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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: सोमवार, 2 जुलाई 2012

२० मिनट में कैसे आप अच्छा महसूस कर सकते हैं?

(Original Post : Feeling Blessed, June 9th, 2008 by Steve Pavlina)  

'जैसा आप नहीं चाहते' उसके बारे में लगातार सोचते रहने के चक्रव्यूह में फंसना बड़ा आसान है| और इसमें वह सभी कुछ शामिल है जोकि आपके जीवन में  इस वक्त मौजूद है लेकिन जिसे आप पसंद नहीं करते हैं| अगर आप बार-बार उन्हीं अनचाही चीजों के बारे में सोचते रहे तो यह एक शर्तिया(bet, शर्त लगाना) बात है कि आप, अपने जीवन में बहुत सी उलझनें पैदा करने लगेंगे|

अनचाही चीजों के बारे में सोचना वास्तव में एक जाल(trap) होता है| ऐसे विचार आपको बड़े लंबे वक्त के लिए उलझा कर रख सकते हैं| और फिर आप अपने कीमती जीवन के कुछ साल या फिर कई दशक(decades) नीचे दिए गए इस, दुष्चक्र में गवां सकते हैं :

  1. आप अपने आस-पास देखते है और आपको जो कुछ महसूस होता है उस पर ध्यान देते हैं|
  2. आप पाते हैं कि आप अपने जीवन के कुछ पहलुओं को पसंद नहीं करते|
  3. आपके मन में, डर, चिंता, निराशा, और अन्य नकारात्मक भावनाएं जन्म लेने लगती हैं|
  4. आप सोचने लगते हैं कि नापसंद चीजों को बदलने के लिए आपको क्या-क्या करना होगा|
  5. आप पाते हैं कि बदलाव करने के लिए बहुत अधिक वक्त और प्रयास की जरूरत पड़ेगी - और फिर सफलता की कोई गारंटी भी तो नहीं है| और यह भी  तो हो सकता है कि आप हालात को और भी ज्यादा बिगाड़ बैठें|
  6. हताशा, हालात की मजबूरी और डिप्रेशन की भावनाओं से आपका मन भारी हो जाता है|
  7. आप कुछ ऐसा करने लगते हैं जिससे कि आपको बेहतर महसूस होता है| जैसे कि टीवी देखना, खाना खाना, शराब के दो पैग लगाना, इंटरनेट पर समय  गुजारना, ई-मेल देखना आदि-आदि|
  8. आप, अपना ध्यान भटकाने/नशे में डूबने के कारण कुछ हल्का महसूस करने लगते हैं|
  9. कुछ समय गुजरने के बाद, आखिरकार आप, इस चक्र को फिर से पहले चरण से दोहराना शुरू कर देते हैं|
क्या आपने इस चक्र को या फिर ऐसे ही किसी चक्र को दोहराया है?
हालाँकि ऊपर बताए गए चक्र के कई प्रकार हैं फिर भी अगर आप, अपने वर्तमान जीवन में ऐसे ही किसी चक्र में फंसे हुए हैं तो आपको इसका पता चल ही  जाएगा|

आप कब इस तरह के चक्र को दोहराते हैं? अपने संबंधों के साथ? अपनी नौकरी/कैरियर के साथ? अपनी आर्थिक-स्थिति(financial position) के साथ? जीवन  में अपनी स्थिति के साथ? अपने शरीर के साथ?

आप इस चक्र को अपनी आर्थिक-स्थिति के साथ कैसे दोहरा सकते हैं, आइये इसे एक उदाहरण से समझते हैं :
  1. आपका ध्यान किसी ऐसी चीज पर जाता है जो, आपकी आर्थिक-स्थिति के बारे में, आपके मन में नकारात्मक विचार जगा देती हैं| यह कुछ भी हो सकता  है, एक 'बैंक खाते का विवरण'(bank statement), धन के बारे में एक लेख, आपकी जेब की खस्ता हालत, या फिर पट्रोल की बढ़ती कीमतें| उकसाने वाली  चीज, भीतरी भी हो सकती है, जैसेकि आपके आर्थिक हालात के बारे में एक बेतरतीब(random) विचार|
  2. आप पाते हैं कि आपके आर्थिक हालात वैसे नहीं हैं जैसा कि आप उन्हें देखना चाहते थे| आपके पास नकदी नहीं है, आपकी आय बेहद कम है, आपके खर्चे  बेहद ज्यादा हैं या फिर आप कर्जे में गहरे डूबे हुए हैं| या फिर ऊपरी सभी बातें|
  3. आप, अपनी आर्थिक-स्थिति के बारे में चिंता करने लगते हैं| आप परेशान हो जाते हैं कि आखिर हालात सुधर क्यों नहीं रहे| आप चिंता करने लगते हैं कि  कहीं आपकी स्थिति बद-से-बदतर तो नहीं हो जाएगी|
  4. आप विचार करने लगते हैं कि आपको ज्यादा पैसा कमाने, अपना कर्जा उतारने और अपने खर्चे कम करने के लिए क्या-क्या करना होगा|
  5. आप पाते हैं कि इसमें तो काफी कड़ी मेहनत और कुछ अनचाहे बदलावों की जरूरत होगी ताकि आपके आर्थिक-हालात सुधर सकें, और ऐसा करने पर भी  हो सकता है कि सफलता हाथ ही न लगे|
  6. आप निराश, तनावग्रस्त और अभिभूत(overwhelmed) हो जाते हैं| और निष्कर्ष(conclude) निकालते हैं कि अभी इसी वक्त, इतना-कुछ संभाला नहीं जा  सकता|
  7. अच्छा महसूस करने के लिए आप, कुछ घंटे इंटरनेट पर सर्फिंग करते हुए गुजार देते हैं| एक फिल्म देखने लगते हैं| कुछ ऐसा मसालेदार खाना खाने लगते  हैं जिससे आपको बेहतर महसूस होता है, चाहे वह खाना सेहत के लिहाज से इतना अच्छा न हो|
  8. अपनी समस्याओं से आपको, कुछ देर के लिए ही सही, छुटकारा मिल जाता है|
  9. आप सोने चले जाते हैं, अगली सुबह उठते हैं, और फिर से इसी घटनाक्रम को दोहराने लगते हैं|

