Google Custom Search


Custom Search

आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: शुक्रवार, 1 जून 2012

खुद पर शक करना घातक होता है

(Original Post : Skepticism May Be Harmful or Fatal if Swallowed, November 23rd, 2005 by Steve Pavlina)    

संदेह करने का अर्थ है शक और अविश्वास को बुनियाद बनाकर वास्तविकता को समझने की कोशिश करना ताकि आप एक समझदार इंसान की तरह बर्ताव कर सकें| बुनियादी रूप से संदेह का जन्म, 'किसी बात को आँख मूँद कर मान लेने' के विरोध में हुआ| संदेह करने के पीछे का मुख्य कारण, मूर्खतापूर्ण बातों को स्वीकार करने से खुद को बचाना होता है|

यहाँ तक तो सब ठीक हैं, लेकिन आजकल संदेह करने का प्रयोग, धर्म और अध्यात्मिक(spiritual) मामलों से भी बहुत आगे होने लगा है| अगर संदेह आपको धार्मिक कट्टरता से बचा सकता है तो शायद यह दूसरे मामलों में भी आपकी मदद कर सकता है| और कुछ हद तक यह मदद करता भी है| उदाहरण के तौर पर, संदेह करने से आप, अपने बिजनेस में धोखा खाने से बच सकते हैं|

लेकिन संदेह तब नुकसानदेह साबित हो जाता है जब आप इसे निगल जाते हैं| अगर आप इसे निगल जाए तो आप इसका रुख अपनी ओर कर देते हैं| आप, शक ओर अविश्वास को औज़ार बनाकर खुद को समझने की कोशिश करने लगते हैं| मैं किस काबिल हूँ? क्या मैं वाकई ऐसा कर सकता हूँ? अगर मैं ऐसा करने की कोशिश करूँ तो क्या मैं मुर्ख लगने लगूंगा? 

बड़ी गलती|

बहुत से लोग, इस बात को लेकर कि वे कहीं कोई मूर्खता न कर बैठें, इतने अधिक सतर्क रहते हैं कि वे संदेह के औज़ार(tool) को यह सोच कर निगल जाते हैं, कि इससे उनके व्यवहार में समझदारी आएगी और उनकी कोशिशें सफल होंगी| बदकिस्मती से इस माहौल में संदेह का उलटा ही असर होता है| संदेह को निगल लेना, आपके बौद्धिक संसाधनों(intellectual resources) की छंटाई कर देता है और यह वास्तव में आपको कम समझदार बना देता है|

इस लेख में आगे, मैं जब भी 'संदेह' या 'संदेही व्यक्ति" का जिक्र करूँगा तो मेरा इशारा ऐसी ही किसी व्यक्ति की ओर होगा जिसने इस औज़ार को निगल लिया है और इसका प्रयोग खुद को समझने के लिए कर रहा है|

संदेह हानिकारक होता है
संदेही व्यक्ति इस गलतफहमी का शिकार होते हैं कि विचार केवल निष्क्रिय अवलोकन(passive observations) होती हैं और इसलिए खुद पर संदेह करने के विचार का नतीजा सकारात्मक ही निकलेगा - वे भूल जाते हैं कि विचार हमारी वास्तविकता की रचना भी करते हैं, इसलिए संदेह करना वास्तव में नकारात्मक विचारों को ही मजबूत बनाता है| डर और शक के विचारों को पनाह(शरण, harbor) देना, डर और शक की जड़ें मजबूत करता है| सफलता के विचारों को शरण देना, सफलता की रचना करता है| एक संदेही व्यक्ति इसे नहीं समझता पाता, लेकिन एक समझदार ब्यक्ति इसे जानता है|

