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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: बुधवार, 11 अप्रैल 2012

समाचार – जानकारी या फिर एक लत?

Original Post : Overcoming News Addiction, Sept. 26th, 2006 by Steve Pavlina)    

करीब ३० दिन पहले, मैंने(स्टीव पव्लिना नें) फैंसला किया कि मैं ख़बरें देखना बंद कर दूंगा और इसके लिए मैंने अपने भरोसेमंद तरीके, ‘३० दिनों की परीक्षण विधी’ (लेख जल्द ही उपलब्ध होगा), का उपयोग किया| टीवी समाचार देखना और अखबार पढ़ना तो मैं पहले ही बंद कर चुका था, लेकिन फिर भी मुझे ‘Yahoo News’ और ‘CNN’ को, हर एक या दो दिन में, खंगालने की आदत थी, इसलिए मैनें यह निर्णय लिया कि मैं समाचार के सारे स्रोतों(sources) को छोड दूंगा और पूरी तरह से ख़बरों से मुक्त हो जाऊंगा| मैंने इस प्रयोग में जो कुछ भी सीखा वह मैं इस लेख के जरिए आप के साथ बाँट रहा हूँ| यह प्रयोग इतना अच्छा साबित हुआ कि मैंने इरादा कर लिया है कि अब मैं रोजाना ख़बरें जांचने की आदत से दूर ही रहूँगा|

ख़बरों से दूर रहने करने की प्रेरणा
यह तो मैं पहले ही से जानता था कि समाचार के लोकप्रिय स्रोतों का झुकाव, नकारात्मक ख़बरों (लेख जल्द ही उपलब्ध होगा) की ओर कितना अधिक होता है, लेकिन इस दोष के बावजूद, मैंने अंदाजा लगाया कि ख़बरों से पूरी तरह किनारा करने के बजाय कुछ ख़बरें देखना ज्यादा अच्छा है| कुछ गिनी-चुनी ख़बरें देखना मुझे दोनों बुरी आदतों(हर खबर देखना या फिर ख़बरें बिलकुल न देखना) में से कुछ कम बुरी आदत लगी| क्या वर्तमान में जो कुछ हो रहा है उसकी जानकारी रखना जरूरी नहीं है? अगर मैंने समाचार के सारे साधनों से नाता तोड़ लिया तो क्या मैं गुफा-मानव(caveman) नहीं बन जाऊंगा - मानव सभ्यता से एकदम अलग-थलग एक व्यक्ति?

वहीं दूसरी ओर, मैं सदा से लोगों से यही कहता रहता हूँ कि “आप कभी भी नहीं जान पाएँगे कि किसी धारणा(विचार, belief) के दूसरी तरफ क्या है जब तक कि आप खुद इसकी जांच नहीं कर लेते|” मैंने पता लगाया कि, यह जानने के लिए कि दुनिया-भर की खबरों से आजाद होकर जीना कैसा होगा?, ‘३० दिनों की परीक्षण विधी’ का प्रयोग करना उचित ही रहेगा| अब ऐसा तो नहीं होगा कि मेरे ख़बरें ना देखने से भूकंप ही आ जाएगा, और मैं उन ख़बरों को, इस अवधि(३० दिन) के बाद भी तो, आसानी से पढ़ सकता हूँ|

ख़बरों की लत जाहिर होती है
मैं यह जान कर दंग रह गया कि यह परीक्षण शुरू से ही कितना मुश्किल साबित हुआ| पहले दिन पूरे वक्त, मुझे ख़बरें जानने के लिए बड़ी बेचैनी महसूस होती रही| मैं जानना चाहता था कि दुनिया-जहान में क्या कुछ चल रहा है? जिन घटनाओं को लेकर मैं बड़ा उत्सुक था उन पर ताजा समाचार क्या है? हालांकि मैंने ख़बरों से दूर रहने के अपने वादे को तोड़े बिना, इसे पूरी तरह से निभाया, लेकिन ऐसा करने में मुझे बड़ी असुविधा हुई| मुझे अपने ‘इंटरनेट ब्राउजर’(internet explorer, firefox, etc) में से ख़बरों की वेबसाइटों के संपर्कों(bookmarks) को हटाना पड़ा ताकि मैं कहीं आदतन ही समाचारों को न पढ़ना शुरू कर दूं|

