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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: बुधवार, 7 मार्च 2012

आप और कैबिन

(Original Post : You vs. the Cubicle, Oct. 13th, 2009 by Steve Pavlina)    

आह, वो कैबिन! हलके भूरे रंग का खूबसूरत पिंजरा| 
           (*कैबिन - cubicle, ऑफिस में आपका काम करने का कमरा)

अपना मनपसंद काम करने के एकदम उल्ट होता है, कैबिन| वास्तव में कोई भी व्यक्ति, जब अपना सबसे मनपसंद, काम करने के बारे में सोचता है तो वह कैबिन की कल्पना नहीं करता|

कैबिन वह जगह है जहाँ पर आप तब पहुँचते हैं जब आप, जिस काम से आपको खुशी मिलती है, उसे करने से पीछे हट जाते हैं|

आप कैबिन में सिर्फ एक ही तरीके से फंस सकते हैं, अपनी शक्ति उसे देकर|

एक कैबिन का आप के ऊपर कोई जोर नहीं चलता| आप कैबिन को समर्थ(empower) बना सकते है लेकिन यह खुद को समर्थ नहीं बना सकता|

एक ऐसी नौकरी के बारे में शिकायत करना जिसे आप नापसंद करते हैं, एक तरह से अपनी शक्ति, उसे दे देना ही है| आपने नौकरी को चुना है, और आप उतनी ही आसानी से नौकरी से गायब भी हो सकते हैं|

इसे कुछ इस तरह से लीजिए : अगर आपकी, कैबिन के साथ लड़ाई हो जाए तो कौन जीतेगा?

अभी भी आश्वस्त(sure) नहीं हैं? तो इसके बारे में क्या ख्याल है : आप के पास एक आरी हो और कैबिन के पास भी एक आरी हो, तो अब कौन जीतेगा?

अगर आप कैबिन को छोड कर जाने का फैसला करते हैं तो, इसे पास इतनी शक्ति नहीं कि यह आप को रोक सके| आप जब चाहे इसकी धज्जियाँ उड़ा सकते हैं|

लिहाजा, जिस किसी ने आपको उस कैबिन में फँसा रखा है, वह आप खुद हैं| आप वहाँ अपनी मर्जी से हैं| आप वहाँ इसलिए हैं क्योंकि आपने इसी तरह की जिंदगी का सृजन(creation) किया है|

“लेकिन मुझे वह कैबिन इसलिए चाहिए क्योंकि मुझे धन कमाना है,” - आप कहते हैं|

अब आप अपनी शक्ति धन को दे रहे हैं| धन, सिर्फ कागज़ के एक टुकड़े...या फिर कंप्यूटर स्क्रीन पर एक संख्या, के अलावा और कुछ भी नहीं है| आखिर जो चीज इतनी निर्जीव और बेजान है, वह कैसे आपके ऊपर हुकूमत(power/control) कर सकती हैं?

अगर आपकी और १ करोड रुपयों की लड़ाई हो जाए, तो कौन जीतेगा?

आश्वस्त नहीं हुए? अच्छा तो फिर कोशिश करते हैं : आप के पास एक माचिस हो और १ करोड रुपयों के पास भी एक माचिस हो| तो अब कौन जीतेगा?

अब यह क्या वाकई में एक बराबरी का मुकाबला है? आप ऐसे हजारों मुकाबले कर सकते हैं और आप उसमें से हर एक जीत सकते हैं 

“लेकिन मुझे बिल भी तो चुकाने हैं,” – आप कहते हैं|

अब आप अपनी शक्ति बिलों को दे रहे हैं| आपको शायद एहसास है कि आपको ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं है, क्या वाकई में है?

आखिर एक बिल क्या होता है? ज्यादा से ज्यादा कागज़ के चंद टुकड़े |

आपकी और आपके बिलों की लड़ाई में कौन जीतेगा?

क्या आप देख पा रहे हैं कि यहाँ पर ताकतवर कौन हैं, या फिर इसे साबित करने के लिए पहले हमें आप दोनों को एक-एक कैंची देनी पड़ेगी?

