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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

प्रतिभा की कहानी

(Original Post : The Parable of Talents May1st, 2006 by Steve Pavlina)    

विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में, व्यक्तित्व विकास के बारे में कई अनमोल, रोचक किस्से मिलते हैं| इनमें से एक किस्सा बाईबल में से है “प्रतिभा की कहानी”

प्रतिभा की कहानी – उन किस्सों में से एक है जिन्हें यीशु (ईसा मसीह, jesus) नें एक नैतिक शिक्षा देने के लिए सुनाया था| हालाँकि कहानी में ‘प्रतिभा(गुणों)’ का शाब्दिक रूप से प्रयोग धन-दौलत के लिए किया गया है, लेकिन आप जाहिर रूप से इसका विस्तार दूसरे क्षेत्रों में भी कर सकते हैं| इसकी रोचकता बढ़ जाऐगी अगर आप इसे गुणों की आम परिभाषा को ध्यान में रख कर पढ़ें|

तो लीजिए कहानी हाजिर है :
“प्रतिभा की कहानी

एक बार की बात है कि एक व्यक्ति को दूर विदेश यात्रा पर जाना था, तो उसने अपने नौकरों को बुलाया और अपनी जायदात उनके हवाले कर दी| एक नौकर को उसने धन-दौलत कमाने के पांच गुण दिए, दूसरे को उसने दो गुण दिए, और एक अन्य नौकर को उसने एक गुण दिया, गुणों का यह  बंटवारा हर नौकर की काबलियत के मुताबिक था| और फिर वह अपनी यात्रा पर चला गया| वह आदमी जिसे पांच गुण मिले थे उसने अपने धन को व्यवसाय में लगा दिया और पांच गुण और कमा लिए| जिस व्यक्ति को दो गुण मिले थे उसने भी ठीक ऐसा ही किया और दो गुण और कमा लिए| लेकिन जिस आदमी को एक गुण मिला था, वह बाहर गया, जमीन में एक गढ्डा खोदा और अपने मालिक के धन को उसमें छुपा दिया|
आखिर काफी समय बीतने के बाद, उन सेवकों का मालिक वापस लौट आया और उनसे हिसाब-किताब करने लगा| वह व्यक्ति जिसे पांच गुण मिले थे, वह अपने कमाए हुए पांच गुण ले आया| और बोला “मालिक, आपने मुझे पांच गुण दिए थे| देखिए मैंने पांच गुण और कमा लिए”|

उसके मालिक नें जवाब में कहा, “शाबाश, तुम एक बहुत अच्छे और वफादार सेवक हो! मैंने तुम पर कुछ चीजों के लिए भरोसा किया जिसमें तुम खरे उतरे, अब मैं तुम्हें और ज्यादा चीजों का उत्तरदायित्व(in chrage) दूंगा| आओ और अपने मालिक की खुशी में भाग लो|”

फिर, वह आदमी जिसे दो गुण मिले थे आया और बोला “मालिक, आपने मुझे दो गुण दिए थे| देखिए मैनें दो गुण और कमा लिए|”

उसके मालिक नें जवाब में कहा, “शाबाश, तुम एक बहुत अच्छे और वफादार सेवक हो! मैंने तुम पर कुछ चीजों के लिए भरोसा किया जिसमें तुम खरे उतरे, अब मैं तुम्हें और ज्यादा चीजों का उत्तरदायित्व(in chrage) दूंगा| आओ और अपने मालिक की खुशी में भाग लो|”

अंत में वह व्यक्ति जिसे एक ही गुण मिला था आया और बोला “मालिक, मैं जानता था कि आप एक बहुत ही कठोर व्यक्ति हैं, आप तो वहाँ से भी फसल काट लेते हैं जहां आपने बीज नहीं बोया होता और वहाँ से भी बटोर लेते हैं जहां पर आपने बीज नहीं बिखराया होता| इसलिए मैं डर गया और आपके गुण को जमीन में छुपा दिया| अब देखिए जो आपका था आपके सामने है|”