कुछ दिनों के बाद भी, मैं ख़बरें जानने के लिए बेचैनी महसूस करता रहा| यह लालसा(craving) की तरह महसूस होता था| यह बात मुझे जल्द ही समझ आ गई कि मेरा सामना किसी आदत से नहीं था – बल्कि मैं तो एक लत का मुकाबला कर रहा था| 
 
लत, आदत का ही एक गहन रूप होती है क्योंकि वह एक जरूरत को पूरा करती है| वह जरूरत, अक्सर ही महत्वपूर्ण होती है जिसे कि अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता, लेकिन जो चीज एक लत को नकारात्मक बना देती है वह है उसका विनाशकारी दुष्प्रभाव| मेरी ‘ख़बरें जानने की लत’, एक जरूरत को पूरा कर रही थी और वह जरूरत थी कि इससे मुझे जमीन से जुड़े रहने का एहसास होता था क्योंकि मुझे खबर रहती थी कि दुनिया-भर में क्या कुछ हो रहा है? लेकिन इसका नकारात्मक प्रभाव यह था कि यह मेरी विचारधारा को, और ज्यादा नकारात्मक और डर पर आधारित बनाने के लिए, ढाल रही थी|

नियंत्रण और बदलाव
किसी भी लत से छुटकारा पाने का बुनियादी उपाय है - नियंत्रण और बदलाव| सबसे पहले, लत पर अस्थायी नियंत्रण हासिल कीजिए, जैसेकि ३० दिनों के लिए इसे पूरी तरह से छोड दीजिए| और फिर, उस जरूरत को पहचानिए जिसे यह लत संतुष्ट करती है, और फिर उस जरूरत को उसी स्तर पर संतुष्ट करने का एक दूसरा रचनात्मक तरीका ढूंढिए|

जब मैंने अपने ३०-दिनों के ‘ख़बरों के उपवास’ की शुरुआत की थी, तो मुझे बिलकुल भी यह अंदाजा नहीं था कि मुझे एक लत का सामना करना होगा| मेरा यही ख्याल था कि यह एक ऐसी आदत है जिसकी जड़ें थोड़ी गहरी हैं, इसलिए मैंने इसे किसी दूसरी चीज से बदलने की कोई योजना नहीं बनाई थी| हालाँकि ३० दिन खत्म होते-होते, मैंने स्वाभाविक रूप से ही, इसे एक बेहतर आदत से बदल दिया| लेकिन इससे पहले कि मैं आपको इसके विषय में कुछ और बताऊँ, मैं आप के साथ कुछ ऐसी जानकारियाँ बांटना चाहता हूँ जो मुझे, इस ‘ख़बरों के उपवास’ के दौरान हासिल हुई|

ख़बरें पढ़ने पर फिर एक नजर डालें
कुछ हफ्ते ख़बरों के बिना गुजारने के बाद, मैं दुविधा से बाहर निकल आया और इस आदत को, बार-बार दोहराते रहने, की प्रबल इच्छा भी धीरे-धीरे कम होती चली गई| इस बिंदु पर पहुंचकर, मैंने इस आदत से थोड़ी दूरी बनाकर इसका अवलोकन(देखना, observe) करना शुरू किया, और मैनें इन बातों को महसूस किया :