संदेही व्यक्ति इतने समझदार तो होते ही हैं कि वे, 20 रूपये कमाने के लिए 10 रुपयों को दावं पर लगाने का जोखिम उठाने से बचते हैं अगर सफलता की गुंजाईश केवल 20% ही हो| यह समझदारी ही है| हालांकि वे 1000 रूपये कमाने के लिए 10 रुपयों को दावं पर लगाने का जोखिम भी नहीं उठाते, अगर सफलता की गुंजाइश फिर से २०% ही हो| यह तो कोरी मूर्खता ही होगी, खासकर कि तब जबकि आप इस दांव को बार-बार लगा सकें और अपनी कमाई को फिर से निवेशित(invest) कर सकें| इससे भी आगे बढकर, संदेही व्यक्ति इसे नहीं समझ पाते कि यह उनका खुद का डर और अविश्वास ही है जोकि सफलता की गुंजाइश को केवल 20% तक समेट देता है, वे इस सच्चाई से बिलकुल बेखबर होते हैं कि खुद पर भरोसा करना, सफलता की गुंजाइश को 40% या इससे भी अधिक बढ़ा देगा|

संदेही व्यक्ति, अनाड़ी व्यक्तियों की तरह नुकसान नहीं उठाना चाहते, लेकिन ऐसे करने से, उनका व्यवहार और भी ज्यादा मूर्खतापूर्ण(foolish) हो जाता है क्योंकि वे बहुत अधिक अवसरों को गवां बैठते हैं| अंततः उन्ही लोगों का आगे निकलना, जिन्हें कि वे हमेशा से मुर्ख समझते थे, उनका दिल तोड़ देता है| और यह संदेही व्यक्ति को 'डर और (खुद पर) अविश्वास' के चक्र में और भी गहरे उलझा देता है और इसका अंत अकेलेपन के रूप में होता है|

एक संदेही व्यक्ति दूसरे लोगों को असफल होते हुए देखता है और खुद से कहता है, "खुदा का शुक्र है कि मैंने ऐसा नहीं किया|" लेकिन वह, उन मौकों को भी देखता है जहाँ पर वह सफल हो सकता था और कहता है कि, "बड़े शर्म की बात है कि मैंने ऐसा नहीं किया|" 

संदेह से आगे जहाँ और भी है
फिर, एक समझदार व्यक्ति आखिर कैसे सोचता है?
एक समझदार व्यक्ति जानता है कि सफलता का एक हिस्सा ऐसा होता है जिसकी रचना हम, खुद ही करते है| समझदार व्यक्ति यह संकल्प लेता है कि वह इस रचनात्मक शक्ति का गलत इस्तेमाल, 'डर और अविश्वास' की रचना करने में नहीं करेगा| ऐसा करने में कोई समझदार नहीं होगी|

संदेह करना कुछ ऐसे ही है जैसे कि आप इस डर से कि कहीं आपकी कार के टायर पंक्चर न हो जाएँ, उन्हें पहले ही एक चाक़ू से पंक्चर कर दें| फिर आप पाएंगे कि चूँकि अब टायर पंक्चर हो चुके हैं तो खराब कार चलाने से बेहतर तो यही रहेगा कि घर पर ही रहा जाए|

समझदार लोग इस बात को समझते हैं कि डर और शक, उन्हें केवल अपाहिज बनाते हैं, और कभी उनकी मदद नहीं करते| नुकसान से बचने के लिए, डर और शक की जरूरत नहीं होती| यह इस काम के लिए सही औजार नहीं हैं, ठीक वैसे ही जैसे कि एक चाक़ू, टायरों में हवा भरने के लिए गलत औजार होता है| अगर आप अपनी कार को चलाना चाहते हैं तो आपको हवा से भरे हुए टायरों की जरूरत होगी| अगर एक टायर पंक्चर हो जाए तो इससे दुनिया थोड़े ही न खत्म हो जाएगी| बस टायर बदलिए और आगे बढ़ जाइए| एक संदेही व्यक्ति समझने लगता है कि एक टायर पंक्चर होने का मतलब है दुनिया का अंत, और इसलिए कार चलना एक ऐसी चीज है जिससे हमेशा दूर ही रहना चाहिए| इसलिए संदेही व्यक्ति घर पर रहकर सुरक्षित और आरामदेह महसूस करता है जबकि बुद्धिमान व्यक्ति जोखिम को, मौके का फायदा उठाने का एक जरिया(way), समझता है और इसे गले से लगा लेता है|

