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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

अपने लक्ष्य को हासिल करने का बेहतर तरीका कौन सा है?

 (Original Post : Cause-Effect vs. Intention-Manifestation, Oct 17th, 2005 by Steve Pavlina)
अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए उपलब्ध आदर्शों में से एक है, कारण और परिणाम का| इस आदर्श के मुताबिक़, आपका लक्ष्य, वह परिणाम है जो आपको हासिल करना है| और आपका काम है उस कारण की पहचान कर, उसका निर्माण करना, ताकि आपको मनचाहा परिणाम मिल सके, और आप, अपना लक्ष्य हासिल कर पाएं|    

सुनने में काफी आसान लगता है, है न?

परन्तु, इस आदर्श तरीके के साथ एक प्रमुख समस्या है कि इसे समझने में, लगभग सभी व्यक्ति गंभीर रूप से ग़लतफ़हमी के शिकार होते हैं| और इस ग़लतफ़हमी की वजह है, यह न जानना कि असली ‘कारण’ आखिर है क्या?

आप यह मान सकते हैं कि परिणाम का कारण, शारीरिक और मानसिक क्रियाओं की एक श्रृंखला(series) हो सकती है, जिससे कि वह परिणाम हासिल होता है| क्रिया-प्रतिक्रिया| अगर आपका लक्ष्य, खाना बनाना है तो शायद आप सोचने लगें कि खाना तैयार करने के ‘चरणों की श्रंखला’(series of steps) ही वह कारण होगी|

बाहर से देखने पर, मामला ऐसा ही नजर आता है| वैज्ञानिक विधियाँ, जो कि पूरी तरह से, बाहरी अवलोकन(objective observation) पर आधारित होती है, हमें बताती हैं कि यही तो वह तरीका है जिससे चीजें काम करती हैं|

फिर भी अपनी चेतना के दायरे में, आप यह बात जानते हैं कि कार्य के ‘चरणों की श्रृंखला’ असली कारण नहीं है| कार्य तो अपने-आप में ही एक परिणाम हैं, क्या नहीं?

तो आखिर असली कारण है क्या? असली कारण है वह निर्णय जोकि आपने उस परिणाम की रचना करने के लिए लिया था| यह, वही पल था जब आपने खुद से कहा था कि “चलो इस काम को करते हैं” या “इसे ऐसा बनाते हैं|” किसी एक बिंदु पर, आपने खाना बनाने का फैसला लिया था| हो सकता है कि वह निर्णय अवचेतन मन में उपजा हो, लेकिन फिर भी वह एक निर्णय तो था ही| और उस निर्णय के बगैर, खाना कभी भी नहीं बन सकता था| वह निर्णय, आखिरकार ‘कार्य के चरणों’ की पूरी श्रंखला का, कारण बना और अंत में वह आपके खाना बनाने के स्वरूप में साकार(फलीभूत) हुआ|

वह निर्णय कहाँ से उत्पन्न हुआ? वह आपके अवचेतन मन की भी उपज हो सकता है या फिर, सचेत निर्णय के मामले में, वह आपके सचेतन मन में उत्पन्न हुआ था| आखिरकार, आपका सचेतन मन अधिक शक्तिशाली होता है, क्योंकि यह अवचेतन मन के निर्णयों को नकार सकता है, एक बार यह उनके बारे में जान जाए तो||

बहुत से व्यक्ति अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाते क्योंकि वे, इस बेहद साधारण अंतर को समझने में भूल कर बैठते हैं|

अगर आप, अपने किसी एक लक्ष्य को, जिसे आपने निर्धारित किया है, हासिल करना चाहते हैं तो सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है – इसे साकार करने का निर्णय लेना| आपको भले ही ऐसा कर पाना,  अपने वश से बाहर की बात महसूस होती हो लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता| कोई फर्क नहीं पड़ता है अगर आप अभी भी समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर आप कैसे, इस बिंदु से उस बिंदु तक, अपना रास्ता बनाएंगे? एक बार आपने अपना निर्णय ले लिया तो उनमें से ज्यादातर संसाधन(resources) आपको रास्ते में उपलब्ध होते चले जाएंगे, लेकिन निर्णय लेने के बाद, पहले नहीं|

