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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

सुबह जल्दी कैसे उठें ?

(Original Post : How to Become an Early Riser May 23rd, 2005 by Steve Pavlina)    

“सवेरे सूरज निकलने से पहले उठना अच्छा होता है, ऐसी आदतें आपके स्वास्थ्य, धन और बुद्धी के विकास में सहायक होती हैं|”-अरस्तू

क्या सुबह जल्दी उठने वाले लोग पैदायशी ऐसे होते हैं या फिर बनाए जाते हैं? मेरे मामले में तो वे पैदायशी ही ऐसे होते थे| जब मैं २० वर्ष का था, तो मैं शायद ही कभी आधी रात से पहले सोने जाता था, और लगभग हमेशा ही देर तक सोता रहता था| और आम तौर पर मेरी दिनचर्या दोपहर बाद से ही शुरू होती थी|

परन्तु कुछ समय के बाद मेरे लिए, अपने खुद के जीवन में, सफलता और सुबह जल्दी उठने के बीच के उच्च सम्बंध को नकारना मुश्किल हो गया| कभी-कभार, उन दुर्लभ मौकों पर जब मैं सुबह जल्दी उठ सका मैनें पाया कि मेरी उत्पादकता लगभग हमेशा ही उच्च-स्तर पर बनी रहती थी, वह भी न केवल सुबह के वक्त बल्कि पूरे दिन| और मुझे अपनी सेहत भी कहीं बेहतर महसूस होती थी| मैं जुझारू तो हमेशा से था ही, इसलिए मैंने सुबह जल्दी उठने की आदत डालने का पक्का इरादा कर लिया| मैंने तुरंत सुबह ५ बजे का अपना अलार्म लगाया और सो गया...

...और अगली सुबह, मैं दोपहर से कुछ वक्त पहले ही उठा|

हम्म...

मैंने फिर कई बार कोशिश की, लेकिन कोई खास सफलता नहीं मिली| मुझे लगने लगा कि सुबह जल्दी उठने का गुण मेरे जींस(genes) में ही नहीं है| जब भी मेरा अलार्म बजता, तो मेरे मन में पहला विचार यही आता कि उस कानफोडू शोर को बंद किया जाए और नीदं पूरी की जाए| कई सालों तक मेरी यह आदत ऐसे ही बनी रही, लेकिन आखिरकार, नीदं पर आधारित कुछ खोजों(research) के परिणाम मेरे हाथ लगे जिनमें बताया गया था कि मैं समस्या को गलत तरीके से सुलझाने का पर्यास कर रहा था| एक बार मैंने उन विचारों को अमल में लाना शुरू किया तो धीरे-धीरे, लगातार सुबह जल्दी उठने की, काबलियत मैंने हासिल कर ली|

गलत योजना का प्रयोग करके सुबह जल्दी उठना कठिन है, लेकिन सही योजना के साथ, यह अपेक्षाकृत आसान हो जाता है|

सबसे आम गलत तरीका तो यह है कि आप यह मानते हैं कि क्योंकि आपको सुबह जल्दी उठना है, इसलिए यही बेहतर रहेगा कि आप रात को जल्दी सो जाएँ| आप हिसाब लगाते हैं कि आप अभी कितनी नींद ले रहे हैं, और फिर सोने के वक्त को कुछ घंटे पीछे खिसका देते हैं| अगर आप अभी आधी रात से सुबह के ८ बजे तक सोते हैं, तो आप हिसाब लगाते हैं कि आप रात के १० बजे सोने चले जाएंगे और फिर सुबह ६ बजे उठ जाएंगे| यह तरीका सुनने में ठीक लगता है, लेकिन यह आम तौर पर काम नहीं करता|

ऐसा लगता है जैसे कि नींद के तरीकों के बारे में दो मुख्य अवधारणाएं हैं. पहली धारणा है कि आपको रोजाना एक नियत वक्त पर ही सोना और जागना चाहिए| यह ऐसा है जैसे कि आपने दोनों तरफ एक अलार्म घड़ी लगा रखी हो - और आप हर रोज तय समय पर सोने की कोशिश करते हैं| यह वर्तमान आधुनिक समाज में रहने के लिए व्यवहारिक भी है| हमें अपनी समय-सारणी(time-table) में स्थिरता की जरूरत होती है| और हमें उचित मात्रा में आराम भी तो चाहिए|

दूसरी धारणा यह है कि आपको अपने शारीरिक जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए और बिस्तर पर तभी  जाना चाहिए जब आप थके हुए हों, और तब उठना चाहिए जब आपकी नींद पूरी हो जाए| यह धारणा, जीवविज्ञान पर आधारित है| हमारे शरीर को पता होना चाहिए कि हमें कितने आराम की जरुरत है, इसलिए हमें इसकी सुननी चाहिए|

‘कोशिश करो और गलतियों से सीखो’ विधि से, मैंने पाया कि नींद के बारे में ये दोनों धारणाएं ही बहुत अच्छी नहीं हैं| अगर आप उत्पादकता की परवाह करते है तो ये दोनों धारणाएं ही गलत हैं| क्यों, चलिए पता करते हैं|

