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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

चेतना के स्तर

(Original Post : Levels of Consciousness, April 7th, 2005 by Steve Pavlina

डेविड आर. हव्किंस, अपनी किताब Power vs. Force, में मानव-चेतना के विभिन्न स्तरों के एक अनुक्रम(hierarchy) के बारे में बताते हैं| यह एक बड़ी ही रोचक मिसाल है| अगर आप इस किताब को पढ़ें तो आप बड़ी ही आसानी से यह पता कर सकते हैं कि अपनी वर्तमान जीवन अवस्था के मुताबिक़ आप, इस अनुक्रम में कहाँ पर स्थित है|

चेतना के स्तर, बढते हुए क्रम में इस प्रकार हैं : शर्मिंदगी(shame), ग्लानी(guilt), उदासीनता(apathy), शोक(grief), डर, इच्छा, क्रोध, अभिमान(pride), हिम्मत, निष्पक्षता(neutrality), तत्परता(willingness), स्वीकृति, विचार(reason), प्रेम, आनंद, शांति, ज्ञानोदय(enlightenment)|

हालांकि हम अलग-अलग समय पर विभिन्न स्तरों पर होते हैं, फिर भी आमतौर पर हमारे लिए एक प्रमुख ‘सामान्य’ स्तर होता है|  अगर आप इस ब्लॉग को पढ़ रहे हैं तो इस बात की संभावना अधिक है कि आप इस वक्त कम-से-कम हिम्मत के स्तर पर हैं क्योंकि अगर आप एक निम्न स्तर पर होते तो फिर आप सचेत होकर व्यक्तित्व विकास करने में शायद कोई रूची(interest) ही नहीं लेते|

मैं(स्टीव पव्लीना) बारी-बारी से इन स्तरों के बारे में आपसे बात करूँगा, ‘हिम्मत’ और ‘विचार’ के बीच के स्तरों पर खास ध्यान देते हुए, क्योंकि यही वह दायरा है जहां पर आप इस वक्त हो सकते हैं| स्तरों के नाम(labels) हव्किंस के हैं| हर स्तर का विवरण हव्किंस के विवरणों पर आधारित है, लेकिन इसमें मैंने अपने विचार भी शामिल किए हैं| हव्किंस इसका वर्णन लघुगुणक(logarithmic) scale के रूप में करते हैं, इसलिए उच्च स्तरों पर निम्न स्तरों के मुकाबले बहुत ही कम लोग होते हैं| एक स्तर से अगले उच्च स्तर पर जाने के नतीजतन(result) आपके जीवन में भारी बदलाव आते हैं|

Last Modified: बुधवार, 28 नवंबर 2012

ऊपर वाला मदद करने के लिए तैयार है, ज़रा छप्पर तो बड़ा कीजिए!

(Original Post : Allowing Yourself to Receive, September 8th, 2012 by Steve Pavlina)

आर्थिक सम्पन्नता की लहर(vibration) भी खुले संबंधों की लहरों की तरह होती है| यह बहाव में बहने के लिए निमंत्रण देती है, आपका स्वागत करती है और बदले में यह आपसे कुछ नहीं मांगती|

हम प्यार, धन-दौलत आदि और भी बहुत सी चीजों को आकर्षित करने और स्वीकार करने के मौकों से घिरे हुए होते हैं| लेकिन जब हम आभावग्रस्त(scarcity) विचारों में उलझे हुए होते हैं तो हम संभावनाओं के इस दायरे(spectrum) को बेहद सीमित कर देते है| और कई बार हमारी संकल्पनाएँ(intentions) इतनी बड़ी होती हैं कि हम, बिना उन्हें नुक्सान पहुंचाएं, उन्हें इस दायरे में फिट नहीं कर सकते हैं, और नतीजतन हम उन्हें साकार होने से रोक देते हैं|

हम यह इच्छा तो रखते हैं कि हमारा जीवन प्यार से भरपूर हो, और फिर यह मांग भी करते हैं कि सारा प्यार हमें किसी एक खास सम्बन्ध से ही मिलना चाहिए| हम ज्यादा धन तो कमाना चाहते हैं और फिर यह भी चाहते हैं कि सारी धन-दौलत, हमें अपनी इकलौती नौकरी से ही मिलनी चाहिए - या फिर अगर हम बेरोजगार हैं तो हमें एक ही नौकरी करनी चाहिए|

Last Modified: मंगलवार, 2 अक्तूबर 2012

हिम्मत एक प्रवेशद्वार है

(Original Post : Courage is the Gateway, March 30th, 2005 by Steve Pavlina)  

डॉ डेविड हव्किंस नें अपनी किताब “Power vs. Force : The Hidden Determinants of Human Behavior”, में एक अनुक्रम(hierarchy) के बारे में जिक्र किया है जिसमें मनुष्य की भावनात्मक अवस्थाओं के बारे में बताया गया है जहाँ पर शर्म और अपराध-बोध(guilt) सबसे निचले पायदान पर और शांति और ज्ञान(enlightenment) सबसे ऊँचे पायदान पर स्थित होते हैं|

