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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

कैसे आप अलार्म के बजते ही फ़ौरन उठ सकते हैं?

(Original Post : How to Get Up Right Away When Your Alarm Goes Off April 25th, 2006 by Steve Pavlina)    

जब सुबह आपका अलार्म बजता है तो क्या आपको तुरंत उठना मुश्किल लगता है? क्या आप अलार्म को स्नूज़ मोड (snooze-वह बटन जो अलार्म को कुछ मिनट के लिए बंद कर देता है) पर रखकर फिर सोने चले जाते है?

मेरा सुबह उठने का कार्यक्रम भी कुछ ऐसा ही हुआ करता था| जब मेरा अलार्म अपनी कर्कश आवाज से शोर मचाता था तो मैं उस नालायक को तुरंत बंद कर दिया करता था| और तब मैं, नींद की खुमारी से अलसाए अपने मन-मस्तिष्क, से आहिस्ता-अहिस्ता यह सोचा करता कि मुझे वाकई में अभी उठना चाहिए या नहीं|

......बिस्तर कितना गर्म और आरामदेह है| बाहर कितनी ठण्ड है, मैं अभी उठा तो बड़ी ठण्ड लगेगी|

......अरे नहीं, अब मुझे उठ ही जाना चाहिए| चलो पैर उठो| शाबाश उठो-उठो| हम्म... शायद, इस तरह तो मैं पैरों को नहीं उठाता हूँ? मेरे पैर मेरी बात ही नहीं सुन रहे|
        
......मुझे व्यायाम करने भी जाना चाहिए| हाँ जाना तो चाहिए... लेकिन अभी वर्जिश करने का बिलकुल भी मन नहीं कर रहा| अभी तो नाश्ता भी नहीं किया है| शायद मुझे पहले एक ब्रैड खा लेनी चाहिए, थोड़ा सा मक्खन लगा कर| आनंद ही आ जाएगा|


......शायद मैं सुबह कुछ ज्यादा जल्दी ही उठने की कोशिश कर रहा हूँ| मेरी नींद अभी भी पूरी नहीं हुई हैं| शायद अलार्म के साथ उठना सही नहीं है| मुझे कुछ अधिक नींद मिल जाए तो क्या मैं अच्छा काम नहीं करूँगा?

......मुझे अभी इसी वक्त उठने की जरुरत नहीं है, क्या वाकई है? अब पांच मिनट तो और सो ही सकता हूँ| मेरे अभी न उठने से दुनिया थोड़े ही रुक जाएगी|

[हम्म.............Zzzzzzz]

दो घंटे बाद....

मैं : “क्या वक्त हुआ है? मुझे तो याद भी नहीं कि अलार्म कब बजा था? हाँ, रेडियो पर गाना अच्छा  चल रहा था| अच्छा चलो, लगता है कि आज मुझे वर्जिश को छोडना पडेगा|”

श्रीमति : “अगर तुम्हें अलार्म बजने पर उठना ही नहीं है तो आखिर इसे रोज क्यों लगा देते हो?”
मैं : “अरे क्या वह मेरा अलार्म था? मुझे तो लगा कि रेडियो पर गाना बज रहा है|”

अब, ऐसा तो नहीं था कि मैं इसे रेडियो मान कर सवेरे जल्दी उठना ही नहीं चाहता था| मैंने वाकई में, जब अलार्म बजा तो, उठने का मन बनाया था लेकिन नींद से अलसाए मेरे मन-मस्तिष्क ने मुझे समझा-बुझा कर वापस सुला दिया|

चलिए वर्तमान समय में लौट आते है....     

अब मेरा अलार्म ४.०० से ५.०० के बीच बजता है...और किसी भी सूरत में ५.०० बजे से लेट नहीं, रविवार और छुट्टी के दिनों में भी| मैं कुछ ही पलों के भीतर इसे बंद कर देता हूँ| अपने सीने को फुलाकर गहरी साँस लेता हूँ और अपनी बाँहों को दो पलों के लिए चारों दिशाओं में घुमाता हूँ| जल्द ही मेरे पैर फर्श पर होते हैं और मैं कपडे पहनकर तैयार हो रहा होता हूँ, जबकि श्रीमतीजी गहरी नींद में सोई हुई होती हैं| मैं रसोई में जाकर कुछ फल उठा लेता हूँ और घर के अपने ऑफिस में ई-मेल पढ़ने पहुँच जाता हूँ, और तब तक ५:१५ हो जाते हैं जो कि मेरे जिम जाने का समय है|