इस चक्र का बुनियादी स्वरूप कुछ ऐसा होता है :

जैसा आप नहीं चाहते उसके बारे में सोचना > बुरा महसूस करना > खुद को आराम का एहसास कराना

यह चक्र बेहद सामान्य सा लगता है| और इसकी लत भी बेहद आसानी से लग जाती है| लेकिन इस तरीके को अपनाने में समझदारी नहीं होती|

आखिर इस तरीके को अपनाने में समझदारी क्यों नहीं है, क्योंकि यह तरीका समस्या को जड़ से नहीं खत्म करता| आप केवल लक्षणों(symptoms) का ही  ईलाज कर रहे होते हैं| आप नकारात्मक भावनाओं का सामना, खुद को आराम देकर कर रहे होते हैं, लेकिन समस्या तो वहीं की वहीं रहती है| और इससे यह  तय हो जाता है कि आपकी नकारात्मक भावनाएं, जब-तब आपके सामने आकर, आपको परेशान करती ही रहेंगी|

जब कभी भी आपको यह पता चले कि आप खुद को आराम देकर, समस्याओं और उनके कारण उपजी(rise to) नकारात्मक भावनाओं का सामना कर रहे हैं,  तो यह समझ जाइए कि ऐसा करके आप यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि नकारात्मक भावनाएं आपको आगे भी परेशान करना जारी रखें|
एक बार आप इस चक्र में कुछ समय के लिए फंस गए तो फिर इससे निकालना काफी मुश्किल हो जाता है| आप फिर शायद इस चक्र को, आने वाले कई  सालों में हर रोज, बार-बार दोहराते रहेंगे|

चक्र को कैसे तोडा जाए?
तो फिर हम इस विनाशकारी श्रंखला(destructive chain) को कैसे तोड़ सकते हैं?

खुद को 'अनचाही चीजों' के बारे में सोचते हुए पकड़ना और फिर सचेत होकर अपने विचारों को किसी सकारात्मक चीज पर केंद्रित करना, थोडा मुश्किल तो है| लेकिन असंभव नहीं)| हालांकि आमतौर पर यह तरीका काम नहीं कर पाता| जब आप नकारात्मक विचारों के चक्र में फंसे हुए हों तो सकारात्मक विचारों को  चुनना मुश्किल होता है|

इस चक्र को तोडना तब और भी कठिन हो जाता है जबकि आप पहले ही से अच्छा महसूस नहीं कर रहे होते हैं| एक बार उस बिंदु पर पहुँचने पर आपको सुकून महसूस करने की एक 'तीव्र इच्छा'(overwhelming desire) महसूस होने लगती है, और आप खुद को और कुछ करने के लिए प्ररित नहीं कर पाते|
 
ऐसा लगता है कि इस चक्र को तोड़ने का सबसे अच्छा वक्त तभी होता है जब आप सुकून का एहसास कर चुके होते हैं| अब आप थोड़े समय के लिए, राहत  महसूस कर रहे होते हैं| आप कहीं ज्यादा शांत और पहले की तरह चिंतित भी नहीं होते| आपकी सजगता(consciousness) का स्तर भी थोड़ा बढ़ जाता है|  हो सकता है कि आप थोड़े थके हुए हों लेकिन फिर भी अब आप, कुछ अलग करने के लिए, खुद को थोड़ा सा प्रेरित तो कर ही सकते हैं|

तो क्या बदलाव की शुरुआत करने का यही सही वक्त होता है? नहीं, अभी नहीं| अगर आप इस बिंदु पर काम करके समस्याओं को सुलझाने की कोशिश करेंगे तो आप शायद चक्र को फिर से दोहराने लगेंगे| आप इस बात पर ध्यान देनें लगेंगे कि आपकी स्थिति कितनी खराब है और उसे ठीक करने के लिए  आपको कितना ज्यादा काम करना पडेगा, और आप फिर से निराशा महसूस करने लगेंगे| समस्याओं से निपटने का यह तरीका आपको इस चक्र में उलझाए रखेगा| हालाँकि कुछ मामलों में यह काम भी कर सकता है लेकिन आमतौर पर इसके लिए बेहद कड़े आत्म-अनुशासन की जरूरत पड़ती है, और इसी वजह से आपके सफल होने की गुंजाइश काफी कम होती है|

एक बेहतर तरीका यह है कि आप अपनी सुकून की भावनाओं को बुनियाद बनाकर उन्हें उत्साह की भावनाओं में बदल दीजिए| इसे कैसे करना है, मैं इसके बारे में आपको विस्तार से बताऊँगा|