हव्किंस ये दावा करते हैं कि जहाँ निचले स्तर की भावनात्मक अवस्थाएं हमें कमजोर करती हैं वहीं उच्च स्तर की अवस्थाएं हमें शक्तिशाली बनाती हैं| और हिम्मत, शक्ति और कमजोरी(दुर्बलता) के बीच की वह रेखा होती है जो इन दोनों अवस्थाओं को विभाजित करती है| यह पहली सकारात्मक अवस्था होती है| हिम्मत, ऊर्जा के निम्न(lower) स्तरों को, जहाँ हमें ऐसा लगता है कि जैसे हम जीवन से संघर्ष कर रहे हों, ऊर्जा के उच्च स्तरों, जहाँ हम जीवन के साथ सहयोग करने लगते हैं, से अलग करती है| जैसा कि हव्किंस लिखते हैं :

Last Modified: गुरुवार, 20 सितंबर 2012

खुशी पहले, बाकी सब बाद में

(Original Post : Happiness First, Then Everything Else, August 12th, 2012 by Steve Pavlina)   

अगर आप एक नौकरी, एक सम्बंध, या फिर एक ऐसी जीवन-शैली(lifestyle) को स्वीकार करते हैं जिसे आप सहन(tolerate) तो कर सकते हैं लेकिन जिसे आप सराह(appreciate) नहीं पाते तो इसका सीधा सा अर्थ यह है कि आप, अपनी खुशी से ज्यादा किसी और चीज को अहमियत दे रहे हैं|

सामाजिक-अनुकूलन(social conditioning) ने शायद आपको यकीन दिला दिया है कि अपने बैंक खाते में एक निश्चित रकम बनाए रखने के लिए, अपने लोन की किश्तों का भुगतान सही समय पर करने के लिए, या फिर किसी और की जरूरतें पूरी करने के लिए, अपनी खुशियों की बलि चढाना ही जीने का एक सही तरीका है| बचपन से हमें यही तो सिखाया जाता है कि आपको जिममेदार बनना है और एक अच्छी सी स्थायी(stable) नौकरी हासिल करनी है|

इस अनुकूलन(conditioning) के मुताबिक़, अगर आप इन चीजों को ठीक से करते हैं तो फिर आप सफल हैं| आप वही कर रहे हैं जिसकी आपसे उम्मीद की जाती है, और ऐसा करने पर कोई आपको दोषी(fault) नहीं ठहरा सकता|

लेकिन अभी, या फिर कुछ समय के बाद आपको महसूस होने लगता है कि अपने बिल सफलतापूर्वक चुकाने  और दूसरों की जरूरतें पूरी करने की इस जद्दोजहत(struggle) में, खुद को ऐसी जिंदगी से महरूम(deprive) रखना, जिसमें आपको खुशी मिलती है और जिसे आप वाकई जीना चाहते हैं, सफलता नहीं है| बल्कि हकीकत में तो यह बुरी तरह से असफल होना है| 

Last Modified: शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

कठिन लोगों का सामना कैसे करें?

(Original Post : Dealing with Difficult People, November 20th, 2004 by Steve Pavlina)   

आप कैसे कठिन, तर्कहीन(irrational) या फिर गाली-गलौच करने वाले लोगों का सामना कर सकते हैं, खासकर कि तब जबकि वे उन पदों(positions) पर आसीन हों जहाँ से वे आपके जीवन के एक हिस्से को नियंत्रित कर सकते हों?

मैं(स्टीव पव्लीना) कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिला जोकि पूरी तरह से तर्कसंगत(rational) हो| जानकारी को इकठ्ठा करने और उसे संसाधित(process) करने की हमारी काबलियत, पूर्णता(perfection) से कोसों दूर है| लेकिन हमारी भावनाएँ हमें एक छोटा रास्ता दिखाती हैं| ‘डैनियल गोल्मैन’ नें अपनी किताब ‘ईमोशनल इंटलीजैंस’ में उन लोगों के बारे में विस्तार से बताया है जोकि अलेक्साथेमिया(alexathemia) के शिकार होते हैं, यह एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें लोग या तो अपनी भावनाओं को महसूस ही नहीं करते या फिर वे अपनी भावनाओं से पूरी तरह से नाता तोड़ लेते हैं| आप शायद सोचने लगें कि ऐसे लोग तो बेहद समझदार/तार्किक होते होंगे, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है| वे तो दुनिया में अपना काम भी ठीक तरह से नहीं कर पाते| उनके पास, यह तय करने के लिए कोई भावनात्मक संदर्भ(context) नहीं होता, कि उनके लिए क्या ज्यादा जरूरी है और क्या नहीं? उनके लिए एक रुपया कमाना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि एक लाख रूपये कमाना| वे उन कार्यों को करते हुए घंटो बिता देते हैं, जिन्हें हम चुटकी बजाते ही निपटा सकते हैं, जैसेकि डेंटिस्ट के पास जाने के लिए कौन सा समय सही रहेगा? हमारी भावनाएँ हमें एक छोटा तर्क-संगत रास्ता दिखाती हैं – हम जरूरी और गैरजरूरी चीजों के बीच के अंतर को महसूस कर लेते हैं|

Last Modified: मंगलवार, 7 अगस्त 2012

आखिर आपका मूल्य क्या है?