  1. ख़बरें मुख्य रूप से नकारात्मक होती हैं : कौन सा शीर्षक(headline) आपका ध्यान खींचता है – “कल का दिन बहुत सुहावना रहा” या फिर “एक ही परिवार के चार सदस्यों की निर्मम ह्त्या”? आपको बाँधे रखने के लिए, यह जरूरी है कि समाचार ऐसा हो जोकि आपको चौंका दे और आपको विचलित कर दे| दूसरे शब्दों में यह आपको डराने वाला या फिर आपको चिंतित करने वाला होना चाहिए| डर, ख़बरें बेचने का एक मशहूर नुस्खा है|
  2. ख़बरें पढ़ने की लत : अगर आप रोजाना ख़बरें पढ़ने की लत के शिकार हैं, तो इसे ३० दिनों तक छोड़ने की कोशिश करके देखिए, और आप समझ जाएंगे मैं आखिर क्या कहना चाहता हूँ| यहाँ तक कि जब मैंने केवल समाचारों के शीर्षक पढ़ने की ही योजना बनाई होती थी, तो भी मैं उन सनसनीखेज समाचारों को पढ़ने से खुद को नहीं रोक पाता था, जिनसे मुझे असल में कोई फायदा नहीं होता था| 
  3. ख़बरों का दायरा बहुत ही संकरा(narrow) होता है : ख़बरें संपूर्ण होने का भ्रम पैदा करती हैं, लेकिन असल में उनका दायरा बेहद संकीर्ण(narrow) होता है| दुनिया-भर में ऐसी बहुत सी दिलचस्प घटनाएँ होती रहती हैं जो कभी भी ख़बरों का शीर्षक नहीं बन पातीं| ताजा ख़बरें पढ़ने की अपनी रोज की दिनचर्या निभाने के बाद, आपको लगता है कि अब आप जानते है कि दुनिया भर में क्या-कुछ हो रहा है| लेकिन दुनिया में तो ऐसे खरबों लोग हैं, जिनके बारे में आप कुछ भी नहीं जानते| और उनके बारे में, आपको कोई अंदाजा तक नहीं है|
  4. ख़बरें विज्ञापन का ही एक रूप हैं : इसके बारे में सोचिए; उसके बारे में मत सोचिए| इस बात से डरिए; उस बात की चिंता कीजिए| जी हाँ, हम सभी के सभी बस अब मरने ही वाले हैं| मेरे अंदर डर पैदा कीजिए, ताकि मैं बेहतर महसूस करने के लिए, आपके द्वारा ‘प्रायोजित उत्पाद’(sponsored product) खरीदने के लिए तैयार हो जाऊं| जब मैं अपनी नई कार चलाता हूँ तो मुझे ‘ग्लोबल वार्मिंग’, कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं नजर आती और अपने शरीर को दवाईयों का गोदाम बनाने से भी मुझे ऐतराज नहीं| मेरे मन को डर से पूरी तरह भर दीजिए; और फिर आप मुझे इसका ईलाज बेच सकते हैं|
  5. ख़बरें बड़ी ही सतही होती हैं : जटिल विषयों को काट-छांट कर सनसनीखेज टिप्पणियों और घिसे-पिटे ‘राजनीतिक रूप से सही’(politically correct) वाक्यों में बदल दिया जाता है| यहाँ तक कि “गहरी छान-बीन के बाद लिखी गई” ख़बरें भी अविश्वसनीय रूप से सतही होती हैं| तो ख़बरें पढ़ना छोडिये और किताबें पढ़ डालिए|
  6. ख़बरों पर भरोसा नहीं किया जा सकता : ख़बरों के पीछे के राजनीतिक और व्यावसायिक(corporate) सरोकारों(agendas) को देखना शुरू कीजिए, और आप उन्हें हर जगह पाएंगे|
  7. ख़बरें आपके विचारों को खांचे में ढालती हैं : आपको इस तरह से सोचना चाहिए ताकि आप एक आम आदमी के खांचे(condition) में ढल सकें |
  8. ख़बरें महत्वहीन(useless) होती हैं : सबसे महत्वपूर्ण समाचारों में, असल में महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं होता| आखिर आज की ख़बरों में से कितनी ख़बरें ऐसी हैं जोकि अगले साल तक आपको याद रहेंगी? आपको पिछले महीने की कितनी ख़बरें याद हैं? आपका मस्तिष्क ख़बरों को याद नहीं रखता क्योंकि वे बेकार की चीज होती हैं; जो काम वे वास्तव में करती हैं वह है, आपको डर के खांचे में ढालना|