हिम्मत और सहज-ज्ञान ही समझदार लोगों के औजार होते हैं| क्या संभव है और क्या नहीं, वे इसकी जानकारी, खुद सीधे तौर पर काम करके हासिल कर लेते हैं| अक्सर वे असफल हो जाते है जिससे उन्हें अपने बारे में नई जानकारी हासिल होती है, जिसके कारण वे भविष्य में समझदारी से अपने निर्णय ले पाते हैं...और उनके निर्णयों के पीछे, डर या अविश्वास नहीं बल्कि समझदारी काम कर रही होती है| एक बुद्धिमान व्यक्ति समझता है कि विचारों में 'वास्तविकता की रचना करने की' शक्ति भी होती है, इसलिए, काम करते वक्त, उन विचारों को एक सीध में करना जरूरी होता है ताकि वे सफलता की रचना करें बजाए डर और शक की रचना करने के|

एक समझदार व्यक्ति संदेह का इस्तेमाल खुद इसके ही खिलाफ करता है, संदेह का औज़ार, संदेह के ही खिलाफ| दूसरे शब्दों में वे अपने शक पर ही शक करते हैं| उन्हें अपने संदेह पर संदेह होता है| और जबकि उनके संदेह, डर और शक, एक चक्र में फंसे हुए होते हैं, वे आपका काम करते रहते हैं और क्या संभव है और क्या नही, इसका पता वे सीधे काम करके और सहज-ज्ञान से लगा लेते हैं|

संदेही व्यक्ति सोचता है कि जोखिम उठाने और असफल होने पर वह बर्बाद हो जाएगा| समझदार व्यक्ति जानता है कि यह केवल, सफलता के रास्ते पर चलने के दौरान उठाया जाने वाला, एक जरूरी कदम है| संदेही व्यक्ति असफलता को एक ऐसी दीवार की तरह मानता है जिसके पार कभी भी नहीं जाना चाहिए जबकि समझदार व्यक्ति असफलता को एक ऐसे पायदान(steps of stair) की तरह मानता है जिस पर पैर रखकर ही आप आगे कदम बढ़ा सकते है|

संदेही व्यक्ति प्रयासों(efforts/ endeavors) को सिर्फ सफलता और असफलता के तराजू में तोलता है, जैसेकि वो तराजू के दो विपरीत पलड़े हों| समझदार व्यक्ति जानता है कि अगर सफलता मंजिल है तो असफलता वह रास्ता है जिस पर चलकर उस मंजिल को पाया जा सकता है, और वे दोनों एक ही दिशा में मिलते हैं, कायरता से एकदम विपरीत दिशा में|

संदेही व्यक्ति सफलता से दूर रहते है क्योंकि वे असफल नहीं होना चाहते, लेकिन ऐसा करके वे अपनी हार सुनिश्चत(confirm) कर देते हैं क्योंकि वे काम करने के लिए जरूरी हिम्मत जुटाने में असफल रहते हैं| उनके मुकाबले, समझदार लोग कहीं अधिक सफल रहते हैं क्योंकि वे अपनी 'हिम्मत का विकास' करके डर के बावजूद अपना काम करते रहते हैं|

संदेही व्यक्ति कहता है, "चलिए देखते हैं कि यह काम करता है या नहीं?" समझदार व्यक्ति कहता है कि "चलिए इस काम को करके देखते हैं|"

संदेह, धार्मिक कट्टरपन से छुटकारा पाने और एक स्वस्थ मानसिकता के विकास के लिए, एक उपयोगी औजार है, लेकिन उसके बाद, इसे छोडकर किसी दूसरे बेहतर औजार को अपनाना ही ठीक रहेगा| संदेह को, बीमार विचारधारा को काटने वाले एक चाक़ू की तरह ही इस्तेमाल कीजिए, लेकिन जब चाक़ू आपकी खुद की उंगलियों तक पहुँच जाए तो इसे नीचे रख दीजिए - और यही वह वक्त होता है जबकि आपको संदेह को छोडकर, हिम्मत के औजार को इस्तेमाल करना शुरू कर देना चाहिए|
[यह article आपको कैसा लगा, कृपया comments के जरिए इस पर अपनी राय जाहिर करें, अगर आपके पास इस article से जुडी कोई जानकारी या सुझाव हो तो आप उसे 3kbiblog@gmail.com पर भेज कर हमारे साथ share कर सकते हैं | ]

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

इस लेख पर अपनी राय जाहिर करने के लिए आपका धन्यवाद|