“लेकिन मुझे, अपने सिर के ऊपर एक छत भी तो चाहिए और टेबल पर खाना भी,” – आप कहते हैं|

अब आप अपनी शक्ति छत और खाने को दे रहे हैं| ये बेजान वस्तुएँ हैं|

आपके और एक घर के बीच, या फिर आपके और ‘एक टन’ भोजन के बीच, मुकाबला हो जाए तो कौन जीतेगा? मेरे विचार से यह तो साफ़ है कि आप इन मुकाबलों में जबरदस्त प्रतिद्वंदी(opponent) साबित होंगे, और अगर आप, केले के छिलके पर पैर रखकर फिसल जाने की मूर्खता न करें, तो आप आसानी से जीत जाएंगे|

बहाना बनाने और फिर उसकी धज्जियाँ उड़ाने के इस सिलसिले को आप जितने लंबे समय तक चाहें, उतने समय तक बरकरार रख सकते हैं| आप बार-बार एक ही निष्कर्ष (नतीजे) पर पहुँचते रहेंगे| हर तरह की बौद्धिक तर्क(rationalization), अपनी शक्ति को दूसरों को देने का, सिर्फ एक नया बहाना भर होता है|

अपनी शक्ति, दूसरों को दे देना मूर्खता है| ऐसा कौन होगा जोकि अपनी रचनात्मक शक्तियों का उपयोग, पहले तो एक जाल बनाने में करे और फिर उसके बाद उस जाल में फंस जाने के बारे में शिकायत करता रहे? यह कोई बहुत समझदारी वाली बात तो नहीं हुई, नहीं न? मेरे कहने का मतलब यह है कि ऐसा करने के लिए आपको नासमझ, बहुत ही ज्यादा नासमझ होना होगा, या नहीं?

क्या आप महसूस कर रहे है कि वास्तव में आप, किसी भी चीज को अपनी शक्ति देने के लिए मजबूर नहीं हैं? किसी चीज को भी नहीं|

आपको वाकई में, अपने लिए एक जाल बनाने, उसमें गिरने, और फिर सालों-साल तक, उस जाल के बारे में शिकायत करते रहने की, कोई जरुरत नहीं है|

और फिर ऐसा भी तो नहीं है कि आपका जाल बहुत ही मजबूत हैं| एक कैबिन, कोई बहुत मजबूत पिंजरा नहीं होता है, या वाकई में होता है? आप अभी इसी पल, इससे निकलकर दूर जा सकते हैं, और यह आपको नहीं रोक सकता|

एक असंतुष्ट सम्बंध भी कोई पिंजरा नहीं होता| और आप फिर से, उतनी ही आसानी से इससे निकल कर दूर जा सकते हैं|

इस वक्त भी, आपके पास, अपनी शक्ति को वापिस लेने और इसे फिर से हासिल करने की क्षमता है|

और वह शक्ति है आपकी रचनात्मक क्षमता| अपनी शक्ति का उपयोग करके आप वास्तविकता(reality) को अपनी मर्जी के मुताबिक़ ढाल सकते हैं| अगर आप एक अलग वास्तविकता का अनुभव करना चाहते हैं, तो आपके पास उसका निर्माण करने की शक्ति है|

अगर आपको अपने सिर के ऊपर छत चाहिए और टेबल पर खाना चाहते हैं, तो आप अपनी शक्ति का उपयोग करके उसकी रचना कर सकते हैं|

अगर आप चाहते हैं कि आपके जीवन में बिल हों और आप उन्हें आसानी के साथ, समय पर चुका पाएं, तो आप उस वास्तविकता की भी रचना कर सकते हैं|

अगर आप चाहते हैं कि आपके जीवन में धन का प्रवाह होता रहे, तो ऐसा करने की शक्ति भी आप के पास है|
और अगर आप, अपनी जिंदगी कैबिन से बाहर रहकर जीना चाहते हैं, तो एक बार फिर से, ऐसा कर पाने की शक्ति भी, आपके ही के पास है|

बहाने मत बनाइए| अपने हालात के बारे में शिकायत मत कीजिए| शिकायत करना और बहाने बनाना ऐसी क्रियाएँ(actions) हैं जिनसे आप अपनी शक्ति का प्रयोग, ऐसी रचना करने में कर रहे होते हैं, जिसे आप नहीं चाहते|

जब कभी भी आप किसी भी चीज के बारे में शिकायत कर रहे होते हैं, तो ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आप शक्ति के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते|

बेबस होने का अभिनय(acting) मत कीजिए| आप किसी भी बहाने से ज्यादा ताकतवर हैं|

अपनी शक्ति का उपयोग, आप जो चाहते हैं, रचनात्मक ढंग से उसका निर्माण करने में करें| अपनी इच्छाशक्ति को अपनी इच्छाओं पर केन्द्रित करें| अपने विचारों को बेबसी और निराशा से दूर हटा लें|