परन्तु इस बार मेरे मस्तिष्क में कोई आवाज मुझसे तर्क-वितर्क नहीं कर रही होती कि मुझे क्या करना चाहिए? यहाँ तक कि इस बार कोई सकारात्मक आवाज भी वहाँ नहीं होती| सारी गतिविधी खुद-ब-खुद होती चली जाती है, वह भी मेरे, मानसिक रूप से, पूरी रूप से सजग होने से पहले ही| मैं यह नहीं कह सकता कि ऐसा करने के लिए मुझे किसी किस्म के आत्म-अनुशासन की जरुरत पड़ती है क्योंकि यह एक पूरी तरह से आदतन प्रतिक्रिया(conditioned response) हैं| यह कुछ ऐसा है जैसे कि मेरा सचेतन मन केवल मेरे साथ होता है जबकि मेरा अवचेतन मन मेरे शरीर को नियंत्रित कर रहा होता है| मैं केवल ‘पावलोव’ (http://en.wikipedia.org/wiki/Classical_conditioning) के श्वान (dog) की तरह प्रतिक्रिया देता हूँ| वास्तव में अलार्म के बजने पर न उठना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है|

खैर, आप आखिर कैसे पहली परिस्थिति से दूसरी परिस्थिति तक पहुँच सकते हैं?

पहले तो उस तरीके पर विचार करते हैं जोकि ज्यादातर लोग इसे समस्या को हल करने के लिए अपनाते हैं – जिसे मैं एक गलत तरीका मानता हूँ|

अपनी सचेतन इच्छाशक्ति का प्रयोग करके हर सुबह उठने की कोशिश करना एक गलत तरीका है| यह तरीका शायद कभी-कभार काम कर जाता है, परन्तु अच्छा होगा यदि हम इस सच्चाई को स्वीकार कर ही लें कि – जब आपका अलार्म बजता है तो आप नींद की खुमारी में हमेशा ही सही तरह से सोच-विचार नहीं कर सकते हैं| आप उस चीज का अनुभव कर सकते हैं जिसे मैं ‘मस्तिष्क को कोहरा’ कहता हूँ| उस अवस्था में आप जो निर्णय लेते हैं, जरूरी नहीं कि ठीक वैसा ही निर्णय आप पूरी तरह जागृत और सचेतन अवस्था में भी लें| ऐसी हालत में आप खुद पर भरोसा नहीं कर सकते... और न ही करना चाहिए|  

अगर आप इस पद्धति पर चलते हैं तो आप एक जाल में फंस जाऐंगे| आप पहले एक निश्चित समय पर उठने का निर्णय करेंगे, लेकिन अलार्म के बजते ही आप उस निर्णय से पलट जायेंगे| आप रात के १० बजे यह निर्णय लेंगे कि सुबह ५ बजे उठना एक अच्छा विचार रहेगा| लेकिन सुबह के ५ बजे आप यह फैसला लेंगे कि सुबह ८ बजे उठाना ज्यादा अच्छा रहेगा| परन्तु इसे स्वीकार कर लें कि – रात १० बजे वाला निर्णय ही वह निर्णय है जिस पर आप वास्तव में अमल करना चाहते हैं...अगर आप किसी तरह, सुबह ५ बजे वाली अपनी शख्सियत(self), को इस पर अमल करने के लिए मना सकें तो|

अब कुछ लोग, इस पहेली से सामना होने पर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उन्हें और ज्यादा अनुशासन की जरुरत है| और यह कुछ हद तक सही भी है, लेकिन उस तरीके से नहीं जैसेकि शायद आपने सोचा हो| अगर आपको सुबह ५ बजे उठना है तो सुबह ५ बजे आपको अधिक अनुशासन की जरुरत नहीं| आपको खुद को, ज्यादा बेहतर तरीके से समझाने की आवश्यकता नहीं| आपको दो या तीन अलार्म घड़ियों को कमरे में यहाँ-वहाँ छुपाकर रखने की जरुरत नहीं| और न ही आपको एक ऐसे अत्याधुनिक अलार्म की जरुरत है जिसे बंद करना लगभग असंभव हो|

असल में आपको पूरी तरह जाग्रत और सचेतन अवस्था में ज्यादा अनुशासन की जरुरत है – यह बात जानने का अनुशासन कि सुबह जब आप नींद की खुमारी में होते हैं तो आप खुद पर, समझदार और सचेत, निर्णय लेने के लिए भरोसा नहीं कर सकते| इस बात को स्वीकार करने के लिए अनुशासन की जरूरत है कि सुबह ५ बजे आप सही निगरानी नहीं कर पाएंगे| आपका सुबह ५ बजे वाला प्रशिक्षक (coach) काम नहीं करता, इसलिए आपको उसे बर्खास्त करने की जरुरत है|