जैसा आप चाहते हैं उसके बारे में तब-तक सोचिए जब-तक कि आप उत्साहित नहीं हो जाते|

एक बार आप सुकून और आराम का एहसास कर रहें हों, फिर चाहे इस बिंदु पर पहुँचने के लिए, आपको खाने, शराब या फिर बे-सिर-पैर(mindless) के  मनोरंजन का सहारा ही क्यों न लेना पडे, अब आप एक कहीं बेहतर स्थिति में होते हैं और "आप जैसा चाहते हैं" उसके बारे में सोचना शुरू कर सकते हैं बजाए "जैसा आप नहीं चाहते" उसके बारे में सोचते रहने के|

अभी समस्या पर काम करने की फ़िक्र मत कीजिए| उसका वक्त बाद में आएगा| अभी केवल 'जैसा आप चाहते हैं" उसके बारे में सोचना शुरू कीजिए| गहराई  से इसके बारे में सोचिए| इसमें पूरी तरह से डूब जाईए| कल्पना कीजिए कि आपके हिसाब से चीजें कैसी होनी चाहिएं| कल्पना कीजिए कि आपकी जिंदगी में  सब कुछ बहुत बढ़िया चल रहा है|

व्यवहारिकता(practicality) की चिंता मत कीजिए| केवल ख्याली महल बनाईए| लेकिन अपने ख्यालों को एक निश्चित दिशा से भटकने मत दीजिए| अपनी पसंदीदा कुर्सी पर बैठिए और कल्पना कीजिए कि आप जैसा चाहते थे वह अब हकीकत में आपके सामने आ चुका है| जागती आखों से सपना देखिए कि यह सब-कुछ वाकई में हो रहा है|

इसे ठीक से करने का एक तरीका यह है कि आप हर रात सोने से पहले, इस गतिविधि के लिए, २०-मिनट का समय सुरक्षित(set aside) रखिए| इस दौरान  सोने से बचने के लिए इसे बैठकर ही कीजिए| अपनी आखें बंद कर लीजिए या फिर शून्य में अपनी नजरें जमा लीजिए, और सोचिए कि आप अपने जीवन के  हरेक हिस्से में क्या हासिल करना चाहते हैं| आप जैसा मर्जी चाहे वैसा सोच सकते हैं बशर्ते ऐसा करके आपको अच्छा महसूस हो|

अपने शरीर की आदर्श स्थिति(ideal state) के बारे में कल्पना कीजिए| अपने आदर्श संबंधों के बारे में सोचिए| अपने आदर्श कैरियर के बारे में अपने मन में  एक छवि बनाइए| कल्पना कीजिए कि आपकी आर्थिक स्थिति बिलकुल वैसी ही है जैसी कि आप चाहते हैं| आप कहाँ और कैसे अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं  इसकी कल्पना कीजिए| निश्चित दिशा में सोचिए और इस तस्वीर को आप जितना स्पष्ट बना सकते हैं बना लीजिए| तस्वीर को संपूर्ण बनाने की चिंता मत  कीजिए - केवल उन चीजों को इसमें जोड़िए जोकि आपको रोचक लगती हैं|

इस बात को सुनिश्चित कीजिए कि ये सभी कल्पनाएँ एक-दूसरे से पूरी तरह जुडी हुई हों| दूसरे शब्दों में आप कल्पना करते हैं कि हर द्रश्य(scene) आप,  अपनी नजरों से देख रहे हैं| आमतौर पर आपको द्रश्य को 'किसी दूसरे व्यक्ति की नजरों से' देखने से बचना चाहिए, हालाँकि अगर आप चाहें तो, चीजों को  किसी दूसरे दृष्टिकोण(angle) से देखने की कोशिश कर सकते हैं| खुद किसी द्रश्य को देखने की कल्पना करने से कहीं ज्यादा बलशाली(stronger) भावानाएं  जन्म लेती हैं|

आपको (अपनी कल्पना में) किसी भी चीज को स्वीकार करने या सही ठहराने की कोई जरूरत नहीं है| लेकिन यह बेहद जरूरी है कि आप भावनाओं को  महसूस करें| अगर आपको कुछ भी महसूस नहीं होता तो फिर आप अभी उस स्थिति तक नहीं पहुंचे हैं| आप वाकई कैसा महसूस करेंगे अगर आपके सारे  सपने अभी इसी वक्त साकार हो रहे हों? अगर आपको, अपने उन सपनों को वर्तमान में साकार होते हुए देखकर, कुछ भी महसूस नहीं होता, तो यह कहना  गलत नहीं होगा कि आप, उन सपनों की कोई जरुरत नहीं है|

अपने सपनों को किसी 'भावी भविष्य'(distant future) में साकार होता हुए मत देखिए| कल्पना कीजिए कि जो कुछ भी आप चाहते हैं वह अभी, इसी वक्त हो  रहा है| कल्पना कीजिए कि यह 100% वास्तविक है|

अगर आपको अपने जीवन के किसी छोटे से हिस्से की, 'बेहतर होती हुई स्पष्ट तस्वीर' बनाने में ही १० मिनट का वक्त लग जाता है, तो क्या हुआ| समय  लगाइए| जान-बूझकर, जैसा आप चाहते हैं उस पर विचार करना एक बहुत ही महत्वपूर्ण गतिविधि होती है| यकीन मानिए, कि इस तरह की कल्पना करना आपके समय का एक बेहतरीन इस्तेमाल है|

