोकि मेरे लिए काम करेगा| मिसाल के तौर पर अगर मैं, जमीन की खरीद-फरोख्त में कुशलता पाने को अपना लक्ष्य बना लेता, तो मैं शायद कुछ ही वर्षों में इससे उब जाता| क्योंकि मैं सतत विकास को सदा जारी रखना चाहता हूँ, इसलिए मुझे चुनौती का एक स्तर बरकरार रखना पड़ता है और लक्ष्य को और बड़ा करना पड़ता है| मैं चीजों को निहायत उबाऊ होने और आरामदायक चक्र में फंसने की इजाजत नहीं दे सकता|

दृढता की उपयोगिता, जिद्दी होकर बीते हुए कल से चिपके रहने में नहीं है| बल्कि, उपयोगिता तो भविष्य की उस झलक में मिलती है जो कि इतनी सम्मोहक होती है कि आप उसे साकार करने के लिए लगभग सभी कुछ दाव पर लगाने को तैयार होते हैं| भविष्य की वो झलक जो अब मैं देख पाता हूँ वह कहीं बड़ी है बनिस्बत ‘डेक्सट्रीटी’ की झलक के| लोगों को उनके स्वंय के विकास और उन्हें उनकी खुद की समस्याओं को हल करने में मदद करने के, काबिल बनना कहीं ज्यादा प्ररेणा देता है बजाय लोगों का मनोरंजन करने के| ये आदर्श, ‘डेक्सट्रीटी’ पर काम करने के दौरान उभरने शुरू हुए, क्योंकि मेरा झुकाव उन तर्कसंगत(logic) पर आधारित गेम्स की तरफ हो गया जोकि लोगों को सोचने पर बाध्य करते थे| और मैंने कई ऐसे गेम्स को बाजार में उतारने के मौकों को जाने दिया जो कि मेरे लिए पैसे तो बहुत कमाते पर लोगों को उनसे कोई खास फायदा नहीं होता|

कर्म में दृढता, दृष्टिकोण में दृढ़ता से आती है| जब आप आखिर क्या चाहते है इसे बारे में आपका नजरिया बिलकुल स्पष्ट हो और वह भी इस तरह से कि इसमें समय के साथ ज्यादा बदलाव न हो, तो आप अपने कार्यों में ज्यादा एकरूप और दृढ हो जाएँगे| और कार्यों में एकरूपता से परिणामों में एकरूपता आती है|

क्या आप अपने जीवन के एक हिस्से की पहचान कर सकते हैं जहां आपने लंबे समय तक द्रढता का प्रदर्शन किया है? मैं यह मानता हूँ कि अगर आप ऐसे किसी क्षेत्र की पहचान कर सकते हैं तो यह आपके मिशन के लिए एक इशारा दे सकता है – एक ऐसी दिशा की ओर जहां पर लगन और आत्म-अनुशासन एक सुर-ताल में काम करते हैं|

यह लेख, आत्म-अनुशासन की श्रंखला का छठा भाग है | पहला भाग | दूसरा भाग | तीसरा भाग | चौथा भाग | पांचवां भाग | छठा भाग

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