इस बात को जानिए कि अपनी वास्तविकता का निर्माण करने वाले, आप खुद ही हैं| अगर आप खुद को एक कैबिन में पाते हैं, तो उस वास्तविकता की रचना किसने की है? आखिर किसने अपनी इच्छाशक्ति का उपयोग, उस कैबिन तक चल कर जाने और बैठने में किया है? आपकी इच्छा से ही वह अस्तित्व में आया है| आप ही ने इसके बारे में सोचा था| आपने महसूस किया था कि इसमें बैठने का एहसास कैसा होगा? आपने उस संभावित(potential, probable) वास्तविकता को अपनी शक्ति दी थी| और यही कारण है कि आपने इसे साकार किया और इसका अनुभव किया| लेकिन ऐसा करने के लिए आप मजबूर नहीं थे| न अब हैं| और न ही कभी होंगे|

जिंदगी में अपने चारों ओर देखिए और हर वो चीज जिसकी रचना आपने की है, उस पर ध्यान दीजिए| यह सब आपने किया है| आपके द्वारा, अपनी शक्ति के बार-बार प्रयोग ने ही इस वास्तविकता का निर्माण किया है जिसका अनुभव आप अभी कर रहे हैं|

इस एहसास का जश्न(celebrate) मनाइए| अपनी रचना में अच्छाई को देखिए| आपको वे विचार और भावनाएँ याद हैं, जिनका आयोजन(summon) आपने इसकी रचना करने के लिए किया था| यह अभिनय करके कि आपने इसकी रचना नहीं की, अपनी शक्ति को खुद से दूर मत कीजिए|

आप शायद उन चीजों की काफी अधिक रचना कर चुके हैं, जिनका अनुभव करने की अब आपको कोई इच्छा नहीं है| अगर स्थिति यह है तो, अपनी रचनात्मक शक्तियों को कहीं और केंद्रित कर दीजिए| जिसकी रचना आप पहले ही कर चुके हैं उसे अपनी शक्ति देना बंद कर दीजिए, और इसे उस तरफ मोडना शुरू कर दीजिए, जिसकी अब आप कामना(desire) करते है|

जिसकी रचना आप पहले ही कर चुके हैं, आप उसे नहीं मिटा सकते| लेकिन आप, अपनी वास्तविकता की रचना, फिर से करके उसे वैसा बना सकते हैं जैसा कि आप चाहते हैं|

ज़रा कल्पना कीजिए कि अपनी द्वारा बनाई गई वास्तविकता में जीना कैसा अनुभव होगा? वास्तव में आप पहले ही वहाँ पहुँच चुके हैं| आप हर रोज उसका अनुभव कर रहे हैं| लेकिन अब कल्पना में खुद को एक ऐसी वास्तविकता का आनंद उठाते हुए देखिए जिसे आप वाकई में अनुभव करना चाहते हैं| आप उसकी रचना भी कर सकते हैं|

क्या हो अगर आपको पता ही न हो कि आपको किस चीज में आनंद मिलेगा? आपको कैसे पता चलेगा कि आगे आपको किस चीज की रचना करनी है?

तो फिर, आप जो कुछ भी जानते हैं उससे शुरुआत कीजिए| अगर आपको पता है कि जो कुछ अभी आपके पास है, उसमें आपको रोमांच का अनुभव नहीं होता, तब फिर एक दिशा चुनिए और अपनी रचनात्मक ऊर्जा को वहां पर लगाइए| अगर आप जानते हैं कि अभी वर्तमान में आपको वो अनुभव नहीं हासिल हो रहा जैसा कि आप चाहते हैं, तो फिर आप सबसे मूर्खतापूर्ण कार्य यही कर सकते हैं कि अपनी शक्ति को बार-बार उसी अनुभव की रचना करने में लगाएं|

खोज कीजिए| प्रयोग कीजिए| अपने लिए नए अनुभवों का निर्माण कीजिए| केवल खोज करते रहने  से ही आपको पता चलेगा कि आपको सबसे ज्यादा किस चीज की चाह(desire) है? असफलता के लिए खुद को तैयार रखिए|

अपनी रचनात्मक असफलताओं का जश्न मनाइए| उन मौकों का जश्न मनाइए जब आपने कुछ ऐसा बनाया जिसे आप पसंद नहीं करते थे| वे अनुभव ही आपके लिए सबसे बड़े शिक्षक(teacher) साबित होंगे|