(Original Post : What is Your Value?, August 30th, 2005 by Steve Pavlina)  

पिछले गुरूवार जब मैंने(steve pavlina) “माध्यम और सन्देश”(लेख जल्द ही उपलब्द्ध होगा) का विषय उस एक 20-मिनट के व्याख्यान(speech) के दौरान उठाया, जो मैंने अपने एक ‘टोस्टमास्टर क्लब’ में दिया था, तो मैंने हरेक श्रोता को एक फर्जी(fake) बिजनेस कार्ड बनाने को कहा जिस पर उन्होंने अपना नाम और कैरियर लिखा| फिर स्पीच के अंत मैं मैंने उन्हें फिर से ऐसे करने को कहा, और बेशक नतीजे बिलकुल अलग थे क्योंकि लोग अब अपने कैरियर के बारे में अलग तरह से सोच रहे थे|

यह मान बैठना कि हमें अपनी कैरियर के दायरे में रहकर ही काम करना है एक जाल में फंसने जैसा है| शायद आप खुद से कहें कि, “मैं एक बड़ी कंपनी में नौकरी करता/करती हूँ|” लेकिन अपनी कैरियर को एक ऐसी चीज के रूप में देखना जोकि आपमें ही समाहित(contiained) हो आपको कहीं अधिक शक्तिशाली बनाता है| इसलिए आप कुछ इस तरह से सोच सकते हैं, “इस कंपनी को मैंने अपनी रचनात्मक-अभिव्यक्ति (self-expression) के लिए चुना है|” बजाय इसके कि आप कंपनी में एक स्थान ग्रहण(holding a position) करें, आप कंपनी को अपने अंदर एक स्थान ग्रहण करते हुए देखें| यह कुछ ऐसा होगा जैसे कि आपने किसी कंपनी की सेवाओं(services) को किराए पर लिया हो, और जो सेवा वह कंपनी आपको देगी वह होगी ‘अपने मूल्य को दूसरे लोगों तक पहुंचाने में आपकी मदद करना|’

Last Modified: शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

जिम्मेदारी और आकर्षण का नियम

(Original Post : Responsibility and the Law of Attraction, August 14th, 2006 by Steve Pavlina)  

अपने जीवन के प्रति हमारी जवाबदेही(जिम्मेदारी, responsibility), एक ऐसी चीज है जिसे हम थोड़ी देर के लिए भुला तो सकते हैं लेकिन उससे पीछा नहीं छुडा सकते| जैसेकि मैं (स्टीव पव्लीना) अक्सर कहता रहता हूँ कि आप कंट्रोल(/नियंत्रण) तो दूसरे को दे सकते हैं लेकिन जवाबदेही नहीं| अंततः आपको अपनी जीवन में क्या हासिल करना है इसकी पूरी जिम्मेदारी आप और केवल आप पर ही होती है...न कि आपके परेंट्स, आपके बॉस, आपके समाज, भगवान, या फिर किसी और पर| आप जिसे चाहे उसे दोषी ठहरा सकते हैं, लेकिन उसके नतीजे केवल आपको ही झेलने(या फिर सराहने/appreciate) होते हैं|        

मुझे कभी-कभार ऐसे लोगों के खत(letters/feedback) मिलते हैं जोकि ‘जैसा वे नहीं चाहते’, उसके बारे में लगातार सोचते रहने के दुष्चक्र में फंसे हुए होते हैं| वे, अपनी इच्छाओं पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करने का दावा करते हैं, और फिर मुझसे पूछते हैं आखिर उनके लक्ष्य साकार(implement) क्यों नहीं हो रहे? और फिर वे उन सभी कारणों को गिनाने लगते हैं जोकि उनके विचार से उनकी परेशानियों की वजह होते हैं|

अगर मुझे ऐसे ई-मेल का एक फॉर्म(template) तैयार करना हो तो, वो कुछ ऐसा नजर आएगा :
“मुझे समझ में नहीं आता....
मैं निराश हूँ क्योंकि...
मुझे नफरत है...
मुझे नहीं पता...
मुझे बड़ा तनाव है कि...
मैं बड़ी चिंता करता हूँ कि...
मैं यह कर सकता हूँ... लेकिन मैं कर ही नहीं पाता...
मेरे जीवन में इतनी मुश्किलें क्यों हैं?"

Last Modified: सोमवार, 2 जुलाई 2012

२० मिनट में कैसे आप अच्छा महसूस कर सकते हैं?