  9. ख़बरें एक ही बात को बार-बार दोहराती हैं : ज्यादातर ख़बरें बातों को दोहराने वाली, गैरजरूरी जानकारियों से भरी, और एक ही बात को कई बार कहने वाली होती हैं| कुछ ख़बरें ही वास्तव में ताजा और जानकारी बढाने वाली होती हैं ताजी ख़बरों को, ‘बासी खाना’ कहना ज्यादा सही रहेगा|
  10. ख़बरें बेतुकी होती हैं : आखिर कितनी ख़बरें ऐसी हैं जोकि सीधे तौर पर आपसे जुडी होती हैं? शायद एक भी नहीं|
  11. ख़बरें निष्क्रियता बढाती हैं : अभी ऐसी कितनी ख़बरें हैं जिन पर आप इसी वक्त, कुछ काम कर सकते हैं? शायद एक से भी कम|
  12. ख़बरों को समस्याएं पसंद हैं : ख़बरों को समस्याओं से प्यार होता है| यह आपको उन सभी चीजों के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर विस्तार से बताती है जोकि गलत होती हैं| अब ज़रा सोचिए कि इनमें से कितनी समस्याओं को आप अब तक, वास्तव में हल कर चुके हैं और किन समस्याओं पर अभी काम कर रहे हैं? ख़बरें आपको समस्याओं के बारे में चिंता करने के लिए ढाल रही होती हैं न कि उन समस्याओं का समाधान करने के लिए| यह इसलिए है कि आपको पहले तो असाध्य(unsolvable) समस्याओं के बारे में चिंता करने और फिर उस चिंता से छुटकारा पाने के लिए ‘प्रायोजित उत्पाद’(products) खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है| थोड़े समय के लिए समाचार पढ़ना छोड कर देखिए, और आप स्वाभाविक तौर से, अपना अधिकतर समय, समस्याओं को हल करने में लगाने लगेंगे न कि उनकी चिंता करने में|
  13. ख़बरें पढ़ना समय की बर्बादी है : अब ज़रा इस पर गौर कीजिए कि ख़बरें पढ़ने/देखने में आपका जितना समय खर्च होता है, क्या आपको उससे उतना फायदा भी मिलता है? जब आप इसकी तुलना, दूसरी गतिविधियों में लगने वाले समय और उनसे होने वाले फायदे से, करके देखेंगे तो आप पाएंगे कि ख़बरें पढ़ने में आपका कितना समय यूँ ही व्यर्थ जा रहा है| हर रोज १० मिनट ख़बरें पढ़ना = हर साल ६१ घंटे| ५०-साल की अविधि के दौरान यह समय बहुत अधिक बैठता है| अगर आप रोजाना ३० मिनट ख़बरों पर खर्च करते हैं, तो इसका अर्थ हुआ कि आपने उन पर हर साल १८३ घंटे खर्च किए – या इसे कुछ यूँ कहें कि ‘आठ घंटों की शिफ्ट वाले २३ दिन’| यानि कि हर साल, आपके ‘आफिस में काम करने के वक्त का’ एक पूरा महीना| हे प्रभु! तो क्या पिछले साल, आपका ख़बरें पढ़ना वाकई में इतना जरूरी था? इसके बजाय, एक महीने की लंबी छुट्टी लेकर, घूमने जाने के बारे में आपका क्या ख़याल है?
जब मैंने थोड़ा पीछे हटकर, इस पर एक सरसरी नजर डाली, तो मैंने पाया कि ख़बरें मेरे लिए सिर्फ निरर्थक(worthless) ही नहीं थीं बल्कि वे तो उससे भी बदतर थीं| वे बेहद महत्वपूर्ण होने का ‘ललचाने वाला मनमोहक भ्रम’ पैदा करती हैं, लेकिन जब आप उन्हें गहराई से खंगालते हैं तो आपको जहरीली हवा के अलावा और कुछ भी हाथ नहीं लगता| बेशक मैं यह बात बड़े ही साधारण(generalisation) अंदाज में कह रहा हूँ, लेकिन मेरे अनुभवों ने मुझे यही सिखाया है कि अधिकतर मामलों में यह बात ही सही साबित होती है|