अगर आप जैसा चाहते हैं उसके बारे में सोचते हैं, और इसके वास्तविक होने की कल्पना करते हैं, लेकिन आपको ऐसा करने पर कोई भावनात्मक  लहर(surge) नहीं महसूस होती, तो फिर इसे थोड़ी देर के लिए छोड दीजिए, और किसी और चीज की कल्पना कीजिए| कुछ बड़ा सोचिए| दुस्साहसी(bolder, बिंदास) बनकर सोचिए| कुछ उत्तेजक सोचिए| दूसरे लोगों को भी इसमें शामिल कर लीजिए| आप चाहे तो पूरी दुनिया को इसमें शामिल कर सकते हैं अगर  इससे आपको भावनात्मक सनसनी का एहसास हो| यह आपकी खुद की कल्पना है| आपको 'खुशी का एहसास देने वाले' विचारों को चुनने के लिए किसी दूसरे  व्यक्ति से इजाजत लेने की कोई जरूरत नहीं है|

अपना ज्यादा समय उन विचारों को सोचने में मत लगाइए जिनसे आपको सुकून और आराम का एहसास होता है| जो विचार आपको उत्साहित करता है उसके  बारे में सोचिए| उस दृश्यों(scenes) की कल्पना कीजिए जोकि आपको जोशो-खरोश से भर दें| अगर आपको उत्साहित होना कठिन लगता है तो फिर  अलग-अलग चीजों की कल्पना करते रहिए| यहाँ पर समय का कोई बंधन नहीं होता|

जब आप सेक्स के बारे में कल्पना करते हैं तो ध्यान दीजिए कि इससे आपका शरीर कैसे प्रभावित होता है| जब आप जैसा चाहते हैं उसके बारे में सोचतें हैं  तो आपकी शारीरिक प्रतिक्रिया कुछ-कुछ ऐसी ही (जबरदस्त) होनी चाहिए| अगर आपका शरीर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है तो फिर द्रश्य की कल्पना करना छोड दीजिए, और फिर कुछ और सोचिए| अपनी कल्पना को खंगालिए और इसका पता लगाइए कि आप वास्तव में क्या चाहते हैं| हो सकता है कि आपको  कोई चौकाने वाली बात पता चले|

फिर से, व्यावहारिकता(practicality) की परवाह मत कीजिए| इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिन अच्छी चीजों की कल्पना आप कर रहे हैं वह आपके पास वास्तव में हैं भी या नहीं| अगर आप चाहें तो आप खुद के पास महाशक्तियां होनें की कल्पना कर सकते हैं, अब जबकि आप वर्तमान में अभी इसी वक्त वहाँ होने की कल्पना कर रहे हैं, तो भावनाओं को गहराई से महसूस कीजिए|

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपको अच्छा, बेहद अच्छा महसूस हो, और इस स्थिति तक पंहुचना तब काफी आसान हो जाता है जब आप अपना  कुछ वक्त जैसा आप चाहते हैं उसके बारे में गहराई से सोचते हुए बिताते हैं और इसके वास्तविक होने की कल्पना करते हैं|

इस अभ्यास में हर रोज कम-से-कम 20 मिनट का समय लगाईए और ऐसा एक हफ्ते तक कीजिए| इसका मतलब पूरे सात दिन, न कि केवल पांच दिन| अगर आपका अभ्यास बीच में छूट जाता है तो फिर से पहले दिन से शुरुआत कीजिए|

जब मैंने(स्टीव पव्लीना नें) इसका अभ्यास 20 मिनटों तक लगातार करना शुरू किया, तो मेरे लिए खुद को रोकना मुश्किल होता था| आम-तौर से मैं एक बार  में इस पर 45 मिनट का समय लगाता था| शुरुआत में जब मैंने ऐसा करना शुरू किया तो मुझे एक ऐसा विचार ढूँढने में, जोकि मुझे उतेत्जित करे, 10  मिनट या उससे भी ज्यादा समय लग जाता था| अब मुझे वहाँ पहुँचने में 30 सेकंड या उससे भी कम वक्त लगता है|

आप शायद सोचें कि कामुक(sex based) विचारों से शुरुआत करना ठीक रहेगा| मैं ऐसा करने की सलाह आपको नहीं दूंगा क्योंकि कामुक विचार बहुत अधिक  लत डालने वाले और चक्करदार(circular) बन सकते हैं| और फिर अधिक उतेजित होने की स्थिति में ऐसे विचार आपको अपना 'ध्यान' रखने के लिए विवश कर सकते हैं(जी हां, आप ठीक समझे:), लेकिन यहाँ आपका मकसद उत्तेजना से छुटकारा पाना नहीं बल्कि उसे बरकरार रखना होता है| आपकी कोशिश होती  है कि आप जीवन के सभी हिस्सों को इसमें शामिल कर लें| ऐसे विचारों की तलाश कीजिए जो आपके पूरे वजूद को उत्साह से भर दें, न कि केवल वे जो सिर्फ आपके निम्न ऊर्जा चक्रों(charkras)) को ही प्रभावित करें| सेक्स, ऐसे विचारों का एक हिस्सा हो सकता है लेकिन कुछ दूसरे हिस्से जैसेकि ऐसी भावनाएं जोकि आपके दिल के करीब हों और अपनी 'रचनात्मक प्रतिभा को अभिव्यक्ति' (creative self-expression)'  (लेख जल्द ही उपलब्ध होगा) कर सकें|