उसके मालिक ने जवाब दिया “तुम एक दुष्ट और आलसी नौकर हो! तो तुम जानते थे कि मैं वहाँ से फसल काटता हूँ जहां पर मैंने बीज नहीं बोया होता और वहाँ से बटोरता हूँ जहां पर मैंने बीज नहीं बिखेरा होता| अगर ऐसा है तो तुम्हें मेरे धन को बैंक में जमा करा देना चाहिए था ताकि जब मैं वापिस आता तो मुझे अपना धन ब्याज के साथ वापिस मिलता|”

“इससे गुण वापस ले लो और उसे दे दो जिसके पास दस गुण हैं| क्योंकि हरेक व्यक्ति जिसके पास अधिक है उसे और भी अधिक दिया जाएगा, और उसके पास कभी किसी चीज की कमी नहीं होगी| जिसके पास अधिक नहीं है, उससे वह भी ले लिया जाएगा जो उसके पास है| और उस नालायक सेवक को बाहर अँधेरे में धेकेल दो, जहां वह रोता और दांत पीसता रहेगा|”
-Matthew 25:14-30 (NIV)”

यह साधारण सी कहानी उन कुछ रोचक तथ्यों को उजागर करती है जो कि व्यक्तित्व विकास के संदर्भ में उपयोग किए जा सकते हैं|

सबसे पहले, हम, सभी अलग-अलग परिस्थितियों से शुरुआत करते हैं| हममें से कुछ, प्रचुरता (abundance) (पांच गुणों) के साथ जन्म लेते हैं| तो कुछ आभाव (एक गुण) में पैदा होते हैं| लेकिन हमें क्या मिला है इससे फर्क नहीं पड़ता, बल्कि फर्क तो इससे पड़ता है कि हम इससे क्या करते हैं? इसलिए यीशु, जीवन के पक्षपात को स्वीकार करते हैं, लेकिन वह यह भी बताते हैं कि हमारी शुरुआत करने की स्थिति से फर्क नहीं पड़ता है| एक व्यक्ति, पांच गुण कमाता है, दुसरा केवल दो गुण ही कमा पाता है, लेकिन दोनों को एक समान बधाईयां मिलती हैं क्योंकि दोनों ने ही १००% मुनाफ़ा कमाया| (मैं यह जरुर जानना चाहूँगा कि उन्होंने अपना पैसा कहाँ निवेश किया?)

यह इस बात का भी अच्छा उदाहरण है कि हमें दूसरे मनुष्यों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए? दूसरे मनुष्यों को, उनके शुरुआत करने की स्थिति, से आंकना चाहिए, और खुद को, अपनी शुरुआती स्थिति से| अगर आप, उन कुछ लोगों में से एक हैं जिन्हें कि पांच गुण मिले हैं, तो खुद अपनी पीठ मत थपथपाईये कि आप तो पहले ही औसत से ऊपर हैं| अगर आप के पास गुणों की प्रचुरता है तो आपको, खुद से, और भी अधिक की अपेक्षा करनी चाहिए| इसी तरह से, आपकी जिंदगी में ऐसे भी दौर आते हैं जब आपके पास केवल एक गुण ही होता है और आप उसका जितना बेहतर इस्तेमाल हो सके, करते हैं, हालाँकि आपका मुनाफ़ा, बाहरी पैमाने पर कम ही महसूस होगा, लेकिन तब भी, यीशु के पैमाने से आपने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है| मैं इस विषय पर पहले लेख ‘अपने मानक कैसे ऊपर उठाएं?’(लेख जल्दी ही उपलब्ध होगा) में लिख चुका हूँ|

इस कहानी का एक रोचक पहलु यह है कि हमारे गुण हमें सौंपे गए है, जैसे कि एक मालिक अपनी जायदात को अपने नौकरों को सँभालने के लिए देता है| हम अपनी संपत्ति के रखवाले हैं, और मैं यहाँ संपत्ति को बड़े खुले तौर पर परिभाषित कर रहा हूँ जो कि भौतिक धन-संपत्ति से कहीं बढ़कर हैं| मिसाल के तौर पर, अगर मैं अच्छी तरह से लिख और बोल सकता हूँ तो ये गुण मुझे सौंपे गए हैं| मैं इन्हें भय के कारण जमीन में भी दबा सकता हूँ, या फिर मैं अपने खोल से बाहर निकल कर  सब के भले के लिए संघर्ष भी कर सकता हूँ|

