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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

सुबह जल्दी कैसे उठें – भाग २

(Original Post : How to Become an Early Riser – Part II May 31st, 2005 by Steve Pavlina)    
सुबह जल्दी उठना, चूँकि काफी लोगों की दिलचस्पी का विषय है इसलिए मुझे (स्टीव पव्लिना को) लगता है कि इस विषय को और अधिक विस्तार देते हुए मुझे एक अतिरिक्त लेख लिखना चाहिए| (आप इसे लेख के पहले भाग को आप यहाँ पढ़ सकते हैं – “सुबह जल्दी कैसे उठें?”)

सबसे पहले तो ‘उनींदे होने पर ही बिस्तर पर जाने’, के विषय पर कुछ विचार, इसे सही तरीके से करने के लिए आपको जागरूकता और सामान्य ज्ञान के सही मिश्रण की जरूरत पड़ेगी|

अगर आप बिस्तर पर जाने से पहले कोई रोमांचक(stimulating) कार्य कर रहे हैं तो आप रात को देर तक जगे रहेंगे और नींद आपसे कोसों दूर रहेगी| कॉलेज के दौरान मैं ‘पोकर’ (ताश के पत्तों का खेल) का बड़ा शौकीन था जिसके लंबे दौर सुबह भोर तक चलते रहते थे, और फिर उसके बाद हम नाश्ता करने के लिए घर से बाहर निकल जाते थे| मैं आसानी से अपने सामान्य ‘सोने के वक्त’ को पीछे ढकेल सकता हूँ अगर मैं काम में व्यस्त हूँ, अपने दोस्तों के साथ बाहर हूँ या फिर कोई रोमांचक कार्य कर रहा हूँ

परन्तु मेरा यह अभिप्राय बिलकुल नहीं था जब मैंने उनींदा होने पर ध्यान देने के बारे में आपसे कहा था| मैंने उनींदे होने की कसौटी, जिसमें नींद न आने तक, किताब के एक से अधिक पन्नों को, बिना एकाग्रता खोए, पढ़ने का जिक्र किया था| अब इसका यह अर्थ बिलकुल भी नहीं है कि आप, थकान से गश खाकर गिरने, तक नींद का इंतज़ार करते रहें|

उनींदे होने की जिस अवस्था की बात मैं यहाँ कर रहा हूँ वह तब बनती है जबकि आपका मस्तिष्क, रक्त में ऐसे तत्वों(hormones) को छोडना शुरू कर देता हैं जिनसे कि आपको नींद आने लगती हैं| यह केवल थके होने से अलग है| आपको वास्तव में ऐसा महसूस होता है जैसेकि नींद आप पर हावी हो रही है| परन्तु इस अवस्था में पहुँचने के लिए आपको इसके लिए सही हालात बनाने होंगे| इसके लिए आपको सोने से पहले अपनी सक्रियता को कम करना होगा (“अगर आपका मस्तिष्क सक्रिय है तो आपके शरीर का सोना मुश्किल है”-सतीश)| मैंने पाया है कि, सोने से पहले, पढ़ना तनाव-मुक्त होने का एक काफी अच्छा तरीका है| कुछ लोग कहते हैं कि बिस्तर में पढ़ना एक बुरा विचार है और आपको सोने के वक्त केवल आराम ही करना चाहिए| हालाँकि मुझे इससे कभी कोई दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि जब मुझ पर नींद हावी होने लगती है और पढ़ना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है तो मैं किताब एक तरफ रख कर सो जाता हूँ| लेकिन अगर आप चाहें तो कुर्सी पर बैठकर भी पढ़ सकते हैं|

इसे जांचने की एक अन्य कसौटी यह है कि आप खुद से पूछिए कि “अगर मैं अभी बिस्तर पर सोने चला जाऊं तो मुझे नींद आने में कितना समय लगेगा?” अगर आप सोचते हैं कि आपको नींद आने में १५ मिनट से अधिक का समय लगेगा तो मैं तो यही कहूँगा कि आप आगे बढिए और जागते  रहिए|

एक बार आपने, अपने जागने का समय निर्धारित कर लिया, तो आपको सोने के सही समय की अपनी परिधि का पता करने में कुछ अभ्यास की जरूरत होगी| शुरुआत में हो सकता है कि आपको काफी उतार-चढाव देखने को मिलें, एक रात हो सकता है आप बहुत देर से सोएं और दूसरे दिन काफी पहले ही सोने चलें जाएँ| लेकिन, आखिरकार आप यह समझ जाऐंगे कि आपको बिस्तर पर कब जाना चाहिए ताकि आप बिस्तर पर जाते ही तुरंत सो जाएँ और अगले दिन सुबह तारो-ताजा होकर उठ सकें|

इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि आप कहीं बहुत ज्यादा देर तक न जगे रहें आप खुद के सोने के लिए एक समय निश्चित कर सकते हैं, और उस वक्त आप बिस्तर पर चलें जाएँ चाहे जो भी हो| मेरा नींद का समय कितना हो इसका मुझे एक मोटा सा अनुमान है| अगर हर रात मैं ६:५० घंटे सो लेता हूँ तो मेरी नींद पूरी हो जाती है, लेकिन मैं ५ घंटे में भी काम चला सकता हूँ बशर्ते कि ऐसा मैं कभी-कभार ही करूँ| मेरे सोने का अधिकतम समय ७.५० घंटे रहा है| सुबह एक निश्चित वक्त पर उठना शुरू करने से पहले मैं ८-९ घंटे सोता था और अगर मैं ज्यादा थका हुआ होता था तो मेरे सोने की अवधि १० घंटे तक पहुँच जाती थी|

अगर आप दिन में चाय या कॉफी अधिक पीते हैं तो इसका असर आपके नींद के चक्र पर भी पड़ता है| पहले लेख में यह मान लिया गया था कि आप खुद को जागे रखने के लिए कैफीन(चाय-कॉफी में पाया जाने वाला वह तत्व जो नींद को दूर रखता है) का सेवन नहीं कर रहे हैं| अगर आप कैफीन की लत के शिकार हैं तो पहले आपको अधिक चाय-कॉफी पीने की अपनी आदत को छोडना होगा (चाय व कॉफी की लत को कैसे छोडें - लेख जल्द ही उपलब्ध होगा)| अगर आप ऐसी किसी लत (addiction) के शिकार हैं तो कुदरती रूप से सही समय पर नींद आने की अपेक्षा न करें|

पहले लेख का मकसद, यह बतलाना था कि सुबह जल्दी उठने की आदत को कैसे विकसित किया जाए? इसलिए सभी सुझावों की दिशा, आदत डालने की तरफ थी| एक बार आपने आदत डाल ली  तो यह अवचेतन मन के नियंत्रण में आ जाती है| हो सकता है कि आप कोई सतर्क गतिविधी जैसे कि अपना कार्य या फिर विडियो गेम में व्यस्त हैं, तो भी आपको पता लग जाएगा कि अब सोने का समय हो गया है, हालाँकि यह वक्त हर रात को अलग-अलग हो सकता है| ‘नींद की कसौटी’, आदत डालने के लिए जरूरी है, लेकिन उसके बाद हलके संकेत, इसकी जगह ले लेंगे|

अगर आपको जरूरत है तो जब-तब आप देर से भी सो सकते हैं| अगर मैं सुबह ३ बजे तक जगा रहूँ, तो अगली सुबह मैं ५ बजे बेशक नहीं उठ सकता| लेकिन उससे अगले दिन मैं फिर से अपनी सामान्य दिनचर्या पर वापस लौट आऊँगा|

मैं आपको यही सलाह दूंगा कि, यह आदत डालने के लिए, आप लगातार ३० दिनों तक एक तय वक्त पर ही उठें, क्योंकि उसके बाद आप, एक नियत वक्त पर उठने की, अपनी आदत के मुताबिक इतना ढल जाएंगे कि सोते रहना मुश्किल लगने लगेगा| एक बार रविवार को मैंने तय किया कि मैं सुबह देर तक सोऊँगा और मैंने अपना अलार्म नहीं लगाया, लेकिन अपने-आप ही सुबह ४.५८ मेरी आँख खुल गई| फिर मैंने सोये रहने की कोशिश की लेकिन मैं पूरी तरह से जगा हुआ था और फिर दोबारा नहीं सो पाया| जी हाँ, एक बार आदत डल जाए तो जल्दी उठने में बिलकुल भी मुश्किल नहीं होती है, बशर्ते अगर आप उनींदे होने पर सोने चलें जाएँ|

अगर आपके बच्चे हैं तो जरुरत के हिसाब से बदलाव करें| मेरे एक बच्चा ५ साल और एक बच्चा १ साल का है| कई बार वे मुझे आधी रात को ही जगा देते हैं – मेरी बच्ची को ऐसा करने की आदत है, वह, आहिस्ता से, बेडरूम में, श्रीमतीजी और मुझसे, अपने सपने के बारे में जिक्र करती है और कभी-कभी तो बस यूँ ही बतियाने लगती है| मैं जानता हूँ कि जब एक छोटा शिशु, हर कुछ घंटों के बाद आपको जगा देता है तो कैसा लगता है? अगर आप ऐसी स्थिति में हैं तो मेरी सलाह यह है कि आपको जब मौका लगे सो लीजिए| आखिर, छोटे शिशु अपनी समय-सारणी(Time-table) खुद ही बनाते हैं|