काम कब शुरू करें? 
इस प्रक्रिया का रोजाना अभ्यास करने के कुछ ही दिनों के भीतर, आपको अपनी सोच में एक बदलाव देखने को मिलेगा उस वक्त भी, जबकि आप दूसरे कामों  में उलझे हुए होंगे| आप पाएंगे कि आप अपना कहीं ज्यादा वक्त, 'जैसा आप चाहते हैं' उस पर विचार करने में लगा रहे हैं और 'जैसा आप नहीं चाहते' उसकी अब इतनी ज्यादा चिंता नहीं कर रहे|

अपना ध्यान भटकाकर, सुकून की तलाश करना, तब आपको उतना आकर्षक नहीं लगेगा जितना उत्साह आपको "जैसा आप चाहते हैं" उसके बारे में सोचकर महसूस होगा| वे गतिविधियां(activities) जोकि पहले आपको उत्साहित करती थी तब उबाऊ और नीरस लगने लगेंगी|

जल्द ही नए, रचनात्मक विचार आपके मन पर छा जाएंगे| उनमें से कुछ विचार आपकी विभिन्न समस्याओं का आंशिक(partial) समाधान होंगे| कुछ दूसरे विचार आपको एक अलग ही रास्ते पर ले जाएंगे| वे विचार अक्सर, आपकी बड़ी-से-बड़ी कल्पनाओं से कहीं अधिक व्यावहारिक और वास्तविक होंगे| उन विचारों पर मनन(analysis) कीजिए, लेकिन उन पर काम करने के लिए खुद पर दबाव मत डालिए|

समय के साथ-साथ आपकी बेकरारी(excitement) बढ़ने लगेगी| उनमें से कुछ विचार आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा देंगे और आपको उत्साहित करेंगे| उनमें से  कुछ विचारों को आप लिख-लेना चाहेंगे, या फिर हो सकता है कि आपको उन्हें अपनी डायरी में नोट करने की तीव्र इच्छा महसूस हो| शायद आप उन विचारों पर गहराई से मनन(brainstorming) करके उनका विस्तार करना चाहें|

आपको जैसा करके खुशी महसूस होती है, आप वैसा करें, लेकिन अभी इस पर काम करने के लिए खुद पर दबाव न डालें| अंततः काम करने का वक्त भी आएगा| जैसे-जैसे आपकी सकारात्मक भावनाएँ(positive feelings) और उत्साह बढ़ने लगेगा, एक ऐसा वक्त भी आएगा जब आपको इस पर काम करने से  रोकने के लिए खुद को पकड़ कर पीछे खीचना पडेगा| तब काम न करना अस्वाभाविक और असुविधाजनक (uncomfortable) लगने लगेगा| लेकिन जब तक  ऐसा नहीं होता तब तक 'जैसा कि आपको पसंद है' उस पर हर रोज कम से कम 20 मिनट तक विचार करने के इस तरीके का अभ्यास जारी रखें| अगर  आपको उस बिंदु तक पहुँचने में, जहाँ पर आप सकारात्मक रूप से काम करने के लिए मजबूर हो जाएँ, आपको कुछ हफ़्तों का वक्त लग जाता है तो इसमें  कुछ भी गलत नहीं है| यह 'खुद को नष्ट करने वाले दुष्चक्र' को अगले कुछ सालों तक दोहराते चले जाने से तो कहीं अच्छा है|

इस सकारात्मक चक्र का बुनियादी स्वरूप कुछ ऐसा होता है :
जैसा आप चाहते हैं उसके बारे में सोचिए > उत्साहित और प्रेरित महसूस कीजिए > प्रेरित होकर काम कीजिए और परिणाम हासिल कीजिए

अक्सर मैं जब ऐसी किसी नई चीज के बारे में सोचना शुरू करता हूँ जिसे कि मैं चाहता हूँ, तो कुछ ही दिनों के भीतर मैं इस पर काम करने के लिए मजबूर  हो जाता हूँ| अगर मैं रोजाना इस पर विचार करूँ तो मेरे लिए एक हफ्ते तक, खुद को रोक पाना मुश्किल हो जाता है जबकि मैं काम में जुट जाने और इसके बारे में कुछ करने के लिए उतावला हो रहा होता हूँ|

इस तरह का काम, प्रेरणा(inspiration) से जन्म लेता है| हालांकि कभी-कभी आप इस पर कड़ी मेहनत करना चाहते हैं, लेकिन यह कड़ी-मेहनत की तरह महसूस नहीं होता| हो सकता है कि वहाँ पर आपको काफी काम करना पडे, लेकिन आपको यह एक खेल की तरह लगेगा|

मान लीजिए कि आप किसी दिन डिजनीलैंड (मेले या किसी वाटर-पार्क) में घूमने के लिए जाते हैं| आप वहाँ पर शायद कई तरह की गतिविधियों में हिस्सा  लें| आप शायद कई मील तक पैदल चलते रहे, लाइनों में खड़े रहें, झूलों की सवारी करें, खाना खरीदें, या फिर और कुछ कर्रें| क्या आप इसे कड़ी मेहनत का  काम मानेंगे? शायद नहीं| जब आप आनंद का अनुभव करते हुए किसी प्रेरणादायक काम को करते हैं, तो आपको डिजनीलैंड में एक दिन बिताने जैसी ही  अनुभव होता है| आप सहज रूप से एक गतिविधि से दूसरी तक एक सकारात्मक बहाव में बहते हुए चले जाते हैं| दिन ढलने पर आप शायद इन सभी गतिविधियों की वजह से थकान महसूस करेंगे लेकिन आप इसे एक कार्य-दिवस(working day) की तरह नहीं मानेंगे| खुशी का एहसास आपको काम की  थकान महसूस होने ही नहीं देगा|