इस कहानी में मुझे एक बात पर थोडा अचरज होता है : क्या होता अगर एक नौकर, जिसने धन, व्यवसाय में लगाया था, उसे फायदे के बजाय घाटा हुआ होता? यीशु इसका क्या जवाब देते?, इसका एक संकेत छिपा हो सकता हैं, उस तरीके में, जिससे मालिक ने अपने तीसरे नौकर को संबोधित किया : “तुम एक दुष्ट और आलसी नौकर हो!” बाद में मालिक ने नौकर को “नालायक” कह कर संबोधित किया और उसे उठा कर बाहर फिकवा दिया| यह देखते हुए कि नौकर ने फिर भी मालिक की सारी संपत्ति उसे वापिस कर थी, यह काफी कठोर भाषा है| तो क्या यीशु यह कहना चाहते हैं कि निष्क्रियता एक दुष्कर्म है? हाँ मैं तो ऐसा ही समझता हूँ| दूसरे शब्दों में, अगर आप अपने गुणों के साथ कुछ नहीं करते हैं...अगर आप उन्हें जमीन में दबा देते हैं और उन्हें बस बटोरते जाते हैं, तो आप दुष्ट, आलसी और नाकारा बनने का चुनाव कर रहे हैं| आपसे यह अपेक्षा की जाती है कि जो कुछ भी आपको मिला है उसका आप इस्तेमाल करेंगे| आलसी मत बनिए|

दूसरा संकेत छिपा है उस तरीके में, जिससे पहले दोनों नौकरों की प्रशंसा की गई| मालिक ने दोनों को ‘वफादार’ कहकर संबोधित किया| यह काफी दिलचस्प है| अगर मालिक उनकी तारीफ़ चालाक, उपयोगी या फायदेमंद कहकर करता तो यह बिलकुल ही अलग बात होती| लेकिन शाबाशी, उनकी वफादारी के लिए दी गई है न कि उनके नतीजों के लिए|

जहां तक भाषा की बात करें (अगर मेरा अंदाजा सही है) तो, मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि अगर किसी सेवक ने पूँजी को व्यवसाय में लगाया होता, उसे घाटा हुआ होता और वह कुछ या पूरी पूंजी ही गवां देता तो भी उसे, उसकी वफादारी के लिए शाबाशी मिलती| हालाँकि, यीशु नें इस स्थिति का कहानी में सीधे जिक्र नहीं किया है लेकिन उन्होंने, शायद यह भी बताया है कि विश्वास खुद ही सफलता की राह है – जोकि उनकी अन्य शिक्षाओं का भी मूल विषय रहा है| इसलिए, शायद अगर आप अपने गुणों का वफादारी से उपयोग करें तो आपको वास्तव में घाटा नहीं होने वाला|

कहानी में एक दूसरी ध्यान देने वाली बात यह है कि वहाँ पर कोई प्रतिस्पर्धा(competition) नहीं है| सेवक, वहाँ पर अपने मालिक की प्रशंसा पाने के लिए, आपस में कोई होड नहीं लगा रहे| यह कोई ‘शून्य हिसाब’(zero-sum) का खेल नहीं है (जिसमें एक के फायदे से दूसरे का नुकसान होता है)| पहले दोनों सेवकों ने, अपने मालिक की जायदात बढाने में, अपने तरफ से कुछ सार्थक योगदान ही दिया|

तो वफादार सेवक होने का आखिर ईनाम क्या है? हालाँकि यीशु नें इस पर कुछ स्पष्ट नहीं कहा है, फिर भी यह तो जाहिर है कि धन तो उनसे वापिस ले ही लिया गया| दोनों सेवक, फिर अपनी धन-दौलत बढ़ाने के लिए काम भी नहीं कर रहे थे| यह उन का धन नहीं था| वे तो अपने मालिक के धन की बढोतरी के लिए काम कर रहे थे, और उसकी जायदात के इजाफे में अपना योगदान दे रहे थे| उनका असली ईनाम था अपने मालिक की खुशी में हिस्सा लेना| तो खुशी ही ईनाम है, और खुशी तब मिलती है जब हम दूसरों की सेवा करते हैं|