(Original Post : Feeling Blessed, June 9th, 2008 by Steve Pavlina)  

'जैसा आप नहीं चाहते' उसके बारे में लगातार सोचते रहने के चक्रव्यूह में फंसना बड़ा आसान है| और इसमें वह सभी कुछ शामिल है जोकि आपके जीवन में  इस वक्त मौजूद है लेकिन जिसे आप पसंद नहीं करते हैं| अगर आप बार-बार उन्हीं अनचाही चीजों के बारे में सोचते रहे तो यह एक शर्तिया(bet, शर्त लगाना) बात है कि आप, अपने जीवन में बहुत सी उलझनें पैदा करने लगेंगे|

अनचाही चीजों के बारे में सोचना वास्तव में एक जाल(trap) होता है| ऐसे विचार आपको बड़े लंबे वक्त के लिए उलझा कर रख सकते हैं| और फिर आप अपने कीमती जीवन के कुछ साल या फिर कई दशक(decades) नीचे दिए गए इस, दुष्चक्र में गवां सकते हैं :

  1. आप अपने आस-पास देखते है और आपको जो कुछ महसूस होता है उस पर ध्यान देते हैं|
  2. आप पाते हैं कि आप अपने जीवन के कुछ पहलुओं को पसंद नहीं करते|
  3. आपके मन में, डर, चिंता, निराशा, और अन्य नकारात्मक भावनाएं जन्म लेने लगती हैं|
  4. आप सोचने लगते हैं कि नापसंद चीजों को बदलने के लिए आपको क्या-क्या करना होगा|
  5. आप पाते हैं कि बदलाव करने के लिए बहुत अधिक वक्त और प्रयास की जरूरत पड़ेगी - और फिर सफलता की कोई गारंटी भी तो नहीं है| और यह भी  तो हो सकता है कि आप हालात को और भी ज्यादा बिगाड़ बैठें|
  6. हताशा, हालात की मजबूरी और डिप्रेशन की भावनाओं से आपका मन भारी हो जाता है|
  7. आप कुछ ऐसा करने लगते हैं जिससे कि आपको बेहतर महसूस होता है| जैसे कि टीवी देखना, खाना खाना, शराब के दो पैग लगाना, इंटरनेट पर समय  गुजारना, ई-मेल देखना आदि-आदि|
  8. आप, अपना ध्यान भटकाने/नशे में डूबने के कारण कुछ हल्का महसूस करने लगते हैं|
  9. कुछ समय गुजरने के बाद, आखिरकार आप, इस चक्र को फिर से पहले चरण से दोहराना शुरू कर देते हैं|
क्या आपने इस चक्र को या फिर ऐसे ही किसी चक्र को दोहराया है?

Last Modified: शनिवार, 2 जून 2012

पक्का इरादा क्या होता है?

(Original Post : What is Commitment?, October 4th, 2011, by Steve Pavlina)    

अपना सिर पानी में डुबो दीजिए और इसे कुछ देर वहीं रखे रखिए|

आपको जल्द ही पता चल जाऐगा कि साँस लेने के लिए आपका इरादा १००% पक्का है|

इस पर ध्यान दीजिए कि आप साँस न लेने के लिए कोई बहाना नहीं बनाएंगे| ध्यान दीजिए कि आप खुद को 'साँस लेने के लिए' प्रेरित करने की फ़िक्र नहीं करेंगे| ध्यान दीजिए कि आपको 'साँस लेने की अपनी इच्छा को' सही ठहराने की कोई जरूरत नहीं होगी|

आप केवल साँस लेंगे|

पक्के इरादे का मतलब है कार्यवाही करना|

कोई बहाना नहीं| कोई बहस नहीं| कोई लंबी-चौड़ी जांच-परख नहीं| यह कितना कठिन है इसकी कोई शिकायत नहीं| दूसरे क्या सोचेंगे इसकी कोई चिंता नहीं| कोई डर कर पीछे हटना नहीं|

केवल आगे बढ़ना|

क्या होगा अगर कोई आपको पक्का इरादा करने से रोकना चाहे?

आप क्या करेंगे अगर कोई आपको साँस लेने से रोकना चाहे?

[यह article आपको कैसा लगा, कृपया comments के जरिए इस पर अपनी राय जाहिर करें, अगर आपके पास इस article से जुडी कोई जानकारी या सुझाव हो तो आप उसे 3kbiblog@gmail.com पर भेज कर हमारे साथ share कर सकते हैं | ]

Last Modified: शुक्रवार, 1 जून 2012

खुद पर शक करना घातक होता है

(Original Post : Skepticism May Be Harmful or Fatal if Swallowed, November 23rd, 2005 by Steve Pavlina)    