मुझे ठीक ऐसा ही लगता है जब मैं किसी विचार से प्रेरित हो जाता हूँ| हाँ यह ठीक है कि इसे 'हकीकत का रूप देने(implementation)' के लिए काफी काम करना होता है, लेकिन यह काम की तरह बिलकुल भी नही महसूस होता| मैं इतना अधिक उत्साहित और प्रेरित हो जाता हूँ कि थोडा रुक कर इसकी  कठिनाईयों के बारे में विचार करने के लिए मेरे पास समय ही नहीं होता| मैं गतिविधी के सकारात्मक बहाव में बहते हुए इसके अगले चरण(step) के बारे में  उत्साहित हो रहा होता हूँ| 

उदाहरण के तौर पर, इस रविवार की दोपहर, मैंने एक घंटे का समय ध्यान लगाने(meditation) में बिताया| जबकि मैं ध्यान की एक गहरी अवस्था में था, तो मैंने अपनी "आत्मिक मार्गदर्शकों(spirit guides)" से अपने अगले लेख के लिए एक बढ़िया सा विषय(topic) सुझाने को कहा| उनमें से एक (जिसेकि मैं  अपनी "ज्ञान की मार्गदर्शिका(wisdom guide)" मानता हूँ) ने मुझे सुझाव दिया कि मैं "आशीर्वाद" या फिर "सुकून महसूस करने" पर आधारित एक लेख  लिखूं| मैंने महसूस किया कि उसका आश्य(intent) यह है कि मैं एक ऐसा लेख लिखूं जो यह बताए कि कैसे हम अपनी सोच को "जैसा हम नहीं चाहते" उससे  हटाकर "जैसा हम चाहते हैं" उसकी ओर मोड सकते हैं| हालाँकि यह वह विषय नहीं था जिस पर मैंने इस हफ्ते लिखने की योजना बनाई थी, लेकिन मुझे यह  विचार काफी अच्छा महसूस हुआ|

जब मैं अपने घर के करीब ही कुछ काम कर रहा था, तो मैंने इस लेख के बारे में विचार किया| मैंने कल्पना की कि कैसे यह लेख लोगों को अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव करने और खुश रहने में मदद कर सकता है| मुझे यह कल्पना करके अच्छा महसूस हुआ| मैं इस विषय पर लेख लिखने को लेकर  उत्साहित महसूस करने लगा, हालांकि मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि मैं इसमें क्या लिखूंगा या फिर मैं क्या कहूँगा|

मैं अपने कंप्यूटर पर बैठ गया और अपने ऑडियो प्लयेर पर मधुर संगीत लगा दिया| फिर मैंने बस लिखना शुरू कर दिया| कोई रुपरेखा(outline) नहीं| मैंने  बस पहली लाईन लिखने से शुरु किया और तब तक टाईपिंग करता रहा जब तक कि मैने लेख की आखिरी लाईन नहीं लिख ली| मैं नहीं जानता था कि लेख का रुख किस ओर होगा या फिर यह कैसे खत्म होगा| करीब तीन घंटे गुजरने के बाद मैं इसे पूरा कर चुका था| मुझे यह लेख लिखने में बेहद आनंद आया|  यह काम करने जैसा तो बिलकुल भी नही था| यह विचारों का सहज और आसान प्रवाह था|

सुकून महसूस करना
जब आप "जैसा आप चाहते हैं" उस के बारे में बार-बार सोचने की आदत डालना शुरू करते हैं तो यह आदत जल्दी ही फलने-फूलने लगती है| आपके द्वारा किए गए प्रेरित काम के नतीजे मिलने लग जाते हैं और इससे आपको और भी अच्छा महसूस होने लगता है| इससे एक ऐसी आवेग(momentum) पैदा होता है   जिसके कारण आप आने वाली बेहतरीन चीजों के बारे में सोचने से खुद को रोक ही नहीं पाते| मिसाल(example) के लिए जब आपकी आमदनी बढ़ती चली  जाती है, तो यह सोचने से खुद को रोकना कि आप, आज से एक साल बाद कितना कमा रहे होंगे, बड़ा मुश्किल हो जाता है| सकारात्मक प्रयास और  सकारात्मक भावनाएँ एक-दूसरे को मजबूत बनाती हैं|

बेशक आपको जब-तब कुछ रुकावटों और असफलताओं का सामना करना पडेगा, लेकिन लंबे समय के दौरान यह तरीका "खुद को आराम का एहसास कराने' के तरीके से कहीं अच्छी तरह से काम करता है|

जब आप इस 'लगातार मजबूत होते जाने वाले' चक्र का आनंद उठा रहे होते हैं तो आपको परम आनंद का एहसास होता है| आपको ऐसा लगता है जैसे कि यह पूरा संसार आपको और ज्यादा खुशहाल बनाने के लिए साजिश रच रहा है|

आप कहाँ से शुरुआत कर रहे हैं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता| वाकई में फर्क नहीं पड़ता| हो सकता है कि आपके वर्तमान हालात एकदम तबाह और बंजर हों, आप फिर भी रोजाना "जो आप चाहते हैं" उसके बारे में सोचने के लिए कुछ वक्त तो निकाल ही सकते हैं|