अगर आपने इस बेहद साधारण चरण को नजरअंदाज कर दिया तो आपका काफी समय यूँ ही बर्बाद हो जाएगा| पहला चरण निर्णय लेने का है| न कि सोच-विचार करने, मनन करने या फिर सबसे सलाह करके, यह सोचने का कि आप इस काम को कर भी पाएंगे या नहीं? अगर आप, अपना खुद का, बिजनेस शुरू करना चाहते हैं, तो इसे शुरू करने का निर्णय लीजिए| अगर आप शादी करके घर बसाना चाहते हैं, तो एक भावी जीवनसाथी को आकर्षित करने का निर्णय लीजिए| अगर आप अपना व्यवसाय(career) बदलना चाहते हैं तो इसे बदलने का निर्णय लीजिए|

मुझे यह सोचकर बड़ा आश्चर्य होता है कि लोगों को लगता है कि निर्णय लेने से पहले कुछ और भी होना चाहिए| लोग कई महीनों का समय, इस पर सोच-विचार करने में ही व्यर्थ कर देते हैं कि “क्या यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है?” अगर आप चेतना के एक विशेष स्तर पर है तो ऐसा करना सही भी लगता है| लेकिन वास्तव में आप, विलम्ब(देरी) करने के अलावा और कुछ भी नहीं कर रहे होते हैं, और आपको केवल वही प्रमाण(सबूत) मिलने लगेंगे जोकि यह बताएँगे कि आपका लक्ष्य संभव है भी और नहीं भी| अगर आपके मन में संदेह है तो आपको दुनिया में भी संदेह ही नजर आने लगेगा|

मुझे, बार-बार, इसी बात के सबूत मिलें हैं कि न केवल लोग, बल्कि खुद सृष्टि(universe) भी, लक्ष्य के प्रति, प्रतिबद्धता(commitement) को महसूस कर लेती है| क्या आपने कभी किसी को, उनके लक्ष्यों के बारे में बात करते हुए सुना है और कैसे आप तुरंत महसूस कर लेते हैं कि वे, अपने लक्ष्यों को लेकर, कितने भ्रमित और अनिश्चित हैं? उनकी बातें कुछ इस तरह की होती हैं, “हाँ भई, मैं कोशिश तो कर रहा हूँ, अब देखते हैं कि आगे क्या होता है| उम्मीद तो है कि यह काम करेगा|” क्या यह, इस बात का सबूत है कि एक स्पष्ट निर्णय ले लिया गया है? दूर-दूर तक नहीं| क्या आप इस व्यक्ति की मदद करना चाहेंगे? शायद नहीं – कौन अपना समय, ऐसे व्यक्ति पर बर्बाद करना चाहेगा जोकि समर्पित(committed) ही नहीं है?

परन्तु क्या होता है जब आप महसूस करते हैं कि सामने वाला व्यक्ति, पूरी तरह से समर्पित है? क्या आप उनके मदद मांगने पर उनकी सहायता करेंगे? आपकी, किसी ऐसे व्यक्ति की मदद करने की संभावना कहीं अधिक है क्योंकि आप यह बता सकते हैं कि ऐसे लोगों को तो आख़िरकार, वैसे भी, सफल होना ही है, और आप, उस सफलता का हिस्सा बनना चाहते हैं| ऐसे व्यक्तियों की सफलता में योगदान देना, आपको खुद भी अधिक उत्साहित और प्रेरित करता है, जोकि बहुत स्पष्ट तौर पर अपने, ऐसे किसी एक लक्ष्य के प्रति समर्पित होते हैं, जो आपको भी पसंद है और जिससे, सही मायने में, सबका भला होता है|

क्या आपको नहीं लगता कि यह प्रक्रिया, आपके मन में भी, ठीक इसी तरह से काम करती है? अगर आपकी चेतना, खुद के ही खिलाफ विभाजित हो तो आपको लगता है कि यह, अपने सभी भीतरी संसाधनों(resources) को, आपके लक्ष्य के लिए समर्पित कर पाएगी| क्या आपका अवचेतन, आपको अपनी पूरी शक्ति और रचनात्मकता प्रदान करेगा, या फिर वह, इन पर रोक लगा देगा? अपने अवचेतन मन को एक ‘मल्टी-टास्किंग कंप्यूटर प्रोसेसर’(multitasking computer processor, कई काम एक साथ करने वाला कंप्यूटर प्रोसेसर) की तरह समझिए| यह, अपने कितने प्रतिशत संसाधनों को एक ऐसा काम करने में लगाएगा, जिसके बारे में, आप इसे कुछ ऐसे आदेश देंगें, “इसे थोड़ी देर के लिए चला कर देखो कि यह काम करता है या नहीं, लेकिन अगर यह ज्यादा कठिन लगे तो इसे तुरंत रोक देना?” अब क्या हो, कि आप उसी प्रोसेसर को, एक काम देकर यह कहें कि, “इसे अभी चलाओ”?