मैं अपने अनुभव से जानता हूँ कि अगर मैं कोई काम अपने हाथ में लेता हूँ जिससे कि सिर्फ मुझे फायदा होता है तो मुझे ऐसा करने में अधिक उत्साह महसूस नहीं होता| और अमूनन इससे मेरी खुशी में भी कोई बढोतरी नहीं होती है| लेकिन जब मैं दूसरों के फायदे को ध्यान में रखकर कोई काम करता हूँ (जैसे कि लोगों को उनके विकास में मदद करना), तब मुझे ऐसा करने में बेहद खुशी महसूस होती है, और अंततः इससे मुझे भी फायदा होता है|

लेकिन, इसके अलावा भी इसमें बहुत कुछ है| खुशी वह चीज नहीं जो कि मुझे काम करने से हासिल होती है, बल्कि खुशी तो एक ऐसा गुण है जोकि मैं अपने काम में लगाता हूँ| जब मैं केवल अपने लिए काम करता हूँ तो मैं खुशी को, खुद से बाहर तलाशता हूँ| प्रसन्नता को हासिल करने का यह तरीका काम नहीं करता| लेकिन जब मैं दूसरों के फायदे के लिए काम करता हूँ और थोड़ी देर के लिए, स्वार्थ(इसमें मेरे लिए क्या है?), को भूल जाता हूँ तो मुझे खुशी के उन खजानों की चाबी हाथ लग जाती है जोकि मेरे अंदर, पहले ही से, मौजूद थे| और खुशी को हासिल करने की कोशिश के बजाए मैं खुश रहकर अपनी मंजिल तक पहुंचता हूँ| आनंद, मेरे अंदर से, बाहर की ओर मेरे काम में प्रवाहित होता है| इसलिए मैं प्रवाह को, बाहर की ओर जाता हुआ महसूस करता हूँ न कि अंदर की ओर| 

खुशी, साँस छोड़ने की तरह है न कि साँस लेने की तरह| क्या आप उन लोगों की तरह हैं जो यह कहने के लिए मजबूर हैं कि, “आदरणीय सभासद, मेरे अंदर, आनंद का भण्डार मौजूद तो है लेकिन इसके खुदाई के लिए अभी मैंने प्रस्ताव(tender) आमंत्रित नहीं किया है|”

जैसे कि यीशु नें ‘प्रतिभा की कहानी’ में बताया है कि, विपुलता(abundance) के निर्माण के लिए आपको अपने डर से आगे जाना होगा| अगर आप अधिक भयभीत हैं, शक्की स्वभाव के हैं या फिर खुद पर भरोसा नहीं करते हैं तो आप अपने गुणों को दफन कर देंगे| और यह अंततः “रोते रहने और दांत पीसने,” अर्थात, उदासी और विषाद(depression) की ओर ले जाएगा|

आपको ऐसा लग सकता है कि डर और संदेह आपको मुसीबतों से दूर रखेंगे, परन्तु वास्तव में वे आपको केवल दुःख और तकलीफ ही देंगे| आपको भोला-भला मूर्ख साबित होने से बचने के लिए, डर की जरुरत नहीं है; उसके लिए तो सामान्य समझ (common sense) ही काफी है| विपुलता का जीवन जीने के लिए अंततः, आपको अपने डर से आगे जाकर, दूसरों के लिए विपुलता का निर्माण करना होगा| नहीं तो नाकारा समझ कर आपका बहिष्कार कर दिया जाएगा| यीशु ने यहाँ पर कोई टालमटोल की गुंजाईश नहीं छोड़ी है – करिये या भरिये|

दूसरों की भलाई के लिए काम कीजिए और प्रसन्नता आपका ईनाम होगी| अपने गुणों को दफन कर दीजिए, और फिर ‘रोते और दांत पीसते रहिए|” चुनाव आपका है|

और इसी के साथ आज की सभा समाप्त होती है| :)

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