कुछ साल पहले, जब मैं पूरी तरह से हताशा और कर्जे में डूबा हुआ था, और महीने के मेरे खर्चे, मेरी आमदनी से 10 गुणा अधिक थे| मैं अक्सर सैर करने समुंद्र किनारे चला जाया करता था और समुंद्र को देखा करता था| मैं खुद से कहता था, "कम से कम इसे देखने के लिए तो किसी को पैसे नहीं देने पड़ते हैं!"  मैं खुद को आराम देने और तनाव के स्तर को कुछ कम करने के लिए ऐसा किया करता था| लेकिन जब मैं वहाँ था तो मैंने अपने मन में कल्पना करना शुरू किया कि एक दिन आएगा जब मेरी जिंदगी बेहतर हो जाएगी| कोई कर्जे का पहाड़ नहीं होगा| मेरा लैटर-बोक्स कर्जदारो की चिट्ठियों से भरा हुआ नहीं होगा|  मुझे, जीवन में असफलता का कोई एहसास नहीं सताएगा| उस वक्त "जैसा मैं चाहता था" उस सब की कल्पना करना तो एक ख्याली पुलाव पकाने जैसा ही  नजर आता था| लेकिन ऐसी कल्पना करने से कम से कम मैं अच्छा महसूस करता था| यह 'आराम और सुकून' वाले तरीके से बेहतर था| यह मुझे कहीं  ज्यादा उत्साहित करता था|

दुर्भाग्य से, उसे वक्त मैंने द्रश्य(scene) की कल्पना करने में एक गलती कर दी| मैंने अपनी कल्पना में, उन सभी सपनों को सुदूर(distant) भविष्य में साकार  होते हुए देखा| मैं उनके पूरी तरह से वास्तविक होने की कल्पना नहीं कर सकता था क्योंकि वे मेरी वर्तमान वास्तविकता से कोसों दूर थे| इसलिए मैंने उन्हें  किसी सुदूर भविष्य के समय में धकेल दिया| हालाँकि यह सही ही नजर आता था| लेकिन यह फिर भी यह एक गलती थी क्योंकि इसने मेरी सकारात्मक  भावनाओं को नुकसान पहुंचाया| मैं सुदूर भविष्य की किसी चीज को लेकर इतना उत्साहित नहीं हो सकता था| इस पर काम करना रोजाना की एक  जद्दोजहत(struggle) ही बनी रही, और मैं तनाव से निपटने के लिए 'खुद को आराम पहुंचाने' के जाल में ही फँसा रहा|

जब मैंने उन सकारात्मक भावनाओं को भविष्य में धकेलना बंद दिया केवल तभी, मेरी आर्थिक स्थिति में बड़े बदलाव होना शुरू हो सके| मैंने यह कल्पना  करना शुरू किया कि चीजें अभी वर्तमान में ही बेहतर हो रही हैं न कि कुछ महीनों या सालों के बाद| इसने मुझे मानसिक रूप से कहीं ज्यादा प्रेरित किया|

वह अधिक धन-दौलत कमाने का विचार नहीं था जिसने मुझे उत्साहित किया| बल्कि मैं तो इस विचार को लेकर उत्साहित था कि मेरे पास आजादी होगी कि मैं अपना सार्थक योगदान दुनिया को दे पाऊँगा| मैं धन-दौलत की बिलकुल भी परवाह नहीं करता था - मैं तो बस उस स्थिति में पहुँचना चाहता था जहाँ पर  धन की कमी, मेरे लिए रुकावटें(obstacles) पैदा न करे| आमतौर पर, मेरे सबसे बेहतर काल्पनिक द्रश्यों में पैसा कहीं भी नहीं होता था| मुझे चीजों की रचना  करना और उन्हें दूसरों के साथ बांटना कहीं ज्यादा प्रेरित करता था बजाय सामान इकठ्ठा करने के|

मैं आज भी ऐसा ही महसूस करता हूँ| खुद के पास लाखों-करोड़ों रुपये होने की कल्पना करना मुझे उबा(bore) देता है| मुझे इसमें कोई तुक नजर नहीं आता| मेरी भावनाएँ इस पर बेहद ठंडी प्रतिक्रिया देती हैं| लेकिन जब मैं विचारों को अभिव्यक्त(express) करने और उन्हें दूसरे लोगों के साथ बांटने के बारे में  सोचता हूँ तो ऐसा करना मुझे उत्साह से भर देता है| जब मैं लोगों को एक साथ लाने के बारे में सोचता हूँ, तो यह भी मुझे उत्साहित करता है|

आपके मूल्य(values) शायद मेरे मूल्यों से अलग हो सकते हैं, और यह ठीक भी है| यहाँ पर एक मुख्य बात यह है कि आपको हकीकत जानने के लिए  सामाजिक ढर्रे पर आधारित कुछ घिसे-पिटे विचारों से खुद को आजाद करना होगा| समाज द्वारा आपके लिए तय किए गए मापदंडों(standards) - (जैसेकि आपको अपने जीवन में क्या हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए?) - बहुत सारी धन-दौलत, एक आलीशान कार, शहर में एक बड़ा सा मकान, या फिर एक  मॉडल जैसी शारीरिक बनावट, पर खरा उतरने के लिए खुद को झोंक देने की सनक से खुद को बचाना होगा| आपको अपने भीतर गहराई में जाकर यह पता  करना होगा कि आप वाकई में आखिर क्या चाहते हैं| और फिर आपको इस बात को पूरी तरह से स्वीकार करना होगा कि आप जीवन में इसे ही हासिल करना चाहते हैं, और तब भी जब, आपके ख्याल से, ऐसा करने पर आपके करीबी लोग आपको मुर्ख समझने लगें| अगर आप वाकई में इसे चाहते हैं तो यही  वजह अपने-आप में काफी होनी चाहिए|