यह सृष्टि, खुद भी इसी नियम के हिसाब से चलती है| इसे एक अतिचेतन मन(superconscious mind) के समान समझिए| जब आपने एक स्पष्ट, प्रतिबद्ध निर्णय ले लिया तो यह सृष्टि के संसाधनों के फाटक आपके लिए खोल देगा, और वे सभी संसाधन, जिनकी आपको जरूरत है आपके पास आ जाएंगे और वह भी, कभी-कभार बड़े ही रहस्यमयी या नामुमकिन से नजर आने वाले, तरीकों से|

जब कभी भी आप अपने लिए एक नया लक्ष्य निर्धारित करना चाहें, तो शुरुआत इसे स्थापित करने से करें| आपकी इच्छा क्या है, इसे स्पष्ट रूप से जानने में वक्त जरुर लगाईए, लेकिन उसके बाद, बस इसकी घोषणा कर दीजिए|

सृष्टि से कहिए, “यह रहा लक्ष्य| इसे पूरा करो|”

जो आपको चाहिए, वह सृष्टि से मत मांगिए | घोषणा कीजिए| मांगिए मत| यह प्रार्थना की तरह ही है, लेकिन आपको जो चाहिए, उसके लिए आप प्रार्थना नहीं कर रहे हैं| आप, प्रार्थना कर रहे हैं – आपको क्या चाहिए? आप सहजता से कह रहे हैं, “यह लक्ष्य है| इसे पूरा करो|” यह जमीन में एक बीज बोने जैसे ही है| आप मिट्टी से यह तो नहीं कहते कि “यह बीज है| कृपया, क्या तुम इसे विकसित कर, एक पौधे में बदल सकती हो?” आप केवल बीज बो देते हैं, और वह, आपके बीज बोने और देखभाल करने के सहज परिणाम स्वरूप, एक पौधे में विकसित हो जाता है| आपके संकल्पों(intentions) के साथ भी कुछ ऐसा ही है| केवल उन्हें बो दीजिए| भीख(विनती करने) मांगने की कोई जरुरत नहीं|

यह संकल्प लीजिए कि आपके लक्ष्य कुछ इस तरह से साकार हों जिससे सभी का भला हो सके| यह बहुत जरूरी है, क्योंकि वे संकल्प, जोकि डर या फिर आभाव के कारण जन्म लेते हैं, उलटे हमें ही नुकसान पहुंचाते हैं| जो आपको चाहिए था वह आपको मिल तो जाता है, लेकिन बाद में इसका स्वाद, कसैला हो जाता है| या फिर हो सकता है आपने जैसा चाहा था, आपको ठीक उसका उलटा मिले| परन्तु, वे संकल्प, जोकि वास्तव में आपकी खुद की और सभी की भलाई को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं, उनके एक सकारात्मक रूप से, साकार होने की अधिक संभावना होती है|

जब मैं, अपने संकल्प की घोषणा कर देता हूँ, तो मैं संसाधनों के पहुँचने और तालमेल (synchronicities) के बनने का इंतजार करता हूँ| आम तौर पर उनके साकार होने की शुरुआत, २४ से ४८ घंटों के भीतर हो जाती है, कभी-कभी तो इससे भी पहले| कभी-कभी ऐसा लगता है जैसेकि यह तालमेल, अवचेतन मन की गतिविधि का परिणाम हो| मैं, उन चीजों पर ध्यान देने लगता हूँ जोकि हमेशा से वहाँ पर थीं, लेकिन, अब मैं उन्हें एक नयी रोशनी में देखने लगता हूँ, और वे ही चीजें मेरे लिए संसाधन बन जाती हैं, जिन पर मैंने तब तक कोई ध्यान नहीं दिया था, जब तक मैंने अपने संकल्प की घोषणा नहीं कर दी थी| लेकिन कई बार ऐसे तालमेल को, मेरे खुद के अवचेतन मन की गतिविधि के परिणाम के तौर पर, समझाना लगभग असंभव हो जाता है| अगर मैं, दो कदम पीछे हटकर, इसे पूरी तरह से ‘बाहरी अवलोकन(objective observation)’ के तौर पर समझना चाहूँ तो वह भी बड़ा मुश्किल होता है| कभी-कभी तो वे ऐसी अप्रत्याशित बाढ़ का रूप में आते हैं कि उनका वर्णन मैं केवल, ‘अतिचेतन मन’ की गतिविधि के तौर पर ही कर सकता हूँ| किसी स्तर पर सृष्टि, खुद भी मेरे संकल्प के प्रति सजग होती है और इसे साकार करने के लिए अपना योगदान दे रही होती है| मैंने यह भी पाया है कि इस तालमेल का मैं जितना अधिक स्वागत करता हूँ, यह उतनी ही आसानी से प्रवाहित होता है| अभी, वर्तमान में मैं, आमतौर पर हर हफ्ते करीब १० बार तालमेल का अनुभव कर रहा हूँ, और मैं सोचता हूँ, इसकी वजह यह है कि मेरे बहुत से अलग-अलग संकल्प अभी साकार होने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं, इसलिए संसाधनों का एक अनवरत(consant) प्रवाह मेरी ओर आता रहता है|
 