अगर आप अलार्म बजने पर बिस्तर से नहीं उठ पाते हैं तो इसका एक संभावित कारण, आत्म-अनुशासन की कमी हो सकती है| अगर आप में पर्याप्त आत्म-अनुशासन है तो, चाहे जो हो, आप बिस्तर से जल्दी जरुर उठ पाऐंगे| प्रेरणा भी काम आ सकती है लेकिन प्रेरणा अल्प-आयु(short-lived) होती है और कुछ ही दिनों तक टिक पाती है| अनुशासन एक मांसपेशी की तरह है| इसे आप जितना विकसित करेंगे, आप इस पर उतना ही भरोसा कर पाएंगे| कुछ अनुशासन तो हरेक के पास होता ही है (क्या आप अपनी सांसें कुछ पलों तक रोक सकते हैं?), लेकिन हर कोई इसे विकसित नहीं करता है| अनुशासन का विकास करने के काफी तरीके हैं – इसे विस्तार से जानने के लिए आप “आत्म-अनुशासन पर छह-भागों की श्रंखला” पढ़ सकते हैं| मूल रूप से यह छोटी चुनौतियों से शुरुआत करके, उन पर विजय पाते हुए, धीरे-धीरे बड़ी चुनौतियों को स्वीकार करने की एक प्रक्रिया है| यह क्रमिक भार-प्रशिक्षण (progressive weight training) की तरह ही है| जैसे-जैसे आपका आत्म-अनुशासन मजबूत होता जाता है, एक तय समय पर बिस्तर से उठने जैसे चुनौतियाँ, आखिरकार, बेहद आसान लगने लगती हैं| लेकिन अगर आपका आत्म-अनुशासन लचर हैं तो फिर इस बाधा को पार करना असंभव सा कार्य हो जाता है|

सुबह जल्दी क्यों उठें?
मेरी राय तो इस बारे में यह है कि इससे आपको वे चीजें करने के लिए काफी वक्त मिल जाता है जोकि सोये रहने से ज्यादा जरूरी हैं| 
   
फिर, ऐसा करने पर मैं हर हफ्ते १०-१५ घंटे तक बचा लेता हूँ| यह अतिरिक्त समय ध्यान देने योग्य है| सुबह ६.३० बजे तक, मैं व्यायाम, नहाना, नाश्ता करना आदि, दैनिक कार्यों से निपट चुका होता हूँ, और मैं अपनी टेबल पर काम करने के लिए बिलकुल तैयार होता हूँ| मैं, हर रोज, रचनात्मक कार्यों में अपना काफी वक्त दे पाता हूँ और अमूनन शाम ५.०० बजे तक अपना काम पूरा कर चुका होता हूँ (इसमें व्यक्तिगत कार्य जैसेकि ई-मेल पढ़ना, बिल चुकाना, अपनी बिटिया को नर्सरी स्कूल से घर लाना आदि शामिल होते हैं)| इससे मुझे हर शाम, ५-६ घंटों का अतिरिक्त समय, अपने परिवार, फुर्सत के कार्यों, पढ़ने, डायरी लिखने, और अन्य कार्यों के लिए मिल जाता है| और सबसे अच्छी बात तो यह है कि मुझमें इस दौरान भी काफी ऊर्जा रहती है| हर चीज के लिए वक्त निकाल पाने की वजह से मैं काफी संतुलित, तनाव मुक्त और आशावादी महसूस करता हूँ|

ज़रा इस बारे में सोचिए कि आप उस अतिरिक्त समय में क्या कर सकते है? यहाँ तक कि हर रोज  केवल अतिरिक्त ३० मिनट भी व्यायाम करने, हर महीने एक-दो किताब पढ़ने, ब्लॉग लिखने, ध्यान लगाने, सहेतमंद खाना बनाने या संगीत का एक साज(instrument) सीखने के लिए काफी हैं| हर रोज, थोड़ा सा अतिरिक्त समय, भी एक साल के दौरान जुड़ते-जुड़ते काफी अधिक हो जाता है| हर रोज ३० मिनट बचाने पर, एक साल के दौरान १८२.५ घंटों का अतिरिक्त समय मिल जाता है| यह एक पूरे महीने फुल-टाईम काम करने के बराबर है (हफ्ते के ४० घंटे)| इसे दोगुना कर दें अगर आप रोजाना १ घंटा बचाते हैं और इसे तिगुना कर दें अगर आप रोजाना ९० मिनट बचाते हैं| मेरे लिए यह बचत रोजाना करीब ९० मिनट की थी| यह ऐसा है जैसे कि हर दस साल के बाद आपको एक साल मुफ्त बोनस के रूप में मिल जाए| इस समय का उपयोग मैं उन कार्यों को करने के लिए कर रहा हूँ जिन्हें करने के लिए पहले मुझे समय ही नहीं मिलता था| यह एहसास कमाल का है|

अलार्म के साथ उठने में सहायता के लिए कृपया पढ़ें ‘कैसे आप अलार्म के बजते ही फ़ौरन उठ सकते हैं?’

और अगर आप नींद के बारे में नए प्रयोगों के बारे में जानना चाहते हैं तो कई-चरणों में निद्रा’ (लेख जल्द ही उपलब्ध होगा) लेख जरुर पढ़ें|

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