ख़बरों के बगैर मेरा काम कैसे चलेगा?
शायद अपने वर्तमान रूप में, ख़बरें मुख्य रूप से नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, लेकिन आखिर इसका विकल्प क्या है? क्या हमारे लिए वर्तमान घटनाओं के संपर्क में रहना जरूरी नहीं है? और तकनीकी(technology) और विज्ञान जैसे व्यावहारिक(प्रैक्टिकल) विषयों की ख़बरों के बारे में आपका क्या ख्याल है? यहाँ तक वह सामग्री भी जोकि पहली नजर में महत्वपूर्ण लगती है वास्तव में काम की नहीं होती..., जैसे कि :

कैंसर का एक नया क्रांतिकारी ईलाज? न तो मुझे कैंसर है, और न ही मेरे किसी जानने वाले को| अगर मुझे कैंसर होता और मेरा उपचार(ईलाज) चल रहा होता तो, मैं इस उपचार के बारे में किसी भरोसेमंद स्रोत(source) जैसेकि फैमिली डॉक्टर, से पता करना पसंद करता न कि किसी अखबार के माध्यम से| ख़बरों में ऐसे किसी उपचार का जिक्र बेहद सतही होता है और फिर ख़बरें, दवाईयाँ बेचने का एक माध्यम तो हैं ही|

एक नए ग्रह(planet) की खोज? मैं न तो कोई अंतरिक्ष यात्री हूँ और न ही कोई खगोल – विज्ञानी(astronomer), इसलिए हालांकि यह समाचार जानकारी बढाने वाला नजर आता है, लेकिन फिर भी यह एक ऐसी जानकारी है जोकि मेरे लिए बेकार है?| (अगर मैं नए ग्रह पर सस्ते दामों पर जमीन खरीद पाता तो मेरी रुची इस खबर में जरुर होती –सतीश) बेशक यह नासा(NASA) के लिए एक महत्वपूर्ण खबर है, लेकिन यह जरूरी तो नहीं कि नासा के लिए महत्वपूर्ण खबर, मेरे जीवन-उद्देश्य के लिए भी उतनी ही जरूरी हो| जब मुझे अपना खगोल(astronomy) ज्ञान बढाने की आवश्यकता महसूस होगी तो मैं इस विषय पर भौतिक-विज्ञानियों(astrophysicists) द्वारा लिखी गई किताबें पढ़ना पसंद करूँगा| रोजाना की ख़बरें तो खगोल के विषय में नर्सरी के स्तर की जानकारी देती हैं|      

एक नया इलेक्ट्रोनिक सामान? नया समान अच्छा होता है, लेकिन जब मेरे दोस्त उस उपकरण का इस्तेमाल करने लगेंगे, या फिर मुझे वह उपकरण अपनी आस-पास की दुकानों में नजर आने लगेगा तो मुझे उसका पता लग ही जाएगा| मुझे वह एक सामान जिसे मैं शायद एक दिन खरीदना चाहूँगा, उसे ढूंढने के लिए मुझे टनों-टन बेकार का सामान खंगालने की कोई जरूरत नहीं है| जब मुझे नए सामान की जरूरत पड़ेगी, तो मैं खुद ही थोड़ी मेहनत करके उसे आसानी से खोज लूँगा, और इस तरह मैं बेकार के सामान को खंगालने से बच जाऊंगा|

युद्ध की ताजा जानकारी? अलग-अलग तरह की लड़ाईयां लड़ने वाले योद्धा(combatants) न तो मेरे दुश्मन है और न ही मेरे दोस्त| और यह जानना कि किस पक्ष(तरफ) के लोगों ने दूसरे पक्ष के किन लोगों को किस खास तरीके से क़त्ल किया, मेरे लिए बेकार की जानकारी है| युद्ध एक जटिल विषय होता है, और ख़बरों का सतही दायरा, संघर्ष के पीछे की असली वजह को जाहिर करने में कोई मदद नहीं करता| वह जानकारी जो ख़बरों के माध्यम से हम तक पहुँच पाती है वह इतनी पक्षपातपूर्ण(biased) होती है कि किसी काम की नहीं होती|