अगर आप तय समय पर सोते हैं, तो कई बार आप जब बिस्तर पर जाएंगे तो आप थके हुए (उनींदे) नहीं होंगे| अगर आपको हर रोज सोने मे पांच मिनट से ज्यादा का समय लगता है तो आप उनीदें नहीं हैं| आप, बिस्तर पर सोने के बजाए, जगे रहकर अपना समय व्यर्थ कर रहे है| दूसरी समस्या यह है कि आप मानते हैं कि आपके सोने की अवधि हर रात एक जैसी होनी चाहिए, जोकि एक गलत धारणा है, आपके सोने की अवधि हर रोज बदलती रहती है|

अगर आप शरीर के कहे अनुसार नींद लेते हैं तो आप शायद जरुरत से ज्यादा नींद ले रहे हैं – कई मामलों में तो बहुत ज्यादा, जैसे कि हर हफ्ते १०-१५ घंटे अधिक (लगभग एक पूरे कार्य-दिवस के बराबर)| बहुत से लोग जो इस तरह से सोते है वे ८ से ज्यादा घंटों की नींद हर रोज लेते हैं, जो कि आम-तौर पर काफी ज्यादा है| इसके अलावा अगर आप हर रोज अलग वक्त पर उठते हैं तो फिर आप सुबह जागने के अपने वक्त का पूर्व-अनुमान भी नहीं लगा सकते| और चूँकि हमारी प्राकृतिक लय-ताल कभी-कभी घड़ी के २४ घंटों के समय-चक्र से भिन्न हो जाती है, आप पाएंगे कि आपका उठने का समय धीरे-धीरे बदलने लगा है|

मेरे लिए दोनों तरीकों को एक साथ जोड़ना सबसे बढ़िया समाधान रहा| यह बहुत ही आसान है, और कई लोग जोकि सुबह जल्दी उठते हैं वे ऐसा करते भी है हालाँकि वे इसके बारे में शायद ही कभी सोचते हों, बावजूद इसके, यह खोज मेरे लिए तो कमाल की साबित हुई| समाधान यह है कि मैं सोने तब जाऊं जब मुझे नींद आ रही हो (और केवल तभी जब मैं वाकई में उनींदा हूँ) और सुबह अपना अलार्म लगा कर एक नियत समय पर उठ जाऊं (वह भी हफ्ते के सातों दिन)| इस तरह मैं सुबह हमेशा एक तय वक्त पर उठ जाता हूँ (जोकि मेरे लिए सुबह ५ बजे का वक्त है), लेकिन हर रोज, मेरे बिस्तर पर जाने का कोई तय समय नहीं है|

मैं सोने तब जाता हूँ जब मुझसे जागे रहना कठिन हो जाता है| उनींदेपन की मेरी कसौटी यह है कि जब मेरे लिए किसी किताब के एक से अधिक पन्नों को, बिना झपकी लिए, पढ़ना मुश्किल हो जाए तो मैं समझ जाता हूँ कि अब मुझे सो जाना चाहिए| ज्यादातर बार जब मैं बिस्तर पर जाता हूँ तो २ या ३ मिनट में ही मुझे नींद आ जाती है| मैं आराम से लेट जाता हूँ और तुरंत ही नींद मुझे अपने आगोश में ले लेती है| कभी-कभी मैं रात को ९:३० बजे सोने चला जाता हूँ तो कभी-कभी मैं आधी रात तक जगा रहता हूँ| ज्यादातर मैं रात को १०-११ बजे तक सोने चला ही जाता हूँ| अगर मुझे नींद नहीं आ रही होती है तो मैं तब तक जगा रहता हूँ जब तक कि मेरी पलकें नीद से बोझिल नहीं होने लगती हैं| इस दौरान किताब पढ़ना एक बहुत बढ़िया गतिविधी है क्योंकि यह स्पष्ट रहता है कि कब मैं इतना उनींदा हो गया हूँ कि मेरे लिए पढ़ना मुश्किल हो जाए|

हर सुबह, जब मेरा अलार्म बजता है तो मैं इसे बंद कर देता हूँ, अंगडाई लेता हूँ और उठ कर बैठ जाता हूँ| मैं इसे बारे में नहीं सोचता| मैंने सीख लिया है कि मुझे उठने में जितना अधिक समय लगेगा, मेरे दोबारा सोने की संभावना उतनी ही बढ़ जाएगी| इसलिए, एक बार अलार्म बजने के बाद मैं खुद को ‘नींद की फायदों’ के बारे में विचार करने की इजाजत नहीं देता| अगर मेरा सोने का मन है तो भी मैं हमेशा ही तुरंत उठ जाता हूँ|