तब आखिर असली समाधान है क्या? समाधान है अपना नुमाइंदा (deligate) नियुक्त कीजिए| समस्या को पूरी तरह से अपने अवचेतन मन के हवाले कर दीजिए| और अपने सचेतन मन को पूरी प्रक्रिया से बाहर कर दीजिए|

अब आप यह सब कैसे करेंगे? ठीक उसी तरह से जैसेकि आप दूसरे, दोहराए जा सकने वाले, हुनर(skill) सीखते हैं| आप तब तक अभ्यास करते रहते हैं जब तक इसे याद नहीं कर लेते| आखिरकार आपका अवचेतन मन इसे अपने हाथ में ले लेता है और सब कुछ खुद-ब-खुद होने लगता है|

यह सब सुनने में बेहद मूर्खतापूर्ण लगता है, लेकिन यह काम करता है| अलार्म के बजते है तुरंत उठने का अभ्यास कीजिए| जी हाँ – अभ्यास| परन्तु इसे सुबह मत कीजिए| इसे दिन के वक्त कीजिए जब आप पूरी तरह से जगे हुए हों|

अपने बेडरूम में जाइए, और अपने कमरे के माहौल को जितना हो सके अपने जागने के समय के माहौल के जैसा बना लीजिए| कमरे में अँधेरा कर दीजिए, या फिर शाम के वक्त तब अभ्यास कीजिए जबकि रौशनी कम होती है| अगर आप कुर्ते-पजामे में सोते है तो कुर्ता-पजामा पहन लीजिए| अगर आप सोने के पहले अपने दांत ब्रुश करते हैं तो ब्रश कर लीजिए| अगर आप सोने के पहले अपने कॉन्टेक्ट लेंस उतार देते हैं तो उन्हें भी उतार कर रख दीजिए|

अपना अलार्म पर कुछ मिनट आगे का समय सेट कर दीजिए| अपने बिस्तर पर लेट जाइए जैसेकि आप सो रहे हों, और अपने आँखें बंद कर लीजिए| नींद की अपने पसंदीदा स्थिति में आ जाईए| सोचिये, जैसेकि यह सुबह का वक्त हो...आपके जागने से कुछ मिनट पूर्व का समय| अभिनय कीजिए जैसेकि आप सचमुच ही सो रहे हों| कल्पना कीजिए कि आप सपने में किसी जगह को देख रहे हैं, या फिर अपने कमरे की ख़ामोशी को महसूस कीजिए और तनाव मुक्त हो जाईए|

अब, जब आपका अलार्म बजे तो जितना जल्दी हो सके इसे बंद कर दीजिए| फिर एक गहरी सांस लेकर अपने सीने को पूरा फुला लीजिए और फिर अपनी बाँहों को कुछ पलों के लिए चारों दिशाओं में फैला कर, अंगडाई लीजिए| फिर बैठ कर, अपने पैरों को जमीन पर रखिए और उठ जाईए| अपने चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान बिखेरिए...और फिर जो सबसे पहला काम आप जागने पर करते हैं, करने के लिए आगे बढ़ जाईए| मेरे लिए वह काम कपडे बदलना हैं|

अब खुद को झकझोरिए, फिर से जागने से पहले की अवस्था में आ जाईए, बिस्तर पर लौट जाईए, अपने अलार्म को फिर लगा दीजिए और दोहराइए| इसे कई बार तब तक दोहराएं जब तक यह इतना  सहज न हो जाए कि आप इस पूरी प्रक्रिया को बिना सोच-विचार किए ही पूरा कर सकें| अगर किसी भी चरण पर आपको सोचने की जरुरत पड़ती हैं (यानी कि आप अपने मन की आवाज सुनते है कि आगे क्या करना है?) तो मंजिल अभी दूर है|

बेशक, आपको इस प्रक्रिया का अभ्यास करने में कुछ दिनों तक कुछ सत्र(session) लगाने पड़ेंगे| इसे कुछ ऐसे समझिए जैसेकि आप जिम में व्यायाम को समूह(sets and reps) में दोहराते हैं| इसे दिन में अलग-अलग समय पर एक या दो बार दोहराइए...और एक वक्त में हो सके तो ३-१० बार|