एक बड़ी तबाही(disaster)? हर रोज इस ग्रह पर लगभग १,५०,००० लोग मृत्यु का शिकार होते हैं- यानि कि एक आम हफ्ते में लगभग १० लाख लोग| अब इसकी तुलना में एक ऐसा भूकंप जिसके कारण १,००० व्यक्ति आकाल मृत्यु का ग्रास बन गए, कहाँ ठहरता है? यह तो एक दिन में अपनी जानें गवानें वाले व्यक्तियों की कुल संख्या का १% भी नहीं है| एक ऐसी तबाही जिस पर मुझे वाकई में ध्यान देने की जरूरत होगी, उसका एहसास मुझे ख़बरों के बिना भी हो जाएगा| सन १९९१ में उत्तरकाशी में आए भूकंप के दौरान, जब मेरा घर जोर-जोर से हिलने लगा तो मुझे पता चल गया कि मामला कुछ तो गडबड है| ख़बरें भी उतनी ही हैरान थीं जितना कि मैं|

कुछ-एक ख़बरें ही असल में ऐसी होती हैं जिन्हें कि जरुर पढ़ा जाना चाहिए| बेशक यदा- कदा कुछ रोचक लेख नजर आते रहते हैं, लेकिन मुझे, ‘रोजाना ख़बरें छानने की आदत’ की कोई जरूरत महसूस नहीं होती है| बेहद जरूरी चीजें तो ख़बरों में लगभग नहीं के बराबर होती हैं| अगर वाकई में कोई जमीन हिला देने वाली घटना होती है तो यह बात मेरे पास किसी-न-किसी व्यक्ति के माध्यम से पहुँच ही जाएगी|

आदत बदलना
जैसा कि मैंने पहले जिक्र किया था कि मैंने स्वाभाविक रूप से ही, ‘खबरें पढ़ने की अपनी लत’ को, उसी जरूरत को पूरा करने वाली एक दूसरी आदत से बदल दिया| मेरे लिए तो प्रकृति(nature) के साथ कुछ वक्त गुजारना, वह नयी आदत साबित हुई| यह खोज  संयोगवश ही हुई – या शायद ‘तालमेल’ बनने के कारण|

मेरे ‘३० दिनों की परीक्षण विधी’ के प्रयोग के दौरान, मैं (स्टीव पव्लिना) अपनी श्रीमती जी के साथ छुट्टी मनाने सेडोना, अरिजोना(अमेरिका का एक शहर) गया था| सेडोना, उन सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक है, जहाँ पर मैं अब तक घूम चुका हूँ| मैं पैदल ही सैर पर निकल जाया करता था, अपने भारतीय-अमेरिकी गाईड के साथ मैं एक दौरे(tour) पर भी गया, मैंने ‘सेडोना ऊर्जा चक्रों’ के नाम से मशहूर चार स्थानों पर बैठकर ध्यान भी लगाया| यह यात्रा बड़ी ही शानदार साबित हुई, और जब यह खत्म होने को आई, तब भी मैं वहाँ से जाना ही नहीं चाहता था|     

इस यात्रा से यह तो जाहिर हो गया कि प्रकृति के साथ समय गुजारना, जमीन से जुड़े रहने का एक बहुत अच्छा तरीका है| मैं समाचारों के माध्यम से जमीन से जुड़े रहने की कोशिश कर रहा था, लेकिन प्रकृति के साथ समय बिताना, कहीं बेहतर तरीका साबित हुआ| इससे मैं कहीं अधिक गहरा और सहज-ज्ञान पर आधारित सम्बंध बना पाया, जोकि ख़बरों के ‘जो कुछ आप नहीं जानते, आपको ख़तरा उसी चीज से है’, तरीके से बहुत बेहतर साबित हुआ|