इस तरीके पर कुछ दिनों तक अमल करने के बाद मैंने पाया कि मेरा सोने का तरीका एक स्वाभाविक लय-ताल में ढल चुका है| अगर मैं एक रात कम सोता हूँ तो अगली रात मुझे अपने आप ही जल्दी नींद आने लगेगी और नतीजतन मैं ज्यादा नींद ले पाऊँगा| और अगर मुझमे काफी ऊर्जा है और मैं थका हुआ नहीं हूँ तो मेरी नींद का समय कम होगा| मेरे शरीर ने सीख लिया है कि मुझे कब सुलाना है क्योंकि यह जानता है कि मैं हमेशा ही एक नियत समय पर उठता हूँ और मेरे उठने का समय आगे-पीछे नहीं होता|

इसका एक सह-प्रभाव(side effect) यह है कि मैं हर रात लगभग डेढ़ घंटा कम सोता हूँ, लेकिन वास्तव में मैं कहीं ज्यादा तरोताजा महसूस करता हूँ| जब मैं बिस्तर पर होता हूँ तो लगभग पूरा ही वक्त सोया रहता हूँ|

मैंने कहीं पढ़ा है कि सबसे अधिक अनिद्रा-पीड़ित (नींद न आने की बीमारी से ग्रसित) वही व्यक्ति होते हैं जोकि नींद न आने पर भी बिस्तर पर लेटे रहते हैं| अगर आपको नींद नहीं आ रही है और आप कोशिश करने पर भी नहीं सो पा रहे तो उठ जाइए और थोड़ी देर तक जगे रहिए| नींद का उस वक्त तक प्रतिरोध कीजिए जब तक कि आपका शरीर उन तत्वों(harmones) को रक्त में छोडना न शुरू कर दे जोकि आपको सुला दें| अगर आप केवल उस वक्त बिस्तर पर जाएँ जब कि आप उनींदे हों और फिर एक निश्चित समय पर उठ जाएँ तो आप, अपने अनिद्रा रोग का ईलाज कर लेंगे| पहली रात आप देर तक जागेंगे, लेकिन आप बिस्तर पर लेटते ही तुरंत सो जाएंगे| आप शायद पहले दिन, सुबह जल्दी उठने और रात को केवल कुछ घंटों की नींद मिलने की वजह से, जरुर कुछ थकान महसूस करेंगे, लेकिन जैसे-तैसे आप दिन गुजार लेंगे और दूसरी रात आप जल्दी सो जाना चाहेंगे| कुछ दिनों की बाद आप खुद को, एक नियत समय पर बिस्तर पर जाने और उसी समय तुरंत सो जाने के, एक तरीके के मुताबिक़ ढाल लेंगे|       

अगर आप सुबह जल्दी उठना चाहते हैं (या फिर अपने सोने के तरीके पर ज्यादा नियंत्रण चाहते हैं) तो इसे आजमायें : बिस्तर पर केवल तभी जाएँ जब आप इतने उनींदे हो कि आपके लिए जगे रहना मुश्किल हो, और हर रोज सुबह एक नियत समय पर उठ जाएँ|

(और अधिक जानकारी और स्पष्टता के लिए कृपया अगली पोस्ट ‘सुबह जल्दी कैसे उठें – भाग २’ (जल्द ही उपलब्ध होगा) जरुर पढ़ें| और अगर आप नींद के तरीकों पर नए प्रयोगों के बारे में पढ़ना चाहते हैं तो ‘कई-चरणों में निद्रा’ (लेख जल्द ही उपलब्ध होगा) जरुर पढ़ें|

सम्बंधित लेख ‘कैसे आप अलार्म के बजते ही फ़ौरन उठ सकते हैं?’        

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11 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक आलेख...अवश्य ही प्रयाश करूँगा...इसके लिए शुक्रिया

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  2. saarthak aalekh pahale kabhi in baaton par gour nahi kiya tha ...best wishes ...http://mhare-anubhav.blogspot.com/ iske saath-saath naye blog aapki pasand par bhi aapka svagat hai samay mile to zarur aaiyegaa meri post par

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  3. आलेख पसंद करने के लिए आप सभी का हिर्दय से धन्यवाद|
    जीवन में सकारात्मक परिवर्तनों के लिए आपको प्रेरित करना ही मेरा प्रयास है|
    आशा ही आप आगे भी ऐसे ही मेरा होंसला बढ़ाते रहेंगे|

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  4. बहुत उपयोगी बातें हैं..... धन्यवाद इस सुंदर पोस्ट के लिए

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  5. अरे वाह! बहुत ही उपयोगी लेख है यह....

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  6. बहुत सुन्दर और सार्थक - मगर विज्ञानं के कुछ और भी पहलू हैं.

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  7. अतीव उपयोगी लेख !! सबसे बड़ी बात यह नियम बनाने की है की जब तक नीद न आ जाये तब तक किताब पढ़ते रहना चाहिए बहुत ह अच्छा सुझाव है

    आपका बहुत बहुत धन्यवाद

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  8. शुक्रिया अमित जी, इस लेख का दूसरा भाग पढ़ना ना भूलें|

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