मानसिक और शारीरिक योजना बनाने और काम करने का चरण इसके बाद आता है| इस चरण में मैं, उन संसाधनों को व्यवस्थित करता हूँ जोकि मेरे पास पहुँच चुके होते हैं| एक बार मेरे पास पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हो जाते हैं तो फिर मैं, यह पता लगाना शुरू कर सकता हूँ कि उन्हें, एक दूसरे के साथ कैसे जोड़ा जाए, ताकि अपना लक्ष्य हासिल किया जा सके| लेकिन अगर रास्ता बहुत ही पेचीदा(complicated) या मुश्किल दिखाई देता है और मुझे यह पसंद न हो, तो मैं कुछ नए संकल्प धारण कर लेता हूँ ताकि यह वैसा बन जाए जैसाकि मैं चाहता हूँ| मैं घोषणा कर देता हूँ, “इसे कुछ सरल बनाओ|“ मैं फिर से तालमेल के बनने की प्रतीक्षा करता हूँ, और एक सरल पद्धति(approach) स्पष्ट हो जाती है| अक्सर पद्धति के सरल होने का अर्थ यह होता है कि मुझे, अपने अंदर, किसी व्यक्तिगत रुकावट को पार करना होगा| उस सरल पद्धति का फायदा उठाने के लिए, मुझे खुद को, विकास के किसी निश्चित स्तर तक, विकसित करना होगा| या फिर मुझे पहले एक नया हुनर(skill, गुण) सीखना पडेगा| लिहाजा एक तरफ से यह आसान तो हो जाएगा, वहीं दूसरी तरफ व्यक्तिगत स्तर पर यह कठिन हो जाएगा| उदाहरण के तौर पर, अगर मैं दूसरों की अधिक मदद करने का संकल्प रखता हूँ तो मुझे अपने संवाद कौशल(communication skill) को निखारना होगा| इससे लक्ष्य को हासिल करना आसान हो जाएगा, लेकिन पहले इस पर काफी काम करना होगा|

इस पद्धति पर पूरी तरह से भरोसा करने और इसे, अपने लक्ष्यों को हासिल करने की आदर्श पद्धति बनाने में, मुझे कई सालों का वक्त लगा| कई बार मुझे लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए असाधारण तौर-तरीकों के प्रति भी उदार रहना पड़ता है| मुझे वह हासिल होता है जिसका संकल्प मैंने लिया था, लेकिन हर बार वह नहीं मिलता जिसकी उम्मीद होती है| इसलिए, जब भी तालमेल बनना शुरू होता है और मुझे सुराग मिलने लगते हैं, कभी-कभी मैं समझ ही नहीं पाता हूँ कि वे लक्ष्य को हासिल करने में आखिर कैसे मददगार साबित होंगें? परन्तु इसके पीछे, हमेशा ही एक समझ(intelligence) काम कर रही होती है, और अगर मैं इस पर भरोसा करूँ तो यह ठीक ही काम करती है| आम तौर पर, यह पहले नयी जानकारी उपलब्ध कराती है, ताकि मैं अपनी जागरूकता और ज्ञान को उस स्तर तक बढ़ा सकूँ जिसकी जरूरत लक्ष्य को हासिल करने के लिए होगी|