जब आपको पता लगे कि आपने कुछ ऐसा बनाया है जिसे आप पसंद नहीं करते, तो उससे परस्पर तुलना करके सीखिए| खुद से पूछिए, “इससे मुझे यह जानने में कैसे मदद मिलेगी कि वास्तव में मुझे आखिर क्या चाहिए?”
अगर आपको पता है कि आप, अपनी जिंदगी कैबिन में नहीं गुजारना चाहते हैं, तो इससे आपको क्या मदद मिलेगी? इससे आपको यह समझने में मदद मिलेगी कि आप वास्तव में क्या चाहते हैं? यह इस बात का संकेत है कि आपको दूसरी जगहों पर खोज-बीन करनी चाहिए|

कैबिन की जिंदगी पर आपकी प्रतिक्रिया के तौर पर, शायद आप महसूस करें कि आप बाहर और ज्यादा समय गुजारना चाहते हैं| आपको और अधिक आजादी की तमन्ना(desire) हो| आप, अपने समय को अपने हिसाब से संभालना चाहें बजाय इसके कि आप हर रोज एक निश्चित समय पर एक निश्चित जगह हाजिरी देते रहें| आप, थोड़े ज्यादा समय तक, खड़े होकर कुछ घूम-फिर लेना चाहें| आप, साफ़ हवा में साँस लेना और सूरज और चाँद की रौशनी का आनंद उठाना चाहें| आप ऐसे लोगों का साथ चाहें जोकि अपने काम को लेकर जूनून और खुशी से भरे हुए होते हैं, न कि उन लोगों का साथ जोकि गुलाम होते हैं|

अपनी रचनाओं पर ध्यान दीजिए| उनका श्रेय(credit) लीजिए| जो कुछ भी आपने रचा है, पूरी तरह से उसकी जिम्मेदारी लीजिए| और फिर उनसे सीखिए| खुद को, अपनी रचनाओं से भावनात्मक रूप से जुड़ने की इजाजत दीजिए| क्या आप उनसे प्यार करते हैं? क्या आप उनसे नफरत करते हैं? क्या वे बेहद उबाऊ हैं? आप वास्तव में कैसा महसूस करते हैं?

जब आप अपनी जिंदगी पर ध्यान देते हैं, तो क्या आपको बेहद खुशी का एहसास होता है? यह इस बात का संकेत है कि आपने उसी की रचना की है जोकि आप वास्तव में चाहते हैं| या फिर आप बोरियत या निराशा या तनाव महसूस करते हैं? यह इस बात का संकेत है कि आप निशाने से चूक गए और आपको फिर से कोशिश करने की जरूरत हैं|

खुद को, अपनी नयी इच्छाओं की दिशा में लगातार बनाए रखने के लिए, अपनी रचनाओं के प्रति अपनी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं(emotional reactions) का उपयोग, एक कंपास(compass, दिशा-सूचक) की तरह से करें| और अपनी शक्ति को उन रचनाओं को देना बंद कर दें, जिनका अनुभव अब आप नहीं करना चाहते हैं| इस बात को जानिए कि यह सब कुछ आपने ही बनाया है और अब आपके पास किसी और रचना का निर्माण करने की शक्ति है|

अब, अपनी शक्ति को उस नई दिशा में लगाईए| जरूरी नहीं है कि यह एक पूरी तरह से स्पष्ट दिशा ही हो| इसे केवल ‘दिल से होकर गुजरने वाला’, एक रास्ता होना चाहिए, कुछ ऐसा जोकि आपको अच्छा लगता है, ऐसा कुछ जिसकी खोज-बीन आप करना चाहें|

अगर आप ऐसा कोई रास्ता न खोज पाएं, तो फिर एक ऐसे रास्ते को ढूँढें जिसपर चलकर आपको उससे कहीं बेहतर महसूस होता हो, जैसा कि आप अभी महसूस कर रहें हैं|

आपके ‘दिल से होकर गुजरने वाला रास्ता’, वही रास्ता होता है जिस पर चलने के लिए हिम्मत की जरूरत होती है| अगर आपने एक ऐसा रास्ता नहीं चुना है जिस पर चलने के लिए हिम्मत चाहिए, तो फिर आप, अपने लिए एक नया जाल बुनने जा रहें हैं| अंततः आप केवल उसी वास्तविकता की रचना कर रहे होंगे जिसे आप पसंद नहीं करते|