सेडोना, लॉस वेगास (Las Vegas) से करीब ३०० मील की दूरी पर है, लेकिन किस्मत से ‘लाल पत्थरों की घाटी’(Red Rock Canyon) मेरे घर से करीब २०-मिनट की दूरी पर है| जिस हफ्ते हम सेडोना से घर वापस आए, उसी हफ्ते मैं RRC में घूमने के लिए निकल गया| यह जगह सेडोना की तरह खूबसूरत तो नहीं थी, और यहाँ पर कोई ‘ऊर्जा चक्र’ भी नहीं थे, लेकिन यह एक प्रभावी आदत साबित हुई (जोकि ‘ख़बरें पढ़ने की लत’ की जगह ले सकती थी)|  

जब पिछली बार मैं सैर पर गया, और थोड़ा देर आराम करने के लिए एक चट्टान पर बैठा, तो मेरी नजर एक ऐसे पत्थर पर पड़ी जिसकी बनावट प्राकृतिक रूप से दिल के आकार की थी| यह वहाँ पर बिखरे बाकी पत्थरों की तरह ही नजर आ रहा था, लेकिन इसकी आकृति दिल के आकार से इतनी मिलती-जुलती थी कि मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि प्रकृति ने इसे तराशा है| मैंने इसे अपने पास एक निशानी के तौर पर रखने का फैंसला किया, और इसे अपने ऑफिस में रख दिया, जहां पर यह मुझे, प्रकृति के माध्यम से  दुनिया से जुड़े रहने के सम्बंध की याद दिलाता है|

ख़बरों की लत अब छूट चुकी है| दुनिया से ख़बरों के माध्यम से जुड़े रहने के बजाय, अब मैं दुनिया से चिरस्थायी प्रकृति के माध्यम से जुडा हुआ हूँ| जमीन से इस तरह से जुड़े रहने का एहसास बड़ी ही गहराई से महसूस होता है, और इस एहसास को उखाडना या फिर उसका फायदा उठाना इतना आसान नहीं है| किसी ऐसे प्राकृतिक नज़ारे के बीच में अकेले खड़े होना, जहाँ पर दूर-दूर तक मनुष्य द्वारा बनाई गई कोई भी संरचना(structure) नजर के दायरे में न हो, आपकी आत्मा को आनंद से भर देता है|

ख़बरों से मुक्त होकर जीना
ख़बरों से मुक्त होकर जीने का सबसे ख़तरा शायद यही है कि किसी दिन जब मैं अपनी दिनचर्या(routine) में इतना खोया हुआ हूँगा, कि मुझे इस बात का एहसास भी नहीं होगा कि मेरे सिवा सभी लोग पृथ्वी को छोड-कर किसी दूसरे ग्रह पर बसने की तैयारी कर रहे होंगे| क्योंकि मुझे ख़बरें पढ़े हुए ही महीनों बीत चुके होंगे, और मैं पृथ्वी पर बिलकुल अकेला रह जाऊंगा... केवल मैं और मेरा ‘दिल के आकार का पत्थर’|

तो सभी लोगों के अचानक पृथ्वी छोड कर जाने की सूरत में, मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप मुझे जल्दी से एक ई-मेल भेज दें ताकि मुझे पता चल सके| और एक बार वह ख़तरा टल जाए, तो फिर मैं, इस पृथ्वी पर अपने बाकी के दिन, ख़बरों से मुक्त होकर मजे से गुजार सकता हूँ|
  
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2 टिप्‍पणियां:

  1. सतीश जी,अनुवाद बहुत अच्छा बना है मै इसे एक सांस मे पढ गया. मै स्टीव की बात से पूरी तरह सहमत हू ..क्योंकी इस बारे मे उनकी सोच मेरे सोच से पूरी तरह से मिलती है स्टीव की ही तरह मेंए भी अपने को tv addiction से आजाद किया है. अगर आपकी इजाजत होतो मे भी अपने अनुभव को अपने ब्लाग पर लिखना चाहूगा

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  2. लेख पसंद करने के लिए आपका बहुत शुक्रिया| इजाजत की कोई जरूरत ही नहीं, आप जरुर इस विषय पर अपने अनुभव लिखिए| क्योंकि इस विषय पर जितने ज्यादा लेख उपलब्द्ध होंगे, उतने ही अधिक लोगों तक यह विचार पहुंचेगा, और यही तो इस ब्लॉग को बनाने का मेरा उद्देश्य है:)|

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