मिसाल के तौर पर, अगर आप अमीर बनने के अपने संकल्प की घोषणा करते हैं तो कुछ ही दिनों में आप शायद, आध्यात्मिकता से जुड़े हुए, तमाम तरह के तालमेल को बनता हुआ देखने लगें| अब दिखने में, ऐसा तो नहीं लगेगा कि उन तालमेलों को धन से कोई लेना-देना है| और आप सोचेंगे कि यह तो महज एक संयोग है और यह पद्धति काम नहीं करती है| लेकिन पद्धति एकदम दुरुस्त है और सही तरह से अपना काम कर रही है| अधिक संभावना है कि यह इस बात का एक संकेत हो कि धनवान बनने से पहले आपको, अपनी चेतना पर काम करने की जरूरत है| और अगर आपका संकल्प सभी के भले के लिए है तो फिर यह खास तौर पर आपके लिए और भी जरूरी है| अगर आप अपनी ऊर्जा और चेतना के एक निश्चित स्तर पर पहुँचने से पहले अमीर बन गए तो अधिक भौतिक धन-दौलत के होने से शायद आपकी समस्याएं ही बढेंगी – और तब, सभी की भलाई का, आपका लक्ष्य साकार नहीं हो पाएगा| लेकिन अगर आप, पहले अपनी ऊर्जा और चेतना का प्रयोग, सकारात्मक रूप से करना सीख जाएँ तो फिर अधिक संसाधन, जोकि धनवान होने की वजह से आपके पास उपलब्ध होंगे, सकारात्मक रूप से साकार होंगे न कि नकारात्मक रूप से|

वास्तव में यह एक बहुत ही साधारण और सरल प्रक्रिया है| लेकिन हमारे मन सामाजिक अनुकूलन(social conditioning, सामाजिक खांचे में ढलना) के मलबे से इतने ठसाठस भरे हुए हैं कि हमारे लिए इस स्तर पर सोच पाना भी मुश्किल है| हम अपने लक्ष्यों को एक निश्चित तरीके से साकार होते हुए देखने के बेहद आदी हो चुके हैं क्योंकि वे टीवी सीरियलों या फिल्मों में ऐसे ही तो साकार होते हैं| या फिर शायद इसलिए, क्योंकि हमारे माता-पिता या दोस्तों नें ऐसे ही तो अपने लक्ष्यों को हासिल किया था| लेकिन “ऐसे ही” से हमारा यह लगाव, हमें अपने लक्ष्यों को कहीं आसान तरीके से साकार करने से रोक देता है| अगर हम “ऐसे ही” पर अपनी पकड़ थोड़ी ढीली कर सकें और लक्ष्यों को, उनके खुद के दोषरहित तरीके से, साकार होने की अनुमति देना सीख सकें, तो लक्ष्यों को हासिल करना कहीं आसान हो जाएगा|

अक्सर मैं(स्टीव पव्लिना) देखता हूँ कि लोग खुद ही अपने ही लक्ष्यों को नष्ट कर बैठते हैं क्योंकि वे संकल्प की शक्ति को नहीं जान पाते| इस बात को समझिए कि हर विचार, असल में एक संकल्प ही है| हर विचार| इसलिए अधिकतर लोग अपने जीवन में, बेतरतीब रूप से ठसाठस भरे विरोधाभासों को ही साकार कर पाते हैं क्योंकि खुद उनके विचारों में भी विरोधाभास होता है| वे एक ही बार में लक्ष्य निर्धारित भी करते हैं और फिर तुरंत ही उसे निरस्त(unset) भी कर देते हैं| “मैं अपना बिजनेस शुरू करना चाहता हूँ|” “अब पता नहीं यह चलेगा भी या नहीं|” “शायद बात नहीं बनेगी|” “शायद रवि ठीक ही कह रहा था कि मैं गलती कर रहा हूँ|” “अरे नहीं, मुझे पूरा यकीन है कि यह ठीक-ठाक चलेगा|”

अगर आप, अपने लक्ष्यों को ‘कारण-परिणाम’ के स्तर पर हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि आपका पूरा ध्यान कार्य करने के चरणों पर केन्द्रित रहेगा, जबकि ‘संकल्प-साकार’ के उच्च स्तर पर, आप परस्पर-विरोधी(conflicting) विचारों को प्रसारित(putting out) कर रहे होंगे, और इस तरह आप पाएंगे कि आप खुद को ही नुकसान पहुंचा रहे है| अगर आप वजन घटाने के उद्देश्य से, दीवानों की तरह व्यायाम करने में जुट जाएँ, जबकि आप, मन में यही सोच रहे हों कि, “मैं मोटा हूँ| इससे कोई फायदा नहीं होने वाला|  इसमें तो बहुत समय लग रहा है,” तब फिर आपके उच्च स्तर के संकल्प, आपके कार्यों पर भारी पड़ेंगे, और आपको नकारात्मक या असंगत(incongruent) नतीजे देखने को मिलेंगे|