संदेह करने का अर्थ है शक और अविश्वास को बुनियाद बनाकर वास्तविकता को समझने की कोशिश करना ताकि आप एक समझदार इंसान की तरह बर्ताव कर सकें| बुनियादी रूप से संदेह का जन्म, 'किसी बात को आँख मूँद कर मान लेने' के विरोध में हुआ| संदेह करने के पीछे का मुख्य कारण, मूर्खतापूर्ण बातों को स्वीकार करने से खुद को बचाना होता है|

यहाँ तक तो सब ठीक हैं, लेकिन आजकल संदेह करने का प्रयोग, धर्म और अध्यात्मिक(spiritual) मामलों से भी बहुत आगे होने लगा है| अगर संदेह आपको धार्मिक कट्टरता से बचा सकता है तो शायद यह दूसरे मामलों में भी आपकी मदद कर सकता है| और कुछ हद तक यह मदद करता भी है| उदाहरण के तौर पर, संदेह करने से आप, अपने बिजनेस में धोखा खाने से बच सकते हैं|

लेकिन संदेह तब नुकसानदेह साबित हो जाता है जब आप इसे निगल जाते हैं| अगर आप इसे निगल जाए तो आप इसका रुख अपनी ओर कर देते हैं| आप, शक ओर अविश्वास को औज़ार बनाकर खुद को समझने की कोशिश करने लगते हैं| मैं किस काबिल हूँ? क्या मैं वाकई ऐसा कर सकता हूँ? अगर मैं ऐसा करने की कोशिश करूँ तो क्या मैं मुर्ख लगने लगूंगा? 

बड़ी गलती|

Last Modified: शुक्रवार, 11 मई 2012

समय-सीमा तय करना

(Original Post : Timeboxing, October 19th, 2004 by Steve Pavlina)  

'समय-सीमा' तय करना, समय के मैनेजमेंट का एक ऐसा तरीका है जिसका उपयोग मैं अक्सर करता हूँ| मैंने इसे, सबसे पहले सॉफ्टवेयर के निर्माण के दौरान सीखा था| मान लीजिए कि आपको, अपने एक नए उत्पाद(product) को, बाजार में उतारने की एक तय समय-सीमा मिली हुई है, जैसेकि 'इनकम-टैक्स का हिसाब लगाने वाले' एक सॉफ्टवेयर का सालाना अपग्रेड(सुधार, upgrade)| आपको हर हाल में, एक निश्चित तारीख तक नया अपग्रेड तैयार करना ही होगा| तो फिर आप अपने, विकास-चक्र(development cycle) के लिए शायद 'समय-सीमा तय करने' के तरीके का उपयोग करेंगे, दूसरे शब्दों में आप एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर अपने काम को, बेहतर से बेहतर तरीके से, करने का प्रयास करेंगे| आप इसमें कौन-कौन सी नई खूबियाँ जोड़ पाएंगे, यह पूरी तरह से उपलब्ध समय पर निर्भर करेगा| अपने टाईम-टेबल को बदलने का सवाल ही नहीं उठता, इसलिए अगर आप पिछड जाते है तो आपको खूबियों में कटौती करनी ही होगी|

अपने खुद के कार्यों को संभालने(manage) के समय, 'समय-सीमा' निर्धारित करने की तकनीक मददगार साबित हो सकती है| मैं मुख्य रूप से इसका उपयोग दो अलग-अलग परिस्थितियों में करता हूँ|

Last Modified: सोमवार, 7 मई 2012

सफलता का डर: अगर आप सफल हुए तो क्या होगा?

(Original Post : Fear of Success: What will happen if you succeed?, December 4th, 2004 by Steve Pavlina)  

कई बार आपके पास एक ऐसा लक्ष्य होता है जिसे हासिल करने के बारे में आप सोचते तो हैं, लेकिन आप पाते है कि उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी प्रयास आप नहीं कर रहे| आपको असफल होने या नकारे जाने का वाकई कोई डर नहीं होता, लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता साफ-साफ़ नजर आ रहा होता है और शायद यह एक दिलचस्प चुनौती भी लग रही हो, और कभी-कभार आपको कुछ सफलता भी हासिल हो जाती हो| लेकिन ज्यादातर समय आपकी लय बन नहीं पाती, और आप नहीं जानते कि आखिर ऐसा क्यों होता है| और ऐसा अक्सर उन दीर्घकालिक(long-term) लक्ष्यों को हासिल करते वक्त होता है जिनमें थोड़े-थोड़े समय के बाद काम करने की जरूरत होती है, जैसे कि वजन घटाना या फिर 'नए बिजनेस की शुरुआत करने' और अंत में अपनी 'नौकरी छोड देने', के बीच का समय|

ऐसी परिस्थिति में, मैंने पाया है कि एक सवाल जोकि मददगार साबित होता हैं वह यह है कि "क्या होगा अगर आप सफल हो जाते हैं तो? थोड़ी देर के लिए बिलकुल भुला दीजिए कि आपको कैसा होने की उम्मीद है या फिर किस बात का डर है, सिर्फ इस पर विचार कीजिए कि वास्तव में क्या होने की संभावना है? तो अगर आप अपना लक्ष्य हासिल कर लेते हैं| तो फिर क्या होगा? क्या-क्या बदलाव होंगे?