वास्तविक इच्छाएं ह्रदय(दिल, heart) की गहराइयों से निकलती हैं| लेकिन अगर आप अपनी शक्ति का प्रयोग ढुलमुल(weak) तरीके से करेंगे तो फिर मन, इन इच्छाओं का विरोध करेगा| दिल और दिमाग के बीच के इस संघर्ष(conflict) का ही दूसरा नाम डर है| आप डर का अनुभव तब करते हैं, जब आप अपने भीतर एक नजर डालते है ताकि आप एक ऐसा रास्ता देख सकें जोकि दिल से होकर गुजरता है, लेकिन आपका मन संदेह(doubt) करता है कि आपकी पास, इसका निर्माण करने और फिर इसका आनंद उठाने लायक, शक्ति भी है या नहीं?

जब कभी आप ‘दिल से होकर गुजरने वाले’ किसी रास्ते को देखते हैं तो डर और चिंता का अनुभव करना स्वाभाविक ही है| अपनी शक्ति को फिर से जगाने और उस रास्ते पर चलने के लिए, इसका उपयोग करना सीखने में, समय तो लगेगा ही!

कल्पना कीजिए कि शक्ति और ऊर्जा आपके भीतर से बाहर की ओर प्रवाहित(बहना, flow) हो रही है| अपनी शक्ति को अपनी इच्छाओं की तरफ बहने दीजिए| कल्पना कीजिए कि वे वास्तविक हैं| अपनी शक्ति का प्रयोग करके, उनकी रचना, अपने मन और हृदय में कीजिए| अपनी रचनाओं को वास्तविक समझिए| अपनी रचनाओं को महसूस कीजिए| इसे जानिये कि आप रचना करने का काम कर रहे है|

इस बात का ध्यान रखिए कि कहीं आप अपनी शक्ति फिर से, उन्हीं अनचाही रचनायों को ही तो नहीं दे रहे हैं? पुरानी रचनाओं को धीरे-धीरे खत्म हो जाने दीजिए| कैबिन की कैद से बाहर निकल जाइए| असंतुष्ट संबंधों से खुद को अलग कर लीजिए| अपनी शक्ति को केवल अपनी उन इच्छाओं की तरफ मोड़िए जिन्हें आप साकार करना चाहते हैं|

अगर ऐसा करना आपके लिए मुश्किल हो तो फिर, पूरी कोशिश कीजिए कि आप, अपनी शक्ति और वक्त, उन चीजों पर कम से कम खर्च करें, जिन्हें कि आप पसंद नहीं करते| ऐसी चीजों पर अपनी शक्ति, बेहद कंजूसी से खर्च कीजिए| ऐसी रचनाओं से अपनी शक्ति वापस छीन लीजिए| अपनी शक्ति को वापस लेना और खुद में समाहित(absorb) करना जारी रखिए|

ध्यान दीजिए कि जब आप आपनी शक्ति को उन चीजों की तरफ मोड रहे होते है जिन्हें कि आप पसंद नहीं करते| तो आपको पता चल जाता है कि ऐसा हो रहा है क्योंकि आप नकारात्मक भावनाएँ  महसूस कर रहे होते हैं| जब आपको लगे कि ऐसा हो रहा है तो अपनी शक्ति को वापस ले लीजिए और फिर उसे अपनी इच्छाओं की ओर मोड दीजिए| आपको पता चल जाएगा कि ऐसा हो रहा है जब आप सकारात्मक भावनाएँ महसूस करना शुरू कर देंगे| अपनी शक्ति, अपनी इच्छाओं को देने से हमेशा अच्छा महसूस होता है|

जैसे-जैसे आपकी नई इच्छाएं साकार होना शरू हो जाएंगी, आपके सामने नए-नए रास्ते खुलने लगेंगे, इस प्रक्रिया का पूरा आनंद उठाइए| ‘दिल से होकर गुजरने वाले’ रास्ते पर चलना जारी रखिए| अपने शरीर, मन, दिल और आत्मा को अपनी इच्छाओं के साथ एक सीध में ले आइए| जितना संभव हो सके, उन्हें अपने सामने ही रखिए और जिन इच्छाओं की अब आप कामना नहीं करते उनकी ओर अपनी पीठ फेर लीजिए|

शक्तिहीन होने का अभिनय मत कीजिए| ऐसा व्यवहार करने से आप अपनी चेतना को निचले स्तर पर ले जाते हैं|
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