अगर आप अपने एक लक्ष्य को हासिल करना चाहते हैं, तो फिर आपको, अपनी चेतना को “उम्मीद तो है”, “शायद” और “नहीं हो सकता” जैसी सभी व्यर्थ(बकवास) की बातों से मुक्त करना होगा| आप खुद को नकारात्मक विचार के ऐशो-आराम(luxuary) में डूबने की इजाजत नहीं दे सकते, क्योंकि वह वास्तव में, जो आप नहीं चाहते, उसे साकार करने का एक संकल्प ही होता है| इसके लिए बेशक अभ्यास करने की जरूरत पड़ती है, लेकिन यह एक जरूरी कला है जो आपको अपनी चेतना का उपयोग कर, “जो आप चाहते हैं उसकी रचना करना,” सिखाती है| जब आपके विचार संगत(congruent) होते हैं तब आपके लक्ष्य आसानी से साकार होते हैं| लेकिन जब आपके विचार असंगत होते हैं, तब विरोध, और रुकावटें साकार रूप लेती हैं| जैसा अंदर है, बाहर भी वैसा ही होगा|

ऐसा क्यों है कि आप ऐसा करने में सक्षम हैं? क्योंकि आपके पास वह शक्ति है| खुद पर भरोसा नहीं करने का सीधा सा अर्थ है कि आप, अपनी शक्ति को खुद के ही खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं| आप एक ऐसे ईश्वर की तरह हैं जो कह रहा हो कि, “मुझे शक्तिहीन बनना है,” और आपको इसका अंदाजा भी नहीं होता| अगर आप दुर्बलता(कमजोरी) के विचारों/संकल्पों को रखेंगे, तो आप दुर्बलता को ही साकार करेंगे| और अगर आप, अपनी शक्ति के केन्द्र को, खुद से अलग और बाहरी दुनिया में रखेंगे तो आप, अपनी शक्ति खो देंगें|

आपको ऐसा करने के लिए किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं है| यह तो मनुष्य की एक स्वाभाविक क्षमता है, लेकिन हाँ, अपनी चेतना का उस स्तर तक विकास करने में, जहाँ पर आप इसका उपयोग कर सकें और खासकर इस पर भरोसा करना सीख सकें, अभ्यास की जरुरत होती है|

क्या होता है जब आप एक बड़े, बहुत ही बड़े, लक्ष्य को साकार करने का निर्णय लेते हैं, एक ऐसा लक्ष्य जो भौतिक रूप से लगभग असंभव सा लगता है? यह सिद्धांत फिर भी काम करता है| फर्क सिर्फ यह होता है कि अब चरणों(steps) की संख्या बढ़ जाती है, और आपको कई वर्षों तक विभिन्न तरह के तालमेलों से गुजरना होगा जब तक आप उस बिंदु तक नहीं पहुँच जाएंगे जहाँ पर आपका लक्ष्य आखिरकार साकार हो पाएगा| अगर आपका लक्ष्य बेहद विशाल हो तो संभव है कि इसमें आपके जीवन-काल(lifetime) से भी ज्यादा वक्त लगे| लेकिन यह तो तय है कि इस पद्धति का प्रयोग करने पर आप निश्चित तौर पर उन्नति(progress) करेंगे|

अच्छा तो अब बताइए, कि आपका लक्ष्य क्या है? इसे अभी ऊँची आवाज में कहिए, और इसे ऐसा बनाइए जिससे कि सभी का भला हो सके| फिर सृष्टि से कहिए “इसे पूरा करो|” तालमेल के बनने और आसामान्य संयोगों(coincidences) के आने का इंतजार कीजिए| उनका हाथ थामिये और वहाँ चल दीजिए, जहाँ वे आपको ले जाना चाहते हैं, तब भी, जब यह शुरू में अजीब सा ही क्यों न नजर आए| अपने लक्ष्यों को साकार होने की अनुमति दीजिए|       


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3 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर सकारात्मक पोस्ट...... कुछ अलग से विचार प्रेरणा,उत्साह देते हुए.....आभार

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