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आज का विचार

आज का विचार (Thought of the Day in Hindi): (Subscribe by e-mail)

Last Modified: शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

माफ़ करना बेटा !

                                  (W. Livingston Larned)

“सुनो बेटे; मैं तुमसे यह तब कह रहा हूँ जब तुम गहरी नींद में सोये हुए हो, एक छोटा सा हाथ तुम्हारे गाल के नीचे रखा हुआ है और घुंघराले बालों की एक लट तुम्हारे पसीने से भीगे हुए माथे से सटी हुई है| मैं अकेला ही तुम्हारे कमरे में चुपके से आ गया हूँ| कुछ ही मिनट पहले, जब मैं अपने कमरे में बैठा अखबार पढ़ रहा था, आत्म-ग्लानी की एक लहर मुझ पर छा गई थी| पश्चाताप करते हुए, मैं तुम्हारे सिराहने पर आकर बैठ गया हूँ|

मैं कुछ चीजों के बारे में सोच रहा था, बेटे : जिन्हें मैंने तुम्हें करने से रोका था| मैं तुम्हें तब कोस रहा था जब तुम स्कूल के लिए तैयार हो रहे थे क्योंकि तुमने केवल गीले तौलिये से अपना चेहरा पोंछ लिया था| मैंने तुम्हारे गंदे जूतों के लिए तुम्हें डांटा था| मैं तुम पर तब चिल्लाया था जब तुम्हें अपनी कुछ चीजें फर्श पर फेंक दी थी|

नाश्ते के समय भी मैं कमियाँ ही ढूंढ रहा था| तुम्हें चीजों को बिखेर दिया था| तुमने अपने खाने को, ठीक से चबाये बिना ही, निगल लिया था| तुमने अपनी कोहनियों को टेबल पर रखा था| तुमने अपनी ब्रेड पर मक्खन की ज्यादा मोटी परत लगाई थी| और जब तुम खेलने के लिए तैयार हुए और मैं अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए जा रहा था, तुमने पीछे मुडकर और एक हाथ हिलाकर कर कहा “गुडबाय डैडी!” और मैंने नाराज होकर चिल्लाया था, “सामने देखो|”

और फिर दोपहर बाद यह सिलसिला फिर से शुरू हो गया था| जब मैं सड़क पर आया, तब मैंने उस समय तुम्हारी जासूसी की, जब तुम अपने घुटनों को जमीन पर टिकाकर कंचों से खेल रहे थे| तुम्हारी जुराबों में सुराख थे| मैंने तुम्हारे दोस्तों के सामने तुम्हारा अपमान किया और तुम्हें, अपने आगे-आगे घर तक चलने के लिए मजबूर किया| जुराबे महंगी होती हैं – और अगर तुम्हें इन्हें खरीदना पड़ता तो तुम अपनी जुराबों का ज्यादा ध्यान रखते! इसे एक पिता के नजरिये से देखने की कल्पना करो, मेरे बच्चे!

तुम्हें याद है कि बाद में, जब मैं अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था, तो तुम झिझकते हुए आए थे, तुम्हारी आखों में एक तकलीफ का एहसास था? जब मैंने, अपना ध्यान टूटने की वजह से झल्लाते हुए, अपने अखबार से नजरें हटाकर देखा, तो तुम दरवाजे पर ठिठक गए थे| “तुम्हें क्या चाहिए?” मैं, कड़क आवाज में चिल्लाया था|


तुमने कुछ नहीं कहा, लेकिन तुम भागते हुए मेरे पास आए, और अपनी बाहों में भर कर मुझे चूम लिया, और तुम्हारी छोटी-छोटी बाहें, मेरे चारों ओर उस असीम प्यार के साथ, कस गईं, जिसका बीज भगवान् ने तुम्हारे दिल में बोया था और जिसे उपेक्षा(neglect) भी नहीं मिटा पायी थी| और फिर तुम, सीढ़ियों पर अपनी चप्पलों से आवाज करते हुए चले गए|

इसके कुछ ही पलों के बाद बेटा, कुछ ऐसा हुआ कि अखबार मेरे हाथों से फिसल गया और एक भयानक लाचार करने वाले डर ने मुझे घेर लिया| आदत मेरे साथ क्या कर रही थी ? गलतियां ढूँढने और निंदा करने की आदत – क्या एक लड़के होने के लिए, मेरी तरफ से यही तुम्हारा इनाम था| ऐसा नहीं था कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता था; बस मैं नई जनरेशन से जरूरत से ज्यादा मांग बैठा था| मैं तुम्हें, अपने खुद के बचपन के पैमाने पर तोलने लगा था|

और तुम्हारे अन्दर इतनी अच्छाई, नेकी और सच्चाई है| तुम्हारा छोटा सा दिल इतना बड़ा है कि बड़ी-से-बड़ी पहाड़ियों को भी अपने भीतर समा सकता है| जिस तरह से तुम दौड़ कर आए और मुझे चूम कर गुड नाईट कहा, यह इस बात से ही जाहिर होता है| बेटा, आज और कुछ मायने नहीं रखता| मैं, अँधेरे में तुम्हारे बिस्तर के पास आ गया हूँ और यहाँ मैं, शर्मिन्दा होकर, सर झुकाए बैठा हूँ!

यह प्रयाश्चित करने की एक कमजोर सी कोशिश है; मैं जानता हूँ कि अगर मैं इन बातों को तुमसे तब कहता जब तुम जागे हुए होते, तो तुम इन चीजों को नहीं समझ पाते| लेकिन मैं कल से एक सच्चा पिता बनूंगा! मैं तुम्हारा सच्चा दोस्त बनूंगा और तुम्हारी तकलीफ को मैं भी महसूस करूंगा और तुम्हारे साथ-साथ मैं भी हंसूंगा| जब कभी झुंझलाहट में कुछ कडवा कहने की इच्छा होगी तो मैं अपनी जीभ दांतों तले दबा लूंगा| मैं, इस बात को बार-बार, एक आदत की तरह दोहराता रहूँगा : “आखिर वह एक बच्चा ही तो है-एक छोटा सा बच्चा!”

मैं शर्मिन्दा हूँ कि वक्त से पहले, एक आदमी के रूप में मैंने तुम्हारी कल्पना कर ली| लेकिन अभी बेटे, जब मैं तुम्हें अपने बिस्तर पर थक कर और सिमट कर सोते हुए देख रहा हूँ, तो मैं समझ रहा हूँ कि तुम तो अभी भी बच्चे ही हो| कल की ही बात है कि तुम अपनी माँ की बाहों में थे, तुम्हारा सर उसके कन्धों पर था| मैंने तुमसे बहुत जल्दी-बहुत कुछ मांग लिया, कुछ ज्यादा ही.”

[दूसरों की आलोचना करने और उनकी निंदा करने की बजाए, शायद उन्हें समझने की कोशिश करना ज्यादा अच्छा रहेगा, यह पता करना कि आखिर वह ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं| ऐसा करना, आलोचना के मुकाबले कहीं ज्यादा फायदेमंद और दिलचस्प होगा; और इससे उपेक्षा की बजाय, साहनुभूति, धैर्य और अच्छाई का विकास भी होगा...!!!]  

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