जी हाँ, यह सब करने में कुछ वक्त तो लगेगा ही, लेकिन यह वक्त उस समय के मुकाबले में कुछ भी नहीं जोकि आप लंबे अरसे में बचा पाएंगे| आज कुछ घंटों का अभ्यास, हर वर्ष आपके कई सौ घंटे बचा सकता है|

जरूरी अभ्यास के बाद - मैं आपको कोई निश्चित अंदाजा तो नहीं दे सकता कि आपको ऐसा करने में आखिर कितना समय लगेगा, क्योंकि हरेक के लिए यह वक्त अलग-अलग होगा – आप अलार्म की आवाज के प्रति एक नयी मनोविज्ञानिक प्रतिक्रिया की आदत डालेंगे| जब भी आपका अलार्म बजेगा, आप खुद-ब-खुद ही उठ जाएंगे, बिना इस बारे में सोचे| आप जितना अधिक इस तरीके का अभ्यास करेंगे, यह उतना ही शक्तिशाली बनता जाएगा| आखिरकार, अलार्म के बजने पर न उठना आपके लिए असहज हो जाएगा| यह कुछ ऐसा होगा जैसीकि आप पजामे को, उलटा पैर पहले डाल कर पहनने की कोशिश करें|

अगर आप कल्पना करने में माहिर हैं तो आप मन में भी अभ्यास कर सकते हैं| मानसिक अभ्यास अधिक तेजी से किया जा सकता है, लेकिन मेरे विचार से पूरी प्रक्रिया को शारीरिक रूप से करना ज्यादा बेहतर रहेगा| अगर आप केवल मानसिक अभ्यास करते हैं तो इस बात की सम्भावना है कि आप कुछ छोटी पर जरूरी बारीकियां को छोड दें, और फिर आप यह भी तो चाहते हैं कि आपका अवचेतन मन, इस अनुभव को उसके वास्तविक रूप में ग्रहण करे| इसलिए आप मानसिक अभ्यास अवश्य करें, परन्तु शुरुआत में, कई बार इसे शारीरिक रूप से जरुर दोहरा लें|

अपने जागने के इस तरीके का, आप जितना अभ्यास करेंगे, आपके अवचेतन मन में इस आदत की छाप उतनी ही गहरी होती चली जाएगी| अलार्म बजता है – आप तुरंत उठ जाते हैं| अलार्म बजता है – आप तुरंत उठ जाते हैं| अलार्म बजता है – आप तुरंत उठ जाते हैं|

एक बार यह आपकी रोजाना की आदत बन जाए तो फिर आपको दिन में इसका अभ्यास करने की जरूरत नहीं| इस तरह की आदत खुद को ही सहारा देती है| आपको इस आदत डालने के चक्र से केवल एक बार ही गुजरना पडेगा| और फिर यह आदत, आपका जीवन भर साथ देगी जब तक कि आप इसे बदलने का इरादा न कर लें| अगर किसी वजह से आपको यह आदत छोडनी भी पड़ती हैं (जैसे कि मान लीजिए कि आपको विदेश में लंबी छुट्टी बितानी पडे जहां का समय-छेत्र (Time-zone) आपके समय-छेत्र से अलग हो), तो भी आपको यह आदत दोबारा डालने में खास मुश्किल नहीं होगी| इसे मांसपेशियों की याददाश्त की तरह समझिए| एक बार आपने इस तरीके को अवचेतन मन में बैठा लिया तो बेशक इस पर कुछ धूल-मिट्टी जम जाए लेकिन यह फिर भी वहीं रहेगी|

अगर आप पर्याप्त रूप से दोहराते हैं तो, कोई भी व्यावहारिक स्वरूप(pattern) जोकि आप अलार्म के बजने पर अनुभव करेंगे, वह खुद को सहारा देने वाला बन जाएगा| संभावना इसी बात की है कि आपके पास पहले से ही एक भली-प्रकार से स्थापित सुबह-जागने का तरीका है, लेकिन यह वैसा नहीं है जैसे कि आप चाहते हैं| जितना ज्यादा आप अपने वर्तमान तरीके का अभ्यास करेंगे इसकी छाप आपके अवचेतन मन में उतनी ही गहरी होती जाएगी| जब भी आप अलार्म के बजने पर उठने में असफल रहते हैं, उतनी ही ज्यादा यह आपकी स्वाभाविक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया बनती जाती है| अगर आपको इस व्यवहार को बदलना है तो, आपको सचेत रहकर इसमें सुधार करने की ऐसी किसी योजना का बीडा उठाना होगा जैसे कि मैंने इससे ऊपर बताया है|