Last Modified: शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

जीवन का महान खेल

(Original Post : Life-The Ultimate Game, December 1st, 2006 by Steve Pavlina)    

किसी खेल(game, कंप्यूटर गेम) के निर्माण के दौरान, एक अच्छा खेल-निर्माता(कंप्यूटर गेम-डिजाइनर) हमेशा खिलाड़ी के सामने काफी सारे ठोस विकल्प(choices) रखता है| जब तक कि दिलचस्प विकल्प उपलब्द्ध(available) रहते हैं, खेल भी मजेदार बना रहता है| लेकिन अगर विकल्प उबाऊ, अस्पष्ट, अर्थहीन और आधे-अधूरे होते हैं तो खेल भी नीरस हो जाता है... चाहे बेशक आप ईनाम में i-pod ही क्यों न जीत जाएँ|

कुछ मशहूर खेलों, जैसे कि ताश का खेल, शतरंज, और गो, में ललचाने वाले विकल्पों की कोई कमी नहीं होती| अब ज़रा ‘टिक टैक् टो’ को लीजिए| जब आप छोटे बच्चे होते हैं तो विकल्प आपको रोमांचित कर सकते हैं और खेलने से आपको खुशी भी मिलती है| लेकिन जैसे-जैसे आप बड़े होते जाते हैं विकल्प, उबाऊ(boring) और स्पष्ट हो जाते हैं और खेल, आपको रोमांचित करने की अपनी क्षमता, खोने लगता हैं|  

यहाँ तक कि कौशल(skill) पर आधारित खेल - जैसे कि ‘गोल्फ’ या फिर ‘क्वेक’(Quake), ललचाने वाले विकल्पों से भरे हुए होते हैं| इनमें ‘सामरिक(tactical, नीतिगत) विकल्प’ और ‘प्रशिक्षण विकल्प’ शामिल होते हैं| आप कौन से गुणों का विकास करना चाहेंगे और कब? आप इसमें कितना समय लगाना पसंद करेंगे? आप कैसे अपनी शक्तियों का फायदा उठाएंगे और कैसे अपनी कमजोरियों की भरपाई करेंगे?

Last Modified: बुधवार, 11 अप्रैल 2012

समाचार – जानकारी या फिर एक लत?

Original Post : Overcoming News Addiction, Sept. 26th, 2006 by Steve Pavlina)    

करीब ३० दिन पहले, मैंने(स्टीव पव्लिना नें) फैंसला किया कि मैं ख़बरें देखना बंद कर दूंगा और इसके लिए मैंने अपने भरोसेमंद तरीके, ‘३० दिनों की परीक्षण विधी’ (लेख जल्द ही उपलब्ध होगा), का उपयोग किया| टीवी समाचार देखना और अखबार पढ़ना तो मैं पहले ही बंद कर चुका था, लेकिन फिर भी मुझे ‘Yahoo News’ और ‘CNN’ को, हर एक या दो दिन में, खंगालने की आदत थी, इसलिए मैनें यह निर्णय लिया कि मैं समाचार के सारे स्रोतों(sources) को छोड दूंगा और पूरी तरह से ख़बरों से मुक्त हो जाऊंगा| मैंने इस प्रयोग में जो कुछ भी सीखा वह मैं इस लेख के जरिए आप के साथ बाँट रहा हूँ| यह प्रयोग इतना अच्छा साबित हुआ कि मैंने इरादा कर लिया है कि अब मैं रोजाना ख़बरें जांचने की आदत से दूर ही रहूँगा|

ख़बरों से दूर रहने करने की प्रेरणा
यह तो मैं पहले ही से जानता था कि समाचार के लोकप्रिय स्रोतों का झुकाव, नकारात्मक ख़बरों (लेख जल्द ही उपलब्ध होगा) की ओर कितना अधिक होता है, लेकिन इस दोष के बावजूद, मैंने अंदाजा लगाया कि ख़बरों से पूरी तरह किनारा करने के बजाय कुछ ख़बरें देखना ज्यादा अच्छा है| कुछ गिनी-चुनी ख़बरें देखना मुझे दोनों बुरी आदतों(हर खबर देखना या फिर ख़बरें बिलकुल न देखना) में से कुछ कम बुरी आदत लगी| क्या वर्तमान में जो कुछ हो रहा है उसकी जानकारी रखना जरूरी नहीं है? अगर मैंने समाचार के सारे साधनों से नाता तोड़ लिया तो क्या मैं गुफा-मानव(caveman) नहीं बन जाऊंगा - मानव सभ्यता से एकदम अलग-थलग एक व्यक्ति?