शुरू-शुरू में मुझे, 'जैसा मैं चाहता हूँ, वह अभी इसी वक्त वर्तमान में मेरे पास मौजूद है', इसकी कल्पना करना बेहद कठिन लगा| मेरे दिमाग ने इस पूरी धारणा को ही अस्वीकार कर दिया क्योंकि यह तो जाहिर था कि जैसा मैं चाहता था उसे वर्तमान में हासिल करने की तो दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं थी| लेकिन मैंने भी एक छोटी सी तरकीब निकाल ही ली, जिसने मेरी बहुत मदद की| मैंने कल्पना की कि मैं एक दूसरी ही दुनिया में पहुँच गया हूँ जहाँ पर ठीक  मेरे जैसा ही एक और व्यक्ति हैं जिसे पहले से ही वह सब कुछ हासिल हो चुका है जो कुछ मैं अभी हासिल करना चाहता हूँ| और मैं अपने विचार्रों पर ध्यान केंद्रित करके, उस व्यक्ति की भावनाओं को, खुद अपने अंदर महसूस कर सकता हूँ| मेरे दिमाग को इसे स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं होती, यह बड़ी ही  मजेदार बात है कि यह एक दूसरी दुनिया के अस्तित्व को स्वीकार कर लेता है, लेकिन 'जैसा मैं चाहता हूँ', वर्तमान में उसके अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर  पाता|

बार-बार, जान-बूझ कर 'जैसा मैं चाहता हूँ" उस पर विचार करने की आदत को विकसित करने का फ़ायदा यह है कि इससे मुझे परमानंद का अनुभव होता है|

मुझे, लोगों के व्यक्तित्व-विकास में, उनकी मदद करने के विचार से बड़ी प्रेरणा मिलती है| मुझे लोगों का होंसला बढाने में, ताकि वे थोड़ा अधिक सचेत होकर जीवन का आनंद ले पाएं, बेहद खुशी का एहसास होता है| मैं लोगों को चुनौती देना पसंद करता हूँ ताकि वे चीजों को एक अलग नजरिये से देख सकें| मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग ऐसे विचारों को बेकार की, अव्यावहारिक, या फिर निरर्थक बातें कहते हैं| लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं| यह रास्ता मुझे प्रेरणा  देता है| मैं जितना ज्यादा इसके बारे में सोचता हूँ, मुझे यह उतना ही बेहतर महसूस होता है| अगर पूरी दुनिया मुझसे असहमत हो तो इससे कोई फर्क नहीं  पड़ता| मैं जानता हूँ कि मैंने कुछ ऐसा खोजा है जोकि मेरे लिए बहुत मायने रखता है| और यही बहुत है|

मुझे यह पता करने में कई साल लगे कि मुझे खुश रहने के लिए सिर्फ 'जैसा मैं चाहता हूँ' उसके बारे में सोचने की आदत बनाए रखने की जरूरत हैं| मुझे बस रोजाना थोड़ा सा समय निकाल कर उसके बारे में सोचने की जरूरत है जोकि मुझे रोमांच से भर देता है| इससे जो भावनात्मक ऊर्जा पैदा होती है वह  इतनी जबर्दस्त होती है कि इसमें लगाया गया 20 मिनट का समय, जल्द ही निराशा, चिंता, या हताशा(overwhelm) के विचारों पर भारी पड़ने लगता है|

इस प्रक्रिया को एक बार आजमा कर जरुर देखिए| इसे कम-से-कम एक हफ्ते तक लगातार कीजिए, हर बार इसमें कम-से-कम 20 मिनट का समय लगाइए| दिन के अंत में जब आप खुद को 'आराम/सुकून देने वाले रिवाज(ritual)' को निभाते हैं तो 20 मिनट का समय इस 'उत्साहित वाले रिवाज' को निभाने में  भी लगा दीजिए| हर रोज परम-आनंद का अनुभव कीजिए, चाहे इसे वास्तविक मानने के लिए आपको एक काल्पनिक दुनिया की सैर पर ही क्यों ना जाना पडे|

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3 टिप्‍पणियां:

  1. mein aajkal bahoot dippression mein hu. please koi upay bataiye taaki mein normal ho saku

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  2. दिनेश जी हमसे से हर कोई कभी न कभी डिप्रेशन के दौर से जरुर गुजर चुका है| आप इस लेख में बतायी गई प्रक्रिया को रोजाना, एक हफ्ते तक अपना कर देखें, आपको अपनी मनस्थिति में फर्क साफ़ तौर पर दिखने लगेगा इसके अलावा अगर आप बहुत अधिक चिंता करते हैं तो आप डेल कार्नेगी की किताब 'चिंता छोडो सुख से जियो'"How to stop worrying and start living) भी पढ़ सकते हैं|

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  3. मुझे हर एक छोटी सी बात पर टेंशन हो जाती है। बाद मैं मानहीं
    मन बेचेंन हो जाता है । संकोच बोत जाय्दा है।

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