सुबह उठाने की अपनी खराब आदतों के लिए खुद को धिक्कारने से काम नहीं बनेगा – हकीकत में, इस तरह तो आप, मानसिक रूप से खुद को धिक्कारने को, उस दिनचर्या का ही एक हिस्सा बना लेंगे जिसे आप बदलना चाहते हैं| इतना ही नहीं, अब अलार्म के बजने पर न सिर्फ आप देर से उठेंगे बल्कि इसके लिए आप खुद को अपने आप धिक्कारने भी लगेंगे| यह कितना पंगु कर देना वाला है? क्या आप वाकई में उस अनाड़ी तरीके को जिंदगी भर दोहराते रहेंगे? वास्तव में यही होगा अगर आप एक ज्यादा समर्थ बनाने वाले तरीके को अपनाने का बीडा नहीं उठाते| अब अच्छीं हो या कि खराब, आपकी आदतें ही आपको बना या बिगाड़ सकती हैं|

एक बार आपने, अपने मनचाहे ‘सुबह जागने के तरीके’ को स्थापित कर लिया, तो मेरी सलाह यही होगी कि आप इसे छोडें नहीं – हफ्ते के सातों दिन – साल के ३६५ दिन| और पहले ३० दिन तो आप, अपना अलार्म रोजाना एक नियत समय पर ही सेट करें| एक बार आदत स्थापित हो जाए फिर आप अपने उठने के समय को घटा-बढ़ा सकते हैं या फिर कभी-कभार, जब आपको नींद की ज्यादा जरुरत हो आप अलार्म के बिना भी उठ सकते हैं, लेकिन तब तक यही सही रहेगा कि आप इस तरीके पर कड़ाई से अमल करें| इस तरीके से यह आपका स्वाभाविक व्यवहार बन जाएगा, और तब आप कभी-कभार इससे अलग भी हो सकते हैं वह भी इस आदत को बिगाड़ने के डर के बिना|

मुझे पूरा विश्वास है कि एक बार आपने यह आदत डाल ली तो आप पूरी तरह से इसके दीवाने हो जाएंगे| मैं तो इसे अपनी सबसे उपयोगी आदतों में से एक मानता हूँ| यह आदत, साल भर में, मेरे लिए कई सौ घंटे का समय बचाती है, और दिन-प्रतिदिन मुझे इसका ब्याज भी मिलता रहता है| यह आदत मेरे, ‘कई-चरणों में निद्रा’(लेख जल्द ही उपलब्ध होगा) के प्रयोग के दौरान बहुत ही मददगार साबित हुई|

ज़रा इस पर विचार करे – अगर आप एक दिन में ३० मिनट भी देर तक सोते हैं तो साल भर में यह कुल १८०+ घंटे बैठते हैं| अगर आप ६० मिनट ज्यादा सोते हैं तो यह एक साल में ३६५ घंटे हुए, यह ४०-घंटों के एक हफ्ते के बराबर हुआ| यह काफी अधिक वक्त है| अब मैं आप के बारे में तो नहीं जानता लेकिन मैं तो इस वक्त का उपयोग ज्यादा रचनात्मक कार्यों में करना पसंद करूँगा बजाए बिस्तर पर, जरुरत से ज्यादा वक्त तक, पडे रहने के|

मैं चाहूँगा कि आप इस तरीके को एक बार आजमा कर जरुर देखें| मैं जानता हूँ कि जागने का अभ्यास करना दिखने में जरुर बचकाना सा लगता है, लेकिन क्या बुरा है अगर यह काम करता है तो? क्या होगा जब यह बात तयशुदा हो कि अगर आप एक निश्चित समय का अलार्म लगाते हैं तो चाहे दुनिया इधर की उधर क्यों न हो जाये आप उस वक्त जरुर उठ जाएंगे| ऐसा कोई कारण नहीं कि आप, अगले कुछ दिनों में, खुद के लिए ऐसा नहीं कर पाएंगे| करत-करत अभ्यास के जड़मत होत सुजान|

और अगर आपको सुबह उठाने की आदत डालने के लिए कुछ सलाह चाहिए तो मैं आपका ध्यान निम्नलिखित इन दो लेखों की ओर दिलाना चाहूँगा|

*    सुबह जल्दी कैसे उठें (जल्द ही उपलब्ध होगा)
*    सुबह जल्दी कैसे उठें - भाग २ (जल्द ही उपलब्ध होगा)

इन्हें पढ़िए डालिए| आपको कभी भी इसका अफ़सोस नहीं होगा|

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