Last Modified: बुधवार, 7 मार्च 2012

आप और कैबिन

(Original Post : You vs. the Cubicle, Oct. 13th, 2009 by Steve Pavlina)    

आह, वो कैबिन! हलके भूरे रंग का खूबसूरत पिंजरा| 
           (*कैबिन - cubicle, ऑफिस में आपका काम करने का कमरा)

अपना मनपसंद काम करने के एकदम उल्ट होता है, कैबिन| वास्तव में कोई भी व्यक्ति, जब अपना सबसे मनपसंद, काम करने के बारे में सोचता है तो वह कैबिन की कल्पना नहीं करता|

कैबिन वह जगह है जहाँ पर आप तब पहुँचते हैं जब आप, जिस काम से आपको खुशी मिलती है, उसे करने से पीछे हट जाते हैं|

आप कैबिन में सिर्फ एक ही तरीके से फंस सकते हैं, अपनी शक्ति उसे देकर|

एक कैबिन का आप के ऊपर कोई जोर नहीं चलता| आप कैबिन को समर्थ(empower) बना सकते है लेकिन यह खुद को समर्थ नहीं बना सकता|

एक ऐसी नौकरी के बारे में शिकायत करना जिसे आप नापसंद करते हैं, एक तरह से अपनी शक्ति, उसे दे देना ही है| आपने नौकरी को चुना है, और आप उतनी ही आसानी से नौकरी से गायब भी हो सकते हैं|

Last Modified: मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

दिल से नाता जोड़िए

Original Post : Connecting From the Heart, Nov 17th, 2010 by Steve Pavlina)   

आप कैसे, अपने किसी करीबी व्यक्ति के साथ हार्दिक सम्बंध बनाएंगे?

मेरे विचार से सबसे अच्छा तरीका है कि आप दूसरे व्यक्ति को यह इजाजत दें कि वह आपको बिना परदों(curtains) के देख सके|

मेरे उद्देश्य, यहाँ शारीरिक परदों से नहीं है बल्कि भावनात्मक-आध्यात्मिक परदों से है|

जब आप दूसरे व्यक्ति के साथ बातचीत कर रहे हों, तो अपने कैरियर के बारे में बात करें; और फिर उस विषय पर अधिक जोर न देकर, उसे विषय को छोड दीजिए| अपने गुजरे हुए कल के बारे में बात करें; और फिर उसे छोड दीजिए| अपने दूसरे संबंधों के बारे में बात करें; और फिर उन्हें भी जाने दें|

बिना किसी विषय को दोहराए, बातचीत करना और सम्बंध बनाना जारी रखिए| आखिरकार आप, एक ऐसे विचार से जा टकराएंगे जिसके बारे में सोचने से आपको तकलीफ होती है| और यहीं पर आपको हिम्मत जुटाने की जरुरत होगी ताकि आप इस विषय की छानबीन कर सकें और इसे दूसरों के साथ बाँट सकें|

Last Modified: शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

क्या आप अपनी धुन मन में ही लिए दुनिया से चले जाएंगे?

Original Post : Don’t Die With Your Music Still in You, Jan 8th, 2005 by Steve Pavlina)
  
क्या हो अगर आपकी वर्तमान जीवन शैली(lifestyle)बेहद आरामदायक हो और आपके पास संपत्ति की कोई कमी न हो? और अगर आपके वह काम करने से जिससे आपको खुशी मिलती है, इस संपत्ति के छिन जाने का डर हो तो आप इसे कैसे उचित ठहराएंगे?

मेरा (स्टीव पव्लिना) का ख़याल इस बारे में कुछ ऐसा है...

एक ऐसी जीवन शैली को छोड देना जिससे कि आपको गहरी संतुष्टी(fulfillment) ना मिलती हो, धूल को छोड़ने के बराबर है| इसमें मूल रूप से ऐसी कोई भी चीज नहीं होती जिसकी रक्षा आप करना चाहें| एक वेतन, एक कार, एक मकान, या फिर एक जीवन शैली इस लायक नहीं हैं कि उनकी सुरक्षा की जाए, अगर इस सुरक्षा के बदले आपको, अपनी आत्म-संतुष्टि और खुशी की कुर्बानी देनी पडे| वे लोग, जो बिना आत्म-संतुष्टी के, सिर्फ भौतिक कामयाबी के जाल में फंसे हुए हैं, उनका खुद को यह कह कर बहलाना कि, उनके पास कुछ ऐसी मूल्यवान(valuable) चीजें हैं जिनकी सुरक्षा उन्हें करनी चाहिए, एक भ्रम के अलावा और कुछ भी नहीं है| अधिकतर मामलों में यह एहसास कि कुछ है जिसकी रक्षा करनी चाहिए, असली डर से मुहँ छुपाने का सिर्फ एक बहाना भर होता है – कि शायद हकीकत में यह सब सामान, उस खुशी के मुकाबले जो मैंने खो दी है, धूल के बराबर है... शायद मुझे ज्यादा निडर होकर अपना जीवन जीना चाहिए और मेरे सामान का क्या अंजाम होगा इसकी इतनी फ़िक्र नहीं करनी चाहिए|

Last Modified: मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

अपने लक्ष्य को हासिल करने का बेहतर तरीका कौन सा है?

 (Original Post : Cause-Effect vs. Intention-Manifestation, Oct 17th, 2005 by Steve Pavlina)
अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए उपलब्ध आदर्शों में से एक है, कारण और परिणाम का| इस आदर्श के मुताबिक़, आपका लक्ष्य, वह परिणाम है जो आपको हासिल करना है| और आपका काम है उस कारण की पहचान कर, उसका निर्माण करना, ताकि आपको मनचाहा परिणाम मिल सके, और आप, अपना लक्ष्य हासिल कर पाएं|    

सुनने में काफी आसान लगता है, है न?

परन्तु, इस आदर्श तरीके के साथ एक प्रमुख समस्या है कि इसे समझने में, लगभग सभी व्यक्ति गंभीर रूप से ग़लतफ़हमी के शिकार होते हैं| और इस ग़लतफ़हमी की वजह है, यह न जानना कि असली ‘कारण’ आखिर है क्या?

आप यह मान सकते हैं कि परिणाम का कारण, शारीरिक और मानसिक क्रियाओं की एक श्रृंखला(series) हो सकती है, जिससे कि वह परिणाम हासिल होता है| क्रिया-प्रतिक्रिया| अगर आपका लक्ष्य, खाना बनाना है तो शायद आप सोचने लगें कि खाना तैयार करने के ‘चरणों की श्रंखला’(series of steps) ही वह कारण होगी|

Last Modified: शनिवार, 21 जनवरी 2012

अपने काम को खुशी से कीजिए या फिर काम ही मत कीजिए|

(Original Post : Love Your Work or Don’t Work at All Dec 19th, 2007 by Steve Pavlina)
   
ऐसा क्यों है कि इतने अधिक व्यक्ति, उस काम (आजीविका/व्यवसाय) को सहन करने के लिए सहर्ष ही तैयार हो जाते हैं, जिसे करने से उनको जरा भी खुशी नहीं मिलती, सिर्फ उस तनख्वाह के चैक(check) की खातिर जो उन्हें महीने के अंत में मिलता है? मैं(स्टीव पव्लीना) सोचता हूँ कि इसकी वजह यह है कि उनमें से अधिकतर को इस बात को कोई अंदाजा नहीं है कि अपने काम से प्यार हो जाना, कैसा होता है? उनके डर, उनकी शक्ति पर हावी हो जाते है, इसलिए, वे कभी, आगे बढ़ कर, यह जान ही नहीं पाते कि काम को, पैसे के बजाय, प्यार के लिए करना कैसा होता है|

अब आइए, खलील गिब्रान के ग्रंथ “पैगम्बर(The Prophet)” से लिए गए, इस परिच्छेद पर जरा गौर करें|
“कार्य प्यार को दर्शाता है|

और अगर आप काम को प्यार के बजाय, सिर्फ अरुचि से ही कर सकते हैं, तो अच्छा यही होगा कि आप, अपना काम छोड कर, मंदिर(धार्मिक स्थल) के दरवाजे पर बैठ जाएँ और उनसे भिक्षा(दान) लें जो अपना काम आनंद से करते हैं|

Last Modified: बुधवार, 18 जनवरी 2012

डिप्रेशन (अवसाद) को कैसे दूर भगाएं?

(Original Post : Overcoming Depression Jun 29th, 2006 by Steve Pavlina)   

इस हफ्ते की शुरुआत में मैनें, “निराशावादी लोगों की मदद कैसे करें” (लेख जल्द ही उपलब्ध होगा) विषय पर एक लेख लिखा था| लेकिन क्या हो, अगर आप खुद ही लंबे समय से उदासी महसूस कर रहे हों तो? इस लेख में मैं, आपको नकारात्मक मन:स्थिति से निकलने के एक तरीके के बारे में बताना चाहता हूँ, जोकि डिप्रेशन (अवसाद) को थोड़े समय के लिए ही नहीं बल्कि हमेशा के लिए दूर कर सकता है| इसे सरल बनाने के लिए मैं डिप्रेशन का उदाहरण दे रहा हूँ, लेकिन यह तरीका दूसरी नकारात्मक भावनाओं, जैसे कि गुस्सा, चिंता, नाराजगी आदि पर भी काम करता है|

डिप्रेशन क्या है?
डिप्रेशन से ग्रसित व्यक्तियों के पास अक्सर उदास रहने की एक, उचित सी लगने वाली, वजह होती है, और बाहर से देखने पर उन कारणों में कुछ भी गलत नहीं लगता| अगर आप आर्थिक तंगी, सेहत या और दूसरी अनचाही चुनौतियों का सामना कर रहे हैं तो कोई भी समझदार व्यक्ति आपके हालात को देखकर, आपसे सहमत हो जाएगा| “हाँ भई, यह तो बड़े मुश्